चूल्हे की आग और मन की राख

Three Indian daughters-in-law standing together in a crowded vegetable market, showing emotional bonding, tired expressions, and silent strength in a realistic village setting



सुबह का उजाला अभी पूरी तरह फैला भी नहीं था।

आसमान पर हल्की-सी रोशनी थी,

जैसे सूरज भी हिम्मत जुटा रहा हो बाहर आने की।


रसोई में चूल्हा जल रहा था।

उससे उठता धुआँ

सिर्फ़ लकड़ी या गैस का नहीं था,

वह किसी के भीतर जमा दर्द,

थकान और चुप्पी को भी

हवा में घोल रहा था।


शिवनगर मोहल्ले में

तीन घर आमने-सामने खड़े थे।

तीन सासें थीं—

सख़्त आवाज़ें, पुराने उसूल।

तीन बहुएँ थीं—

थकी हुई आँखें,

लेकिन अब भी ज़िंदा उम्मीदें।


और इन तीनों घरों के भीतर

कहानियाँ अलग-अलग नहीं थीं—

बस किरदार बदल जाते थे,

दर्द वही रहता था।



मंदिर के बाहर — कड़वाहट में लिपटी हँसी


शांति देवी ने भारी आवाज़ में कहा,

“अरे बहनों, आज मेरी बहु ने पूछा कि दोपहर में क्या बनाऊँ।

मैंने साफ़ कह दिया—

दाल, चावल, रोटी, सब्ज़ी, रायता…

और सलाद अलग से।”



सरला ठठाकर हँस पड़ी,

“सही किया।

इन बहुओं को अगर ढील दे दी न,

तो एक दिन खिचड़ी बनाकर बोलेंगी—

‘आज बस यही खाइए।’”


उर्मिला ने तुरंत बात काट दी,

“हमने तो पूरी ज़िंदगी

चूल्हे की आग में झोंक दी।

अब इन्हें एक सब्ज़ी बनाने में

साँस फूलने लगती है।”


तीनों हँसती रहीं।

उनकी हँसी

किसी के कानों में

काँटे बनकर चुभ रही थी।



शांति देवी का घर...


रसोई में

सुमन की आँखें लाल थीं।


नींद नहीं थी उनमें,

सिर्फ़ थकान जाग रही थी।


कई रातों से

उसके हिस्से की नींद

चूल्हे की आँच में

जलकर राख हो चुकी थी।


“माजी…”

उसने काँपती आवाज़ में कहा,

हिम्मत को समेटते हुए—

“आज अगर…

थोड़ा कम बना लें तो…”


“कम?”

शांति देवी की आवाज़ में आग भड़क उठी।


“तेरे मायके में

कम बनता होगा।

यहाँ हमारे घर में

चार चीज़ से कम खाना

कभी थाली में नहीं उतरता।”


सुमन ने होंठ कसकर भींच लिए।

जैसे शब्द

वहीं दम तोड़ रहे हों।


उसकी आँखों में

पानी भर आया—

लेकिन वह रोई नहीं।


क्योंकि उसने सीख लिया था,

इस घर में

आँसू भी

चुपचाप बहाए जाते हैं।




सरला का घर...


नंदिनी सुबह से रसोई में खड़ी थी।

चूल्हे की आँच से ज़्यादा

उसके भीतर की थकान जल रही थी।


“नंदिनी!”

सरला की आवाज़ तीर की तरह आई।


“रोटी गोल नहीं है।

क्या मायके में यही सिखाया है?”


नंदिनी के हाथ काँप गए।

गले से शब्द बड़ी मुश्किल से निकले—

“माजी… हाथ दुख रहे हैं।”


“हाथ दुख रहे हैं?”

सरला ने ताना उछाला,

“मेरे हाथ तो कभी नहीं दुखे,

जब तेरे ससुर और तेरे पति के लिए

दिन–रात पाँच–पाँच चीज़ें बनाती थी।”


नंदिनी ने धीरे से पीठ मोड़ ली।

वह कुछ नहीं बोली।

बस उसकी आँखों से

एक बूँद चुपचाप गिरी—

और आटे में मिल गई।




उर्मिला का घर...


कविता ज़्यादा बोलती नहीं थी।

वह शिकायत नहीं करती थी,

बस हर बात को भीतर समेट लेती थी।


दिन भर रसोई और घर के काम में लगी रहती,

बिना थके, बिना सवाल किए।


“कविता,”

उर्मिला ने सूखी आवाज़ में कहा,

“रात के खाने में

लौकी की सब्ज़ी बनाना,

दाल और रोटी भी।

और हाँ…

मेहमान भी आ सकते हैं।”


कविता ने कुछ नहीं कहा।

बस चुपचाप सिर हिला दिया।


लेकिन उसके भीतर,

कहीं बहुत अंदर,

एक आवाज़ गूँजी—


मैं बहु हूँ…

पर क्या मैं इंसान नहीं हूँ?



बाज़ार — तीन दर्द, एक आँसू


सब्ज़ी मंडी की भीड़ में

तीनों बहुएँ अचानक आमने–सामने आ खड़ी हुईं।


चेहरों पर वही थकान थी,

जो हर सुबह रसोई की आग से जन्म लेती है।


सुमन ने नंदिनी को ध्यान से देखा और धीमे से बोली,

“तुम भी बहुत थकी हुई लग रही हो।”


नंदिनी के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई,

लेकिन उस मुस्कान में कोई आवाज़ नहीं थी।

उसने बस इतना कहा,

“अब थकान छुपती नहीं…

चेहरे पर अपने आप उतर आती है।”


कविता कुछ पल चुप रही।

फिर बहुत धीरे,

जैसे अपने मन का बोझ शब्दों में ढाल रही हो, बोली—

“हम खाना बनाने से कभी नहीं डरते।

डर तो तब लगता है,

जब बोलने से पहले ही

हमें चुप करा दिया जाता है।”


इतना कहते ही

तीनों की आँखें भर आईं—

बिना किसी शिकायत के,

बिना किसी सवाल के।


बस आँसू थे,

जो एक-दूसरे का दर्द पहचान रहे थे।




कविता का प्लान...


“अगर…”

कविता ने हिचकिचाते हुए कहा।


दोनों उसकी ओर देखने लगीं।


“अगर हम…

थोड़ा सा बोझ

आपस में बाँट लें तो?”


“कैसे?”

सुमन ने धीमी आवाज़ में पूछा।


कविता ने नज़रें झुकाकर कहा,

“एक ही सब्ज़ी

थोड़ी ज़्यादा मात्रा में बना लें…

और फिर

एक-दूसरे के घर भेज दें।”


कुछ पल के लिए

तीनों चुप रहीं।


फिर नंदिनी ने

गहरी साँस ली—

जैसे बरसों से रुकी हवा

आज बाहर निकली हो।



अगला दिन...


शांति देवी गरज उठीं,

“आज चार चीज़ें क्यों नहीं बनीं?”


तभी दरवाज़े पर आहट हुई।

नंदिनी और कविता खड़ी थीं—

हाथों में ढके हुए बर्तन,

आँखों में थकान और चेहरे पर संयम।


सुमन ने धीरे, लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा,

“सब बना है, माजी।

बस आज हाथ अलग-अलग नहीं,

दिल मिलाकर खाना बनाया है।”


शांति देवी ने थाली की ओर देखा।

खाना पूरा था,

कोई कमी नहीं थी।


कमरे में सन्नाटा फैल गया—

थाली भरी हुई थी,

पर किसी के मुँह से

एक भी शब्द नहीं निकला।



सरला बड़बड़ाईं,

“आजकल की बहुएँ बहुत चालाक हो गई हैं।”


कविता ने पहली बार

नज़रें झुकाने के बजाय

सीधे सरला की आँखों में देखा।

उसकी आवाज़ काँप रही थी,

लेकिन शब्द सधे हुए थे—


“माजी…

चालाक नहीं हूँ मैं।

बस अब हर रोज़

टूट–टूट कर

चुप रहना नहीं चाहती।”


कविता के शब्द

कमरे की दीवारों से टकराए

और वहीं थम गए।


कुछ पल के लिए

कोई आवाज़ नहीं थी—

न ताना,

न हुक्म,

न शिकायत।


बस एक भारी सन्नाटा था,

जो बहुत कुछ कह रहा था।



शाम ढलते-ढलते

रसोई में एक अजीब-सी शांति उतर आई थी।


उर्मिला ने बिना आवाज़ ऊँची किए

धीरे से कहा,

“आज… एक ही सब्ज़ी काफ़ी है।”


सरला ने राहत की साँस ली,

जैसे कंधों से कोई बोझ उतर गया हो।


शांति देवी ने कुछ कहा नहीं—

पर पहली बार

उनके होंठों से

कोई ताना नहीं निकला।




आख़िरी बात...


रसोई सिर्फ़

खाना नहीं पकाती,

वहीं रिश्ते भी

धीरे–धीरे गलते हैं।


अगर आँच ज़्यादा हो जाए,

तो स्वाद नहीं बनता,

सिर्फ़ जलन

और कड़वाहट बचती है।




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