दो रास्ते
रात के लगभग ग्यारह बजे थे।
घर की लाइटें जल रही थीं, लेकिन माहौल बुझा-बुझा था।
दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
“ये क्या तरीका है, काव्या?”
पापा की आवाज़ गूँजी।
“इतनी रात को घर आना, वो भी इस हालत में… और ये लड़का कौन है?”
काव्या लड़खड़ा रही थी। उसके साथ खड़ा था एक युवक, जिसने उसका हाथ कसकर पकड़ रखा था।
“पापा, ये मेरा बॉयफ्रेंड अर्जुन है,”
काव्या ने बेपरवाही से कहा।
“और आप उसके साथ ऐसे बात नहीं कर सकते। चलो अर्जुन, तुम जाओ… हम कल मिलेंगे।”
“काव्या!”
माँ ने नाराज़ होकर कहा,
“तुम्हें शर्म नहीं आती? नशे में घर आ रही हो!”
“मम्मी प्लीज़,”
काव्या ने चिढ़ते हुए कहा,
“मैं बहुत थकी हूँ। आपके लेक्चर बाद में सुन लूँगी। अभी मुझे सोना है।”
और वह सीधा अपने कमरे में चली गई।
पापा कुर्सी पर बैठ गए।
गुस्से और बेबसी से।
“रीना,” उन्होंने माँ से कहा,
“हमने इसे बहुत ज़्यादा आज़ादी दे दी। अब सोच रहा हूँ, इसका रिश्ता तय कर देना चाहिए।”
“मेरे दोस्त का बेटा है,”
उन्होंने आगे कहा,
“अच्छी नौकरी है, अच्छा परिवार है।”
माँ ने धीरे से कहा,
“मैं काव्या की मर्ज़ी के खिलाफ कुछ नहीं करूँगी। सुबह बात कर लेंगे।”
लेकिन उस रात माँ को नींद नहीं आई।
डरावना सपना
नींद में उन्होंने देखा—
“मम्मी… मैं प्रेग्नेंट हूँ,”
काव्या रोती हुई कह रही थी।
“अर्जुन के बच्चे की माँ बनने वाली हूँ।”
रीना घबराकर उठ बैठीं।
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
“क्या हुआ?”
पापा ने पूछा।
“कुछ नहीं,”
उन्होंने जल्दी से कहा।
“लेकिन… आप उसका रिश्ता तय कर दीजिए। मैं उसे समझा लूँगी।”
दो बेटियाँ, दो सोच...
उधर उसी मोहल्ले में रहती थी नेहा।
नेहा ज़्यादा बोलती नहीं थी।
ना पार्टी, ना दिखावा।
एक दिन उसकी माँ ने कहा,
“बेटा, हमने तुम्हारे लिए रिश्ता देखा है। लड़का इंजीनियर है, परिवार सादा है।”
नेहा ने बिना बहस के कहा,
“अगर आप दोनों को ठीक लगता है, तो मुझे भी मंज़ूर है।”
माँ की आँखें भर आईं।
टकराव...
सुबह नाश्ते की मेज़ पर माहौल बिल्कुल शांत था,
लेकिन उस शांति के पीछे तूफ़ान छुपा हुआ था।
काव्या ने बिना किसी झिझक के कहा—
“मैंने अपना फैसला कर लिया है।
अगर मैं शादी करूँगी, तो सिर्फ अर्जुन से।”
उसकी बात सुनते ही पापा का चेहरा सख़्त हो गया।
उन्होंने भारी आवाज़ में कहा—
“बहुत हो गया काव्या।
अब तक जो छूट दी थी, वो प्यार था, कमज़ोरी नहीं।
लेकिन अब इस घर में मेरी बात चलेगी।”
काव्या की आँखों में ज़िद साफ दिखाई दे रही थी।
वह ताना मारते हुए बोली—
“तो आप जो करना चाहते हैं कर लीजिए।
लेकिन याद रखिए,
अब मैं भी वही करूँगी जो मुझे ठीक लगेगा।”
इतना कहकर काव्या कुर्सी पीछे खिसकाती हुई उठी
और बिना किसी को देखे अपने कमरे में चली गई।
कमरे में फिर वही सन्नाटा रह गया—
जिसमें टूटते रिश्तों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
सगाई और भागना...
एक ही दिन—
नेहा की सगाई तय हुई
काव्या की भी
लेकिन सगाई के दिन…
“रीना!”
पापा घबराकर बोले,
“काव्या कमरे में नहीं है।”
काव्या भाग चुकी थी।
मोहल्ले में बातें फैल गईं—
“इतनी आज़ादी का नतीजा यही होता है।”
“देखा, बाहर की हवा क्या कर देती है।”
वहीं नेहा की सगाई की तारीफ़ हो रही थी।
शादी और सच्चाई...
तीन दिन बाद, देर रात—
काव्या दरवाज़े पर खड़ी थी।
गले में माला।
“मैंने अर्जुन से शादी कर ली है,”
उसने कहा।
“बिना पूछे?”
पापा का गुस्सा फूट पड़ा।
“हमें आपके आशीर्वाद की ज़रूरत नहीं,”
काव्या बोली।
उस रात उसे घर से निकाल दिया गया।
कुछ महीनों में ही अर्जुन का असली चेहरा सामने आ गया।
ना नौकरी।
ना ज़िम्मेदारी।
“हर रोज़ रोटी ही बनाती हो?”
वह चिल्लाता।
और फिर…
हाथ उठाने लगा।
काव्या चुपचाप सहती रही।
मुलाक़ात...
एक दिन दोपहर के समय बाज़ार में हलचल थी।
सब्ज़ियों की आवाज़ें, ग्राहकों की भीड़ और गाड़ियों का शोर चारों तरफ़ फैला हुआ था।
उसी भीड़ में एक कार आकर रुकी।
कार से नेहा उतरी।
तभी उसकी नज़र सड़क के किनारे लगे एक छोटे से सब्ज़ी के ठेले पर पड़ी।
वहाँ सिर झुकाए, चुपचाप सब्ज़ियाँ तौल रही थी — काव्या।
नेहा एक पल को रुक गई।
उसे अपनी आँखों पर भरोसा नहीं हुआ।
“काव्या…?”
उसकी आवाज़ अनायास ही निकल गई।
काव्या ने सिर उठाया।
एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं।
“नेहा…?”
काव्या की आवाज़ काँप गई।
नेहा तेज़ी से उसके पास आई।
काव्या के चेहरे पर थकान साफ़ दिख रही थी,
और बाँहों पर पड़े नीले निशान उसकी तकलीफ़ चुपचाप बयान कर रहे थे।
“तुम ठीक हो?”
नेहा ने धीरे से पूछा।
इतना सुनते ही काव्या का बाँध टूट गया।
वह वहीं खड़ी-खड़ी रोने लगी।
“नहीं नेहा… मैं ठीक नहीं हूँ,”
उसने रोते हुए कहा।
“मैंने अपनी ज़िंदगी खुद बर्बाद कर ली।”
और फिर,
भीड़ से बेख़बर होकर,
काव्या ने नेहा को अपनी पूरी कहानी सुना दी।
साहस...
नेहा का पति एक ज़िम्मेदार पुलिस अधिकारी था।
काव्या की हालत जानने के बाद उसने चुप रहना सही नहीं समझा।
अगली रात—
घर में अँधेरा था।
अर्जुन शराब के नशे में लड़खड़ाता हुआ काव्या की ओर बढ़ा।
“आज फिर वही बहाने?”
वह चीखा और हाथ उठाने ही वाला था कि—
अचानक दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
तेज़ रोशनी कमरे में फैल गई।
वर्दी में खड़े पुलिसकर्मी अंदर घुस आए।
“यू आर अंडर अरेस्ट, अर्जुन!”
सख़्त आवाज़ गूँजी।
“तुम पर घरेलू हिंसा और शराब के नशे में अपनी पत्नी से मारपीट करने का आरोप है।”
अर्जुन हक्का-बक्का रह गया।
उसके हाथ वहीं रुक गए।
काव्या की आँखों से आँसू बह निकले—
लेकिन इस बार डर के नहीं, राहत के थे।
माफी और सीख...
नेहा काव्या को लेकर उसके माँ-पापा के सामने आकर खड़ी हो गई।
काव्या जैसे ही अपने पापा को देखती है, उसके सब्र का बाँध टूट जाता है।
वो फूट-फूटकर रो पड़ती है।
“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई, पापा…
मैंने आपकी बात नहीं मानी,
मैंने अपने ही हाथों अपनी ज़िंदगी खराब कर ली…”
काव्या की आवाज़ काँप रही थी।
उसकी आँखों में पछतावे के आँसू थे।
पापा कुछ पल उसे देखते रहे।
फिर आगे बढ़कर उसे सीने से लगा लिया।
“गलतियाँ बच्चों से ही होती हैं,”
उन्होंने भारी आवाज़ में कहा।
“लेकिन माँ-बाप का फ़र्ज़ है
उन्हें गलती के बाद भी अपनाना,
उन्हें छोड़ देना नहीं…
बल्कि सही रास्ता दिखाकर संभालना।”
काव्या अपने पापा के सीने से लगकर
और ज़ोर से रोने लगी।
उस दिन
गलती से ज़्यादा
माफी जीत गई।
काव्या ने अपनी ज़िंदगी को दोबारा सँवारने का फ़ैसला किया।
उसने फिर से पढ़ाई शुरू की और धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ी हो गई।
बीते हुए कल की गलतियों से उसने सीख ली थी—
अब उसके फैसले डर से नहीं, समझ से लिए जाते थे।
और पूरे मोहल्ले ने उस दिन एक बात समझी—
संस्कार कपड़ों, बातों या दिखावे से नहीं,
बल्कि मुश्किल वक्त में लिए गए सही फैसलों से पहचाने जाते हैं।

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