खामोशी में डूबी हुई सिया
नीलम आज सुबह बहुत जल्दी उठ गई थी।
घड़ी की सुइयाँ अभी छह पर भी नहीं पहुँची थीं, लेकिन उसकी आंखों में नींद कहां थी।
आज उसकी बेटी लौट रही थी।
चार लंबे साल बाद।
नीलम ने अलमारी खोली, सिया की पुरानी फ्रॉक को छुआ।
वही नीली फ्रॉक, जिसे पहनकर सिया बचपन में पूरे घर में दौड़ा करती थी।
नीलम की आंखें भर आईं।
“मेरी बच्ची… पता नहीं कैसी होगी अब,”
उसने खुद से कहा।
सिया जब लंदन गई थी, तब कितनी चहकती थी।
“मम्मी, मैं कुछ बड़ा करना चाहती हूं।
आपको मुझ पर गर्व होगा,”
कहकर उसने नीलम को कसकर गले लगाया था।
उस दिन नीलम ने मुस्कुराते हुए उसे विदा किया था,
लेकिन दिल के किसी कोने में डर छुपा था।
सिया के पिता के जाने के बाद
नीलम ने सिया और परी को कभी कमज़ोर महसूस नहीं होने दिया।
खुद रोई,
लेकिन बच्चों के सामने हमेशा मजबूत बनी रही।
एयरपोर्ट पर जैसे ही सिया बाहर आई,
नीलम का दिल बैठ गया।
वह वही बेटी थी…
लेकिन उसकी आंखों में वो चमक नहीं थी।
नीलम ने आगे बढ़कर उसे गले लगाया।
“मेरी जान… कैसी हो?”
सिया का शरीर कांप गया।
उसने जैसे किसी तरह खुद को संभालते हुए कहा,
“ठीक हूं, मम्मी।”
बस इतना ही।
नीलम ने महसूस किया—
यह आवाज उसकी बेटी की नहीं थी।
यह किसी टूटे हुए इंसान की आवाज थी।
घर लौटते वक्त सिया खिड़की से बाहर देखती रही।
नीलम ने कई बार कुछ कहना चाहा,
लेकिन हर बार शब्द गले में अटक गए।
घर पहुंचकर छोटी बहन परी खुशी से दौड़ी।
“दीदी!”
लेकिन सिया बस खड़ी रही।
उस रात नीलम ने देखा—
सिया ने खाना छूआ तक नहीं।
रात में वह बार-बार डरकर उठ जाती।
कभी रोती,
कभी खुद से लड़ती।
नीलम चुपचाप दरवाजे के बाहर बैठ जाती।
अंदर से आती सिया की दबी-दबी सिसकियां
नीलम के दिल को चीर देतीं।
“मेरी बच्ची किस दर्द में है…
और मैं कुछ नहीं कर पा रही,”
नीलम खुद को कोसती।
डॉक्टर ने बताया—
सिया गहरे मानसिक आघात से गुज़र चुकी है।
डर, शर्म, अपराधबोध—
सबने उसे अंदर से तोड़ दिया है।
कारण पूछने पर सिया बस इतना कहती—
“मम्मी, मैं थक गई हूं।”
एक दिन नीलम को सिया की पुरानी डायरी मिली।
आखिरी पन्ने पर लिखा था—
“मैंने भरोसा किया।
और उसी भरोसे ने मुझे तोड़ दिया।”
नीलम का दिल कांप उठा।
सिया की दोस्त हन्ना से बात करने के बाद
जो सच सामने आया,
उसने नीलम की दुनिया उजाड़ दी।
एक ऐसा इंसान,
जिस पर सिया ने भरोसा किया…
वही उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा ज़ख्म बन गया।
सिया ने चुप्पी इसलिए ओढ़ ली थी
क्योंकि वह डर गई थी।
शर्मिंदा थी।
अकेली थी।
नीलम को लगा जैसे किसी ने उसकी बेटी को
जिंदा दफना दिया हो।
उस रात नीलम ने पहली बार
खुद को टूटने दिया।
लेकिन अगली सुबह
वह फिर खड़ी हो गई।
क्योंकि वह मां थी।
नीलम लंदन गई।
अकेली… लेकिन अपने भीतर एक मां की अडिग ताक़त लिए हुए।
उसने हर दरवाज़ा खटखटाया—
पुलिस के, अदालत के, कॉलेज के।
कहीं सवालों की बौछार थी,
कहीं तिरस्कार भरी नज़रें,
कहीं ऐसे शब्द जो आत्मा तक को घायल कर दें।
हर जगह उसे एक ही बात सुननी पड़ी—
“सबूत नहीं हैं।”
“अब इतने समय बाद क्या फ़ायदा?”
नीलम ने अपमान को चुपचाप सह लिया,
आंसुओं को भीतर दबा लिया,
लेकिन हौसले को टूटने नहीं दिया।
वह हर बार बस इतना ही कहती—
“मेरी बेटी का दर्द ही मेरा सबसे बड़ा सबूत है।
अगर वह झूठ बोल रही होती,
तो आज यूँ खामोशी में टूट नहीं रही होती।”
यह लड़ाई आसान नहीं थी।
यह दिनों की नहीं, महीनों की लड़ाई थी।
थकाने वाली…
पर पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं थी।
क्योंकि नीलम सिर्फ इंसाफ़ नहीं चाहती थी—
वह अपनी बेटी की टूटी हुई ज़िंदगी को
फिर से जोड़ना चाहती थी।
लेकिन इंसाफ मिला।
सिया आज भी पूरी तरह ठीक नहीं है।
वह आज भी भीड़ से डरती है।
आज भी नींद में चौंक जाती है।
लेकिन अब—
वह अकेली नहीं है।
नीलम हर रात उसके पास बैठती है।
उसके बाल सहलाती है।
और धीरे-धीरे उसे फिर से जीना सिखा रही है।
यह कहानी सिर्फ सिया की नहीं है।
यह हर उस लड़की की है
जो खामोशी में टूटती है।
और हर उस मां की,
जो अपने बच्चे के लिए
दुनिया से लड़ जाती है।

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