तुम्हें बस सहना नहीं पड़ेगा

Indian working woman standing in a home kitchen during morning light, expressing quiet strength and emotional depth


“नेहा… तुम ये नमक कम क्यों डालती हो?”

पीछे से आई आवाज़ में सवाल कम, आदेश ज़्यादा था।


नेहा ने चुपचाप सब्ज़ी में थोड़ा और नमक डाल दिया।

घड़ी देखी — सुबह के सात बज रहे थे।

आठ बजे उसकी मीटिंग थी, और अभी तक वह नहाई भी नहीं थी।


ड्रॉइंग रूम में अख़बार फैला था।

सोफे पर बैठे रोहित के पापा चश्मे के ऊपर से उसे देख रहे थे,

और रसोई के दरवाज़े पर खड़ी थीं — सुमित्रा देवी।

घर की धुरी।

घर की परंपरा।


रोहित बेडरूम में टाई बाँध रहा था।


“रोहित, तुम्हारा टिफिन—”

नेहा ने आवाज़ लगाई।


“हाँ, रख दो… मैं ले लूँगा,”

उसने बिना बाहर आए कहा।


नेहा मुस्कुरा दी।

उसकी मुस्कान वैसी ही थी —

जैसे आदत में बदल चुकी हो।



नेहा की शादी को चार साल हो चुके थे।


वह एक आईटी कंपनी में काम करती थी—

अच्छी सैलरी, तेज़ दिमाग,

और कभी ज़ोर से हँसने वाली लड़की।


शादी से पहले उसकी हँसी कमरे भर जाती थी।

अब वह धीरे बोलती थी,

धीरे मुस्कुराती थी,

और ज़्यादातर चुप रहती थी।


ऑफिस में वह अब भी वही नेहा थी—

मीटिंग में आत्मविश्वास से भरी,

डेडलाइन से पहले काम पूरा करने वाली,

सही सवाल पूछने वाली।


लेकिन घर की देहलीज़ पर कदम रखते ही

वह जैसे छोटी हो जाती थी।


सुमित्रा देवी का साफ़ मानना था—

“बहू बाहर काम करे, कोई आपत्ति नहीं।

पर घर पहला धर्म होता है।”


और नेहा हर दिन

दोनों धर्म निभाने की कोशिश करती—


सुबह जल्दी उठकर नाश्ता,

फिर ऑफिस की दौड़,

शाम को थकी देह के साथ रसोई,

और रात को अगले दिन की तैयारी।


ऑफिस में वह प्रोफेशनल थी,

घर में…

अदृश्य।


जो दिखता था, वो बस उसका काम था।

थकान नहीं,

चुप्पी नहीं,

उसकी खामोश आँखें नहीं।


रोहित बुरा आदमी नहीं था।

वह गुस्सैल नहीं था,

न शराबी,

न मारपीट करने वाला।


वह बस “बीच में फँसा” हुआ था।


माँ और पत्नी के बीच,

पर हमेशा माँ की तरफ़ थोड़ा ज़्यादा झुका हुआ।


हर बार वही वाक्य—

“माँ का स्वभाव ऐसा ही है, नेहा…

तुम समझदार हो, थोड़ा एडजस्ट कर लो।”


और नेहा हर बार

अपनी ही समझदारी से हार जाती थी।


वह सोचती—

क्या हर बार समझदार होना

सिर्फ़ चुप रह जाना होता है?


क्या एडजस्टमेंट का मतलब

अपनी आवाज़ धीरे-धीरे खो देना है?


चार सालों में

उसने झगड़े नहीं बढ़ाए,

पर सवाल भी नहीं पूछे।


उसकी हँसी पहले ही धीमी हो चुकी थी।

अब उसकी इच्छाएँ भी

आवाज़ के बिना रहने लगी थीं।


घर में सब कुछ चलता था—

खाना, कपड़े, रिश्ते।


बस नेहा

खुद को कहीं पीछे छोड़ती जा रही थी।



एक शाम नेहा देर से लौटी।


ऑफिस में प्रोजेक्ट की डेडलाइन थी।

दिन भर की थकान बदन में थी,

लेकिन मन हल्का था—

काम अच्छा हुआ था।


दरवाज़ा खोलते ही

घर का सन्नाटा

सीधे उसके भीतर उतर गया।


रसोई में कोई खनक नहीं थी,

टीवी की आवाज़ भी नहीं।


रोहित ने सोफे से उठे बिना कहा—

“आज खाना बाहर से मँगवा लिया है।”


नेहा ने बस सिर हिलाया।


तभी भीतर से सुमित्रा देवी की आवाज़ आई—

“क्योंकि बहू को घर की फिक्र कहाँ होती है?”


शब्द तेज़ नहीं थे,

पर उनका वज़न बहुत था।


नेहा ने पलटकर जवाब नहीं दिया।

न सफ़ाई दी,

न शिकायत की।


उसने चुपचाप

बैग से पानी की बोतल निकाली,

दो घूँट पिए,

और अपने कमरे की ओर बढ़ गई।


उस रात नेहा रोई नहीं।

तकिये में मुँह छिपाकर

सिसकी भी नहीं।


वो बस

छत को देखती रही।


सोचती रही—

दिन भर की मेहनत

क्या सच में

इतनी आसानी से अदृश्य हो जाती है?



कुछ हफ्तों बाद रोहित ने कहा,

“कंपनी ने मुझे दूसरी ब्रांच में भेजा है।”


नेहा चौंकी।

“कहाँ?”


“इंदौर,”

उसने जल्दी से कहा।


नेहा के भीतर कुछ खिसक गया।

नया शहर।

नया घर।

और शायद… रिश्ते का नया रूप।


“और माँ?”

नेहा ने डरते हुए पूछा।


रोहित चुप हो गया।

फिर बोला —

“माँ… यहीं रहेंगी। पापा के पास।”


नेहा ने कुछ नहीं कहा।

उसे लगा, उसने सवाल ज़्यादा पूछ लिया।



नया शहर, नई साँस...


नया शहर था।

नया फ्लैट।


बालकनी से नीचे जाती सड़क दिखती थी—

लगातार चलती हुई,

जैसे ज़िंदगी फिर से रफ्तार पकड़ रही हो।


नीचे बच्चों की आवाज़ें गूँजती रहतीं—

हँसी, शोर,

और वो बेफ़िक्री

जो नेहा ने बहुत समय बाद सुनी थी।


इस घर में नेहा ने

पहली बार परदे अपनी पसंद के लगाए।

हल्के रंग के—

जो रोशनी रोकते नहीं थे,

बस उसे नरम कर देते थे।


पहली बार रसोई में

रेडियो चलाया।

पुराने गाने,

जिन्हें वो कभी मन ही मन गुनगुनाती थी,

आज खुलकर बज रहे थे।


और पहली बार

उसने बिना डर के साँस ली।


न कोई ताना,

न कोई जल्दी,

न कोई अनकहा दबाव।


तीसरे दिन

जब वो रसोई में आई,

तो रुक गई।


रोहित सब्ज़ी काट रहा था।

ध्यान से।

जैसे कोई साधारण काम

पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कर रहा हो।


नेहा के मुँह से

अनायास निकल पड़ा—

“तुम?”


रोहित ने सिर उठाया,

हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला—

“तुम रोज़ करती थी…

आज मेरी बारी है।”


नेहा कुछ नहीं बोली।

उसकी आँखें भर आईं।


क्योंकि उस एक शब्द में

कोई एहसान नहीं था,

कोई दिखावा नहीं।


बस बराबरी थी।

साथ था।

और वो अपनापन,

जो किसी भी नए शहर को

घर बना देता है।



एक रात नेहा ने बहुत हिम्मत जुटाकर पूछा—


“सच बताओ…

ये ट्रांसफर सच में था?”


रोहित कुछ पल चुप रहा।

उसकी चुप्पी में ही जवाब लटका हुआ था।


फिर उसने धीरे से कहा—


“नहीं।”


नेहा का दिल ज़ोर से धक से रह गया।

जैसे किसी ने अचानक ज़मीन खींच ली हो।


“मैंने झूठ बोला,”

रोहित की आवाज़ में पछतावा साफ़ था।

“मुझे डर था…

अगर सच कह दिया,

तो तुम कभी उस घर से निकल ही नहीं पाओगी।”


नेहा ने उसकी तरफ देखा।

आँखों में सवाल भी थे,

और एक टूटी हुई उम्मीद भी।


“तो ये सब…

नौकरी, शहर, सब कुछ?”


“तुम्हारे लिए,”

रोहित की आवाज़ भर्रा गई।

“मैंने तुम्हें रोज़ टूटते देखा है, नेहा।

धीरे-धीरे।

और अब और नहीं देख सकता था।”


नेहा रो पड़ी।

इस बार छुपकर नहीं,

बिना डर के।

बिना ये सोचे कि कोई क्या कहेगा।


कुछ देर बाद उसने कहा—


“माँ नाराज़ हो जाएँगी।”


रोहित ने उसका हाथ थाम लिया।

आवाज़ शांत थी, पर पक्की—


“तो होने दो।

मैं उनका बेटा हूँ…

पर तुम मेरी ज़िंदगी हो।”


उस पल नेहा ने समझा—

प्यार हमेशा ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता।

कभी-कभी वो

एक झूठ बनकर भी

किसी को बचा लेता है।



आज भी वे हर महीने

माँ से मिलने जाते हैं—


दिन में।

और रात होने से पहले

वापस लौट आते हैं।


सुमित्रा देवी

आज भी वैसी ही हैं।

शायद बदलना

उनकी आदत में कभी रहा ही नहीं।


लेकिन नेहा बदल गई है।


अब वह चुप रहकर

सब सहती नहीं—

अब वह बोलती है।


अब वह डरकर

पीछे नहीं हटती—

अब वह साथ चलती है।


और रोहित?


उसे समझने में देर लगी,

पर एक दिन

उसने सही जगह खड़े होने का

फ़ैसला कर ही लिया।


क्योंकि रिश्ते निभाने के लिए

कभी-कभी

“अच्छा बेटा” बनने से ज़्यादा ज़रूरी होता है

“अच्छा इंसान” बनना।


और एक स्त्री को

घर नहीं चाहिए—

उसे चाहिए हिम्मत,

वो हिम्मत

जो उसे

अपना समझे।





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