उस दिन मैं रुक गया
उस दिन सुबह कुछ अलग थी।
आसमान हल्का-सा धुंधला था,
जैसे सूरज भी पूरी तरह निकलने से पहले
कुछ सोच रहा हो।
मैं सुबह छह बजे घर से निकला।
दिल में जल्दबाज़ी थी,
कदमों में तेज़ी,
और साथ थी ज़िंदगी की वही रोज़ की दौड़।
बस स्टैंड पहुँचा तो पता चला—
पहली बस निकल चुकी थी।
अब अगली बस साढ़े नौ बजे थी।
मैं बेंच पर बैठ गया।
मन झुंझलाया हुआ था।
भूख भी लग रही थी।
सोचा—
चलो, सामने ढाबे पर कुछ खा लेते हैं।
मैं उठा ही था कि
नज़र सड़क के किनारे पड़ी।
वहाँ एक औरत बैठी थी।
उसकी गोद में एक छोटा बच्चा था,
जो बार-बार रो रहा था।
पास में बैठी थी एक नन्ही बच्ची।
शायद आठ साल की।
उसके पैर धूल से सने थे,
चेहरे पर थकान थी,
और आँखों में…
कुछ ऐसा था जिसे शब्दों में कहना मुश्किल है।
वह बच्ची माँ की साड़ी खींचकर
धीरे से बोली—
“अम्मा… कुछ खाने को मिलेगा?”
माँ ने इधर-उधर देखा।
फिर बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली—
“थोड़ी देर रुक जा बेटा।”
उसकी आवाज़ काँप गई।
मैंने यह सब देखा
और वहीं रुक गया।
ज़िंदगी इतनी तेज़ भाग रही थी
कि पहली बार
मैं ठहर गया।
जेब में हाथ डाला।
सोचा—पैसे दे दूँ।
फिर मन ने कहा—
पैसे से क्या पेट भरता है,
या सिर्फ़ दर्द दबता है?
मैं वापस मुड़ा।
मैंने धीरे से पूछा—
“बहनजी… आज कुछ खाया है?”
वह घबरा गई।
नज़र नीचे कर ली।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली—
“नहीं साहब… कल रात से।”
मेरे गले में कुछ अटक गया।
मैंने कहा—
“आइए… अंदर बैठकर कुछ खा लेते हैं।”
वह हिचकिचाई।
शायद दुनिया से डर गई थी।
बच्ची ने मेरी तरफ देखा।
उस नज़र में
डर नहीं था,
उम्मीद थी।
ढाबे में घुसते ही
मालिक ने कपड़ों को देखकर
त्योरी चढ़ा ली।
मैंने साफ़ शब्दों में कहा—
“इनका खाना मैं दूँगा।”
वह चुप हो गया।
खाना आया।
जब बच्ची ने पहला कौर खाया,
तो जैसे उसकी आँखों में रोशनी उतर आई।
वह मुस्कुराई।
सिर्फ़ मुस्कुराई नहीं…
जी उठी।
उसकी माँ की आँखों से
आँसू गिरने लगे।
वह बार-बार
हाथ जोड़ रही थी।
मैं कुछ नहीं बोला।
क्योंकि उस पल
मेरे पास शब्द नहीं थे।
खाना खत्म हुआ।
मैंने उन्हें बस का किराया दिया
और पास के मंदिर में चल रहे लंगर का रास्ता समझा दिया।
बच्ची ने जाते-जाते
मेरा हाथ पकड़ा और बोली—
“अंकल…
आज बहुत अच्छा दिन है।”
उसकी आवाज़
मेरे दिल के भीतर उतर गई।
मैं बस स्टैंड की ओर बढ़ा।
कदम भारी थे।
मन भरा हुआ था।
रास्ते में मंदिर आया।
घंटी बज रही थी।
मैंने भीतर ही भीतर पुकारा—
“हे ईश्वर,
इन मासूम पेटों की आग देखकर भी
आप कैसे मौन हो सकते हैं?
आप कहाँ हो?”
अगले ही क्षण
मेरे भीतर से एक शांत आवाज़ उभरी—
“अगर मैं हर जगह खुद पहुँच जाऊँ,
तो इंसान का दिल किसलिए बनाया?”
मैं सन्न रह गया।
समझ आ गया—
हम मदद करने वाले नहीं होते,
हम चुने हुए माध्यम होते हैं।
जिस दिन हम किसी भूखे को देखकर
रुक जाते हैं,
उसी दिन
भगवान हमारे भीतर उतरकर
काम करते हैं।
मैं बस में बैठा।
खिड़की से बाहर
वही सड़क थी,
वही लोग…
पर
मैं वही इंसान नहीं था।
उस दिन
मैं किसी मंज़िल तक नहीं पहुँचा,
लेकिन ज़िंदगी का असली अर्थ
ज़रूर पा लिया था।

Post a Comment