मिट्टी से सनी हथेलियाँ
शहर की सबसे ऊँची इमारतों के बीच
शर्मा परिवार का बंगला खड़ा था —
चमकता हुआ, मगर ठंडा।
घर में सब कुछ था,
बस अपनापन नहीं।
घर के मालिक सुरेश शर्मा
और उनकी पत्नी माधुरी —
जिनकी दुनिया लोगों की नज़रों में बसती थी।
दो बेटे थे —
अंकित और मोहन।
शादी का समय आया।
“पहले अंकित की शादी होगी,”
माधुरी ने सख़्त आवाज़ में कहा।
“और लड़की हमारी बिरादरी की, अमीर होनी चाहिए।”
सुरेश ने धीरे से कहा—
“पहले मोहन की शादी होगी।
मेरे पुराने दोस्त की बेटी सीमा से।
गरीब है… पर बहुत संस्कारी।”
माधुरी का चेहरा तमतमा उठा।
“एक गरीब लड़की?
इस घर की बहू?”
घर में शब्द नहीं, ज़हर घुल गया।
आख़िर दोनों भाइयों ने एक साथ कहा—
“माँ, पापा…
हम दोनों की शादी एक साथ करवा दीजिए।”
दो दुल्हनें...
एक ओर आई रिया —
रेशमी लहंगे में लिपटी हुई,
मेहँदी से ज़्यादा चेहरे पर सजा हुआ मेकअप,
और आँखों में
सिर्फ़ अपने ही सपनों की चमक।
दूसरी ओर आई सीमा —
सादा लाल जोड़ा पहने,
काँपते हुए हाथों से पल्लू सँभालती,
और आँखों में
एक अनकहा डर —
“क्या मैं इस घर को अपना बना पाऊँगी?”
पहली रात,
जब सारा घर सो गया,
सीमा की आँखों में नींद नहीं उतरी।
अँधेरे कमरे में
वो चुपचाप छत को देखती रही,
और हर पल
मायके की याद
तकिये में समाती चली गई।
उसके आँसू
आवाज़ नहीं करते थे,
पर तकिया
सब जानता था।
पहली सुबह...
सुबह के ठीक चार बजे थे।
घर अभी नींद में डूबा हुआ था,
लेकिन सीमा की नींद खुल चुकी थी।
सीमा उठी।
नल से पानी भरते हुए
उसकी हथेलियाँ ठंड से सुन्न हो गईं।
कुछ पल के लिए
उसने उँगलियाँ समेट लीं,
जैसे दर्द को भीतर ही दबा रही हो।
फिर भी
वो बिना कुछ कहे
झाड़ू उठाकर आँगन साफ़ करने लगी।
हर झाड़ू के साथ
उसके दिल की घबराहट भी
ज़मीन पर गिरती रही।
दूर खड़ी
माधुरी
सब देख रही थीं।
उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था।
मन ही मन उन्होंने कहा—
“दिखावा है…
गरीब लोग ऐसे ही
संस्कार का नाटक करते हैं।”
कुछ देर बाद
सीमा रसोई में पहुँची।
अंदर कदम रखते ही
उसका दिल जैसे धक से रह गया।
चारों तरफ़
चमचमाती मशीनें थीं—
इंडक्शन, ओवन, मिक्सर…
लेकिन
एक भी चूल्हा नहीं।
उसकी साँस अटक गई।
आँखों में
अपने आप आँसू भर आए।
बहुत धीमी आवाज़ में
वो खुद से बोली—
“माँ…
मुझे तो कुछ भी नहीं आता…”
कुछ पल के लिए
वो वहीं खड़ी रही।
फिर
आँसू पोंछकर
हिम्मत समेटी
और बाहर आई।
नज़रें झुकाए
उसने धीरे से कहा—
“माँजी…
अगर आपकी इजाज़त हो…
तो मैं आँगन में
मिट्टी का चूल्हा जला लूँ?”
एक पल का सन्नाटा।
फिर
पूरे घर में ठहाके गूँज उठे।
“देखा!”
“यही है इसकी औकात!”
हँसी की वो आवाज़ें
सीमा के दिल में
कील बनकर गड़ गईं।
लेकिन
वो चुप रही।
क्योंकि
उसे पता था—
अगर आज वो रो पड़ी,
तो उसकी माँ की
परवरिश हार जाएगी।
मिट्टी और अपमान...
सीमा ने
काँपते हाथों से
अपने दुपट्टे से आँसू पोंछ लिए,
और बिना कुछ कहे
आँगन के एक कोने में
मिट्टी समेटकर
चूल्हा बना लिया।
धुआँ उठता रहा,
आँखों में चुभता रहा,
पर इस बार
उसने आँसू नहीं पोंछे।
उसके होंठ काँपे,
दिल भर आया,
पर उसने खुद से बस इतना कहा—
“अगर मैं रोई,
तो मेरी माँ का सिर झुक जाएगा।”
फिर उसने
पत्थर के सिलबट्टे पर
मसाले रखे,
और उन्हें पीसने लगी।
हर वार के साथ
सिर्फ़ मसाले नहीं पिस रहे थे,
उसके दिल में जमी
पीड़ा, अपमान
और चुपचाप सहा हुआ दर्द भी
पिसता चला जा रहा था।
दूसरी बहू...
रिया ने धीरे से मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर उँगलियाँ फिसलती रहीं।
“फूड ऑर्डर कर देती हूँ…”
उसने खुद से कहा,
“किसके पास इतना वक़्त है?”
कुछ ही देर में
दरवाज़े पर पैकेट आ गए।
प्लास्टिक की तेज़ गंध
पूरे घर में फैल गई —
एक अजीब-सी,
बेजान गंध।
माधुरी ने
चुपचाप पहला कौर उठाया
और मुँह में रख लिया।
स्वाद था…
लेकिन उसमें
कोई अपनापन नहीं था।
“अच्छा नहीं है…”
ये शब्द
होठों तक आकर
लौट गए।
उन्होंने कुछ नहीं कहा,
बस धीरे से
निवाला निगल लिया।
वो खुशबू...
दोपहर का समय था।
सीमा चुपचाप थाली में खाना सजाकर कमरे में लाई।
गरम-गरम रोटियों से उठती खुशबू
सीधे दिल के किसी भूले हुए कोने तक पहुँच गई।
सुरेश ने धीरे से पहला निवाला लिया।
एक पल को उनका हाथ रुक गया।
उनकी आँखें भर आईं।
“यह स्वाद…”
उन्होंने रुंधे गले से कहा,
“बिल्कुल मेरी माँ के हाथों जैसा है।”
सीमा का गला भर आया।
उसकी आँखें झुक गईं।
आज पहली बार
किसी ने उसके हाथों के बने खाने को
सिर्फ़ खाया नहीं—
समझा भी।
आज पहली बार
उसके परिश्रम को
इज़्ज़त मिली थी।
बीमारी...
दिन धीरे-धीरे बीतते गए।
हर दिन पैकेट वाला खाना
उनके शरीर में उतरता रहा,
और बिना आवाज़ किए
ज़हर बनता चला गया।
शुरू में बस हल्की जलन थी,
फिर थकान रहने लगी,
और एक दिन ऐसा आया
जब दर्द ने सहने की हद पार कर दी।
उस रात
माधुरी अचानक पेट पकड़कर कराह उठीं।
उनका चेहरा पीला पड़ गया,
साँसें तेज़ हो गईं,
और आँखों में डर उतर आया।
घर में अफ़रा-तफ़री मच गई।
किसी ने पानी पकड़ा,
किसी ने दवा खोजी,
तो किसी ने काँपते हाथों से
एम्बुलेंस को फोन लगाया।
अस्पताल की सफ़ेद दीवारों के बीच
माधुरी बिस्तर पर लेटी थीं —
कमज़ोर, बेबस और ख़ामोश।
कुछ देर बाद
डॉक्टर बाहर आए।
उनकी आवाज़ गंभीर थी।
“अब देर नहीं करनी चाहिए।
अगर यही खान-पान चलता रहा,
तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
उन्हें अब
सिर्फ़ घर का बना
ताज़ा और सादा खाना ही चाहिए।
वरना…”
डॉक्टर का वाक्य
बीच में ही रुक गया,
लेकिन उसका अधूरापन
सबके दिल में उतर गया।
टूटती हुई सास...
घर लौटने के बाद
माधुरी बिस्तर पर निढाल पड़ी थीं।
चेहरा पीला था,
आँखों में थकान और पछतावा साफ़ झलक रहा था।
रसोई से
धीमी-सी खनक आ रही थी।
सीमा चुपचाप
सूप बना रही थी।
ना कोई शिकायत,
ना कोई सवाल।
बस हर चम्मच में
अपनी चिंता घोल रही थी।
दरवाज़े के पास
रिया खड़ी थी।
नज़रें ज़मीन में गड़ी हुईं,
दिल बोझिल।
कमरे में
कुछ पल की ख़ामोशी छा गई।
फिर माधुरी ने
काँपती हुई आवाज़ में कहा—
“बहू…
मैंने तुम्हें
कभी बेटी नहीं माना।
तुम्हारे आँसुओं को
मैंने कभी पढ़ा ही नहीं…”
सीमा के हाथ रुक गए।
चम्मच थरथरा उठा।
आँखों से आँसू
बिना आवाज़ किए
गालों पर बहने लगे।
वो पास आकर
धीरे से बोली—
“माँजी…
मैंने कभी शिकायत नहीं की।
मैं बस हर दिन
इस डर में जीती रही
कि कहीं मुझसे
कोई गलती न हो जाए,
और आप मुझसे
नाराज़ न हो जाएँ…”
कमरे में
सिर्फ़ सिसकियों की आवाज़ थी।
और पहली बार
उस घर में
माँ और बेटी के बीच
दीवार नहीं,
आँसू बह रहे थे।
पश्चाताप...
रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसकी आँखों में अब घमंड नहीं था,
बस डर और पछतावा था।
उसने काँपती आवाज़ में कहा—
“माँ…
मैं अपने आराम की दुनिया में इतनी खो गई
कि आपका दर्द देख ही नहीं पाई।
आप चुपचाप तकलीफ़ सहती रहीं
और मैं समझती रही
कि सब ठीक है…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
रिया अचानक झुक गई
और सीमा के पैरों के पास बैठ गई।
“दीदी… नहीं…
आज से तुम मेरी बहन नहीं,
मेरी गुरु हो।
मुझे सिखा दो
ये चूल्हा,
जिसमें सिर्फ़ आग नहीं
ममता जलती है।
मुझे सिखा दो
ये खाना,
जिसमें स्वाद से ज़्यादा
परवाह होती है।
और मुझे सिखा दो
ये अपनापन,
जो महंगे घरों में नहीं,
साफ़ दिलों में बसता है।”
सीमा की आँखों से
चुपचाप आँसू बहने लगे।
उसने रिया के सिर पर
प्यार से हाथ रखा—
“अपनापन सिखाया नहीं जाता बहन,
बस महसूस किया जाता है।”
आज भी उस घर में मशीनें हैं,
पर अब
उनसे ज़्यादा
दिल चलते हैं।
माधुरी अक्सर मुस्कराकर कहती हैं—
> “मैं अमीर थी,
पर भीतर से खाली थी।
मेरी बहू ने
मिट्टी से लथपथ हाथों से
मुझे फिर से
इंसान बनना सिखाया।”
और सीमा की हथेलियों में लगी
वही मिट्टी
आज उस घर की
सबसे बड़ी
और सबसे सच्ची
दौलत है।

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