शीशे में झांकता सच

A teenage girl sitting on a park bench looking at her phone while her mother stands behind her in a residential society park during morning time.


सुबह के साढ़े नौ बजे थे।

सोसायटी के पार्क में बच्चे खेल रहे थे और बेंच पर बैठी काव्या मोबाइल में उलझी हुई थी। कॉलेज की क्लास का समय कब निकल गया, उसे खुद भी नहीं पता चला।


“फिर क्लास मिस कर दी?”

पीछे से आई आवाज़ सुनकर काव्या चौंकी।

वह आवाज़ थी उसकी मां मीरा की—हमेशा की तरह सलीकेदार कपड़े, हल्का मेकअप और वही आत्मविश्वास।


“आपको क्या?” काव्या ने झुंझलाकर कहा।


मीरा कुछ पल चुप रही। फिर बोली,

“चलो, घर चलते हैं।”


रास्ते भर दोनों चुप रहीं।


काव्या को अपनी मां से चिढ़ होने लगी थी।

हर कोई कहता—

“तुम्हारी मां तो कमाल की हैं, बिल्कुल हीरोइन जैसी।”


और फिर वही बात—

“तुम तो उनसे बिल्कुल अलग हो।”


यह ‘अलग’ शब्द काव्या के दिल में चुभता था।



काव्या के पिता का देहांत पाँच साल पहले हो गया था।

उसके बाद मीरा ने खुद को बेटी में ही समेट लिया था।

न नौकरी छोड़ी,

न ज़िंदगी।


धीरे-धीरे मीरा की ज़िंदगी में राहुल आया।


राहुल शांत स्वभाव का था।

ना ज़्यादा बोलने वाला,

ना ज़्यादा दिखावा।


मीरा ने जब शादी का ज़िक्र किया, काव्या ने सीधे मना नहीं किया—

लेकिन मन से कभी स्वीकार भी नहीं किया।


राहुल उसके लिए

मां का पति था,

पिता नहीं।



शादी के बाद सब कुछ बदल गया।


मीरा पहले से ज़्यादा खिलने लगी।

हँसने लगी।

तैयार रहने लगी।


और काव्या?

वह और ज़्यादा चुप,

और ज़्यादा अकेली।


उसे लगने लगा कि

मां की सुंदरता ही उसकी दुश्मन है।


अगर मां ऐसी न होतीं,

तो पापा ही सब कुछ होते।

कोई राहुल नहीं आता।




धीरे-धीरे काव्या ने खुद को राहुल के करीब लाना शुरू किया।


छोटी-छोटी बातें,

झूठी बीमारियाँ,

रात में डर लगने का बहाना।


राहुल हर बार

उसे बेटी की तरह ही संभालता।


लेकिन काव्या का मन

गलत दिशा में भटक चुका था।


वह चाहती थी—

राहुल मां को छोड़ दे।

मां को वही दर्द महसूस हो,

जो वह महसूस कर रही थी।



एक रात मीरा अपनी बहन के घर गई हुई थी।


काव्या जानबूझकर राहुल के कमरे में चली गई।

आँखों में नकली आँसू,

आवाज़ में कंपकंपी।


“मुझे डर लग रहा है…”


राहुल चौंका,

फिर उठा और चादर ठीक कर दी।


“डरने की ज़रूरत नहीं है,”

कहकर वह बाहर चला गया।


उस रात राहुल सोया नहीं।



अगले दिन मीरा लौट आई।


शाम को राहुल ने सब कुछ बता दिया।


बिना आरोप,

बिना शिकायत।


बस चिंता।


“मीरा… काव्या बहुत अकेली है।

वह मदद मांग रही है—गलत तरीके से।”


मीरा का दिल बैठ गया।


उसने पहली बार

खुद को आईने में देखा।


और समझा—

वह माँ तो बनी रही,

लेकिन बेटी का डर नहीं देख पाई।



उस रात मीरा चुपचाप काव्या के बिस्तर के पास आकर बैठ गई।

न चेहरे पर शिकन थी,

न आवाज़ में शिकवा।


न कोई डांट,

न कोई सवाल।


कुछ पल वह बस काव्या को देखती रही—

उस बच्ची को,

जो कब बड़ी हो गई,

उसे पता ही नहीं चला।


फिर बहुत धीमी आवाज़ में मीरा ने कहा—


“अगर कभी मेरी किसी बात,

मेरे किसी फैसले,

या मेरी मौजूदगी से तुम्हें यह महसूस हुआ हो

कि तुम किसी से कम हो…

तो समझ लो,

वह मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी नाकामी है।”


इतना सुनते ही काव्या का बांध टूट गया।

अब तक जो आँसू भीतर ही भीतर जम गए थे,

वे एक साथ बह निकले।


वह उठकर मां से लिपट गई—

बिल्कुल वैसे ही,

जैसे कोई खोया हुआ बच्चा

अपनी सबसे सुरक्षित जगह पा ले।


मीरा ने उसे कसकर थाम लिया।

उस रात

मां ने बेटी को नहीं,

और बेटी ने मां को नहीं—

बल्कि दोनों ने

एक-दूसरे को पा लिया।



कुछ महीनों बाद—


काव्या अब रोज़ कॉलेज जाने लगी थी।

उसने काउंसलिंग शुरू कर दी थी, जिससे उसका मन धीरे-धीरे हल्का होने लगा।

वह अपनी बातें खुलकर कहने लगी थी और पहले जैसी चिड़चिड़ी नहीं रही।


मीरा ने भी अपना काम थोड़ा कम कर दिया था।

अब वह काव्या के साथ ज़्यादा समय बिताने लगी थी।

बेटी को सुनना और समझना अब उसकी पहली ज़रूरत बन गया था।


और राहुल?


वह पहले जैसा ही था—

शांत, समझदार और जिम्मेदार।

उसने कभी ज़ोर नहीं डाला,

बस एक पिता की तरह हमेशा साथ खड़ा रहा।


एक दिन कॉलेज जाते समय काव्या ने खुद कहा—

“पापा… आज मुझे छोड़ दीजिए।”


राहुल मुस्कुराया और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गया।

थोड़ी दूरी पर खड़ी मीरा यह सब देख रही थी।

उसके चेहरे पर सुकून की मुस्कान थी।


अब आईने में

तीनों के चेहरे साफ दिखते थे—

बिना डर,

बिना शिकायत,

और बिना उलझन।





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