दो आँगन, एक रिश्ता

Rural Indian village home with a poor woman welcoming her sister and brother-in-law with a traditional aarti, showing warmth and simplicity.



गाँव के किनारे बसे एक छोटे से इलाके में

दो बहनें रहती थीं — मीरा और नंदिनी।


मीरा बड़ी थी।

उसकी शादी शहर के एक बड़े बिज़नेसमैन राघव से हुई थी।

एसी वाला घर, चमकदार फर्नीचर,

हर कमरे में खुशबू और हर चीज़ समय पर।


नंदिनी छोटी थी।

उसकी शादी हुई थी मोहन से —

जो एक सरकारी स्कूल में चपरासी था।

छोटा सा कच्चा घर,

बरसात में टपकती छत

और रसोई में धुएँ से काली दीवारें।


लेकिन एक बात दोनों बहनों में बराबर थी —

प्यार।



एक दोपहर मीरा ने नंदिनी को फोन किया।


“कैसी हो मेरी छोटी?”

“दीदी… सब ठीक चल रहा है। आप बताओ?”

मीरा ने हल्की साँस ली।

“सब कुछ है नंदिनी… लेकिन मन खाली-सा रहता है।”


फोन के उस पार कुछ पल की चुप्पी रही,

फिर नंदिनी की नरम-सी आवाज़ आई —

“तो यहाँ आ जाओ दीदी। कुछ दिन मेरे पास रहो।

शायद मन हल्का हो जाए।”


मीरा के होंठों पर मुस्कान आ गई।

उसे लगा जैसे

दिल के बंद पड़े दरवाज़े पर

किसी ने धीरे से दस्तक दी हो।


शाम ढलते ही मीरा ने राघव से बात की।


“मैं नंदिनी के घर जाना चाहती हूँ…

कुछ दिनों के लिए।”


राघव ने अख़बार मोड़ा

और उसे हैरानी से देखने लगा।

“वहाँ?

उसका छोटा-सा घर?

मीरा, तुम वहाँ एडजस्ट नहीं कर पाओगी।”


मीरा ने शांत स्वर में कहा —

“शायद नहीं…

पर कोशिश तो कर सकती हूँ ना?”


कमरे में कुछ पल की खामोशी छा गई।

फिर राघव ने गहरी साँस लेकर कहा —

“ठीक है।

अगर तुम चाहती हो, तो चलेंगे।”



गरीबी का स्वागत...


नंदिनी ने सुबह से ही घर की तैयारी शुरू कर दी थी।

कच्चे फर्श पर लीप-पोत किया,

फटी हुई पुरानी चादर हटाकर दूसरी बिछाई,

मिट्टी के गिलास अच्छे से धोए

और चूल्हे पर दूध चढ़ा दिया।


घर छोटा था,

पर उसकी कोशिश बड़ी थी।


जब मीरा और राघव घर पहुँचे,

नंदिनी ने थाली में दीप जलाया

और दोनों की आरती उतारी।


हल्की मुस्कान के साथ बोली—

“आइए दीदी…

घर भले ही छोटा है,

पर दिल पूरा खुला है।”


राघव की नज़रें घर में घूम गईं—

एक ही कमरा,

बीच में रखी एक खाट,

कोने में रखा मिट्टी का घड़ा।


वह सब देखता रहा,

पर कुछ बोला नहीं।



साधारण खाना, असाधारण स्वाद...


रात हो चुकी थी।

रसोई में चूल्हे की आँच धीमी पड़ रही थी।


नंदिनी ने सबके सामने

दाल, चावल और लौकी की सादी-सी सब्ज़ी परोस दी।


मीरा ने चुपचाप पहला कौर मुँह में रखा।

एक पल को उसके हाथ रुक गए।

फिर उसने आँखें बंद कर लीं।


“नंदिनी…”

उसकी आवाज़ में हैरानी भी थी और सुकून भी,

“इतना स्वाद तो मैंने बरसों में नहीं चखा।

सच कहूँ तो आज पेट नहीं, दिल भर गया।”


राघव सामने बैठा था।

वो बिना कुछ बोले

धीरे-धीरे खाना खा रहा था।

न तारीफ़ की,

न कोई शिकायत की—

बस हर कौर के साथ

कुछ सोचता चला गया।


तभी मोहन हल्की मुस्कान के साथ बोला—

“भइया,

घर में घी नहीं था…

पर जो था, वो दिल से बनाया है।”


मोहन की बात सुनकर

राघव ने पहली बार

थाली से नज़र उठाई

और सीधे मोहन की आँखों में देखा।


उस पल

उसने सिर्फ एक गरीब आदमी नहीं देखा,

उसने एक संतुष्ट इंसान देखा।



रात का फैसला...


नंदिनी और मोहन

आँगन में चुपचाप

चटाई बिछाने लगे।


मीरा ने यह देखा

तो रुक गई।


उसने धीरे से पूछा —

“तुम लोग बाहर क्यों सो रहे हो?”


नंदिनी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा —

“दीदी, आप हमारे घर की मेहमान हो।”


मीरा कुछ पल तक

उसे देखती रही।


फिर बिना कोई जवाब दिए

वह भीतर गई,

अपनी चादर उठाई

और आँगन में आकर

चटाई पर लेट गई।


धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में बोली —

“आज मैं भी यहीं सोऊँगी।”


आँगन के ऊपर

तारों से भरा आसमान फैला था।

हल्की-हल्की ठंडी हवा

चेहरे को छू रही थी।


और मीरा के दिल में

कई दिनों बाद

एक अजीब-सी शांति उतर आई।


घर के भीतर

राघव अपनी छत की ओर

देर तक देखता रहा।


उसे पहली बार महसूस हुआ —

कि आराम बिस्तर से नहीं,

अपनेपन से मिलता है।


बदलाव की शुरुआत...


अगली सुबह जब सूरज की हल्की किरणें आँगन में उतरीं,

तो राघव की आँख खुल गई।


उसने देखा —

मोहन आँगन में झाड़ू लगा रहा था।

नंदिनी पास ही कुएँ से पानी भरकर ला रही थी।


ना कोई जल्दी,

ना कोई चिड़चिड़ापन।


दोनों साथ-साथ काम कर रहे थे।

कभी मुस्कुरा लेते,

कभी एक-दूसरे से छोटी-छोटी बातें कर लेते।


उनके चेहरों पर थकान नहीं थी,

बस अपनापन था।


राघव कुछ देर उन्हें देखता रहा।

फिर अनायास ही पूछ बैठा —


“मोहन…

इतना काम करते हो,

थकते नहीं हो क्या?”


मोहन ने झाड़ू रोक दी।

नंदिनी की ओर देखा,

और हल्की सी मुस्कान के साथ बोला —


“थकान तब होती है साहब,

जब काम तो हो

पर साथ देने वाला कोई न हो।”


ये शब्द

सीधे राघव के दिल में उतर गए।

उसे लगा जैसे

किसी ने उसके भीतर

सच का आईना रख दिया हो।


सच का आईना...


रात गहरी हो चुकी थी।

आँगन में तारे चुपचाप चमक रहे थे।


राघव देर तक करवटें बदलता रहा,

फिर अचानक धीमी आवाज़ में बोला—


“मीरा…

मेरे पास दौलत है, आराम है,

लेकिन तुम्हारे लिए

मेरे पास कभी वक्त नहीं रहा।”


मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया।

वो बस सामने देखती रही।


उसकी आँखों में

शिकायत नहीं थी,

बस बरसों की थकान,

अधूरी बातें

और वो इंतज़ार था

जो हर शाम दरवाज़े की तरफ देखता रह जाता है।


राघव ने उसकी आँखों की तरफ देखा—

और पहली बार समझा कि

चुप्पी भी कभी-कभी

सबसे तेज़ आवाज़ होती है।


उस पल

उसे एहसास हुआ—

वो अमीर तो बहुत था,

लेकिन अपनी पत्नी के वक़्त में

सबसे ज़्यादा खाली वही था।



शहर लौटते वक्त...


शहर की ओर जाती गाड़ी

धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।


खिड़की के बाहर

खेत पीछे छूट रहे थे,

लेकिन राघव का मन

अब भी उसी छोटे से आँगन में अटका हुआ था।


उसने चुपचाप

मीरा का हाथ थाम लिया।


मीरा चौंकी,

“क्या हुआ?”


राघव की आवाज़ धीमी थी,

लेकिन उसमें पहली बार सच्चाई थी।


“मीरा…

मैं बदलना चाहता हूँ।”


“अचानक?”

मीरा ने पूछा।


राघव ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—


“क्योंकि मैंने

एक गरीब घर में

अमीर रिश्ते देखे हैं।

जहाँ पैसा कम था,

लेकिन समय, अपनापन

और साथ भरपूर था।”


मीरा की आँखें भर आईं,

उसने कुछ नहीं कहा,

बस राघव का हाथ

और कसकर पकड़ लिया।


उस दिन के बाद

राघव का बदला हुआ रूप

सिर्फ़ शब्दों तक सीमित नहीं रहा।


वह अब

समय पर घर लौटने लगा,

मीरा के साथ बैठकर

चाय की चुस्कियाँ लेने लगा,


मोबाइल साइड में रखकर

उससे दिल की बातें करने लगा।


और मीरा ने महसूस किया—

जब पति का समय मिल जाए,

तो

ज़िंदगी अपने आप

मुस्कुराने लगती है।



नंदिनी के घर गरीबी थी,

पर प्यार की कोई कमी नहीं।


मीरा के घर

सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी,

बस अपनों के लिए

वक्त नहीं था।


और सच तो यह है कि

जिस घर में

वक्त और प्यार

एक साथ रहने लगें,


वो घर

ईंट–पत्थर से नहीं,

रिश्तों से बना महल

हो जाता है।






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