पहली रसोई, पहली पहचान
सुबह का समय था।
घर के आँगन में हल्की धूप उतर आई थी।
दरवाज़े के पास आम के पत्तों की तोरण झूल रही थी और ज़मीन पर रंगोली अब भी ताज़ी लग रही थी।
गोमती देवी का घर (मानसी और मोना का ससुराल)
“नमस्ते माँजी… नमस्ते बाबाजी,”
मानसी और मोना ने एक साथ झुककर पैर छुए।
“अरे… खुश रहो बेटा,”
गोमती देवी की आवाज़ में अपनापन था।
“देखो जी, कैसी प्यारी बहुएँ आई हैं हमारे घर।”
मोना ने हल्की मुस्कान के साथ रसोई की तरफ देखा।
छोटी सी रसोई थी—
पुराना चूल्हा, पीतल की कढ़ाही, दीवार पर टंगे मसालों के डिब्बे।
मन में एक पल को संकोच आया,
लेकिन चेहरे पर शिकन नहीं आने दी।
“माँजी, पहली रसोई में क्या बनाना है?”
मानसी ने नम्रता से पूछा।
गोमती देवी खुश होकर बोलीं,
“बेटा, जो तुम्हें अच्छा लगे।
हमारे यहाँ रस्म से ज़्यादा दिल देखा जाता है।”
मोना ने साड़ी का पल्लू ठीक किया और बोली,
“तो मैं दाल बनाऊँ और मानसी सब्ज़ी?”
“वाह!”
ससुर जी बोले,
“देखो जी, आते ही बाँट लिया काम। यही तो संस्कार हैं।”
रसोई में चूल्हा जला।
दाल में जीरा चटका।
सब्ज़ी की खुशबू पूरे घर में फैल गई।
गोमती देवी दरवाज़े पर खड़ी होकर देखती रहीं—
मन ही मन सोचती रहीं,
पैसा भले कम हो, पर दिल तो अमीर हैं।
ज्वाला देवी का घर (रानी और रेखा का ससुराल)
ज़रूर — इसे और साफ़, भावनात्मक और कहानी के प्रवाह में बेहतर करके लिख रहा हूँ। भाषा सरल रहेगी, लेकिन दृश्य ज़्यादा जीवंत लगेगा:
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उधर, बगल वाले घर में माहौल बिल्कुल अलग था।
रानी रसोई के बीच खड़ी होकर चारों ओर देखने लगी।
दीवारें पास-पास थीं, चूल्हा पुराना था और जगह बहुत कम।
उसके चेहरे पर हल्की-सी नाखुशी आ गई।
“माँजी,” उसने संकोच से कहा,
“रसोई तो… काफ़ी छोटी है।”
रेखा ने भी इधर-उधर नज़र दौड़ाई।
भौंहें सिकुड़ गईं।
“और ये चूल्हा?”
उसकी आवाज़ में हैरानी से ज़्यादा असंतोष था।
“गैस नहीं है क्या?”
ज्वाला देवी ने बात का बुरा नहीं माना।
हल्की मुस्कान के साथ बोलीं,
“है बेटा, गैस भी है।
लेकिन हमारे घर में पहली रसोई हमेशा चूल्हे पर ही होती है।
इसे शुभ माना जाता है।”
रानी और रेखा एक-दूसरे की तरफ देखने लगीं।
उनकी चुप्पी बहुत कुछ कह रही थी।
“माँ, हमें तो किचन में काम करने की आदत नहीं है,”
रेखा बोली,
“घर पर तो सब कुछ कुक ही करता था।”
ज्वाला देवी के चेहरे की मुस्कान थोड़ी धीमी हो गई।
फिर भी बोलीं,
“कोई बात नहीं बेटा, धीरे-धीरे सीख जाओगी।”
रसोई में तेल ज़्यादा गरम हो गया।
सब्ज़ी जलने लगी।
रानी झल्लाकर बोली,
“अरे! ये तो खराब हो गई।”
“मैंने कहा था कम आँच रखना,”
ज्वाला देवी ने धीमे स्वर में कहा।
रेखा ने गहरी साँस ली,
“माँजी, हमसे ये सब नहीं होगा।
आप ही बना लीजिए ना।”
कमरे में थोड़ी खामोशी छा गई।
आमना-सामना...
शाम ढल चुकी थी।
मंदिर के आँगन में दीयों की कतारें जल रही थीं।
हल्की-हल्की घंटियों की आवाज़ और अगरबत्ती की खुशबू हवा में घुली हुई थी।
उसी मंदिर में दोनों घरों की नई बहुएँ दीया जलाने पहुँचीं।
मोना ने सामने खड़ी लड़कियों की तरफ देखकर हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“नमस्ते… आप भी नई बहुएँ हैं क्या?”
रानी ने जल्दी से सिर पर पल्लू ठीक किया और संक्षेप में बोली,
“हाँ।”
मानसी के चेहरे पर अपनापन था।
उसने सहज भाव से पूछा,
“आज पहली रसोई थी ना? कैसी रही?”
रेखा ने होंठों पर हल्की-सी हँसी लाकर कहा,
“बस… ठीक-ठाक ही रही।
हम लोग तो इतने छोटे किचन की आदी नहीं हैं।”
मोना ने कोई जवाब नहीं दिया।
ना सवाल किया, ना सफ़ाई दी।
बस चेहरे पर एक शांत, हल्की मुस्कान बनाए रखी—
ऐसी मुस्कान, जिसमें शिकायत नहीं थी,
लेकिन समझ बहुत थी।
दीया जलाकर सब अपने-अपने घर की ओर लौटने लगे।
रास्ते में गोमती देवी ने धीमे स्वर में कहा,
“बेटा, इंसान को बड़ा घर नहीं सुंदर बनाता…
बड़ा दिल बनाता है।”
मानसी और मोना ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
बिना कुछ कहे,
दोनों हल्के से मुस्कुरा दीं—
जैसे बात समझ ली हो।
बदलता वक्त...
कुछ हफ्ते बीत गए।
मोना अब रोज़ सुबह सबसे पहले उठने लगी थी।
चूल्हा जलाना, सब्ज़ी धोना, सासू माँ के लिए गरम पानी रखना—
ये सब अब उसके दिन की शुरुआत बन चुके थे।
मानसी ने ससुर जी की दवाइयों की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी।
कौन-सी गोली कब देनी है,
किस दिन डॉक्टर को दिखाना है—
सब कुछ उसे याद रहता।
उधर रानी और रेखा का समय अलग ही ढंग से गुजरता।
अक्सर बातों-बातों में मायके की चर्चा छिड़ जाती—
“वहाँ सुबह चाय बेड पर मिलती थी…”
“हमारे घर में तो कुक ये सब संभाल लेता था…”
उनकी बातों में शिकायत नहीं थी,
लेकिन अपनापन भी नहीं था।
फिर एक दिन अचानक सब बदल गया।
ज्वाला देवी की तबीयत बिगड़ गई।
तेज़ बुखार था।
पूरा दिन चारपाई से उठना मुश्किल हो गया।
रसोई में सन्नाटा था।
कोई आवाज़ नहीं।
कोई बर्तन खनकने की नहीं।
रेखा कुछ देर दरवाज़े पर खड़ी रही।
फिर बिना कुछ कहे अंदर चली गई।
उसने दाल धोई।
चूल्हे पर रखी।
आँच धीमी रखी—
जैसे डर रही हो कि कहीं फिर कुछ गलत न हो जाए।
रानी ने चुपचाप सब्ज़ी निकाली।
पहली बार उसने ध्यान से प्याज़ काटे।
कोई शिकायत नहीं।
कोई ताना नहीं।
सिर्फ़ काम।
शाम को जब ज्वाला देवी ने दाल का एक कौर मुँह में रखा,
तो उनकी आँखें भर आईं।
कमज़ोर-सी आवाज़ में बोलीं,
“आज…
आज पहली बार ऐसा लगा
कि इस घर में सच में बहुएँ आई हैं।”
रानी और रेखा की नज़रें अपने आप झुक गईं।
शायद पहली बार उन्हें समझ आया—
रिश्ते निभाने के लिए
अमीरी नहीं,
दिल चाहिए।
आत्मबोध...
उस रात कमरा अँधेरे में डूबा था।
बस खिड़की से आती हल्की चाँदनी फ़र्श पर फैल रही थी।
रेखा देर तक करवटें बदलती रही।
नींद आँखों से कोसों दूर थी।
अचानक उसने धीमी आवाज़ में कहा—
“दीदी… शायद हम सच में गलत थे।”
रानी ने कोई जवाब नहीं दिया।
कुछ पल बाद उसने गहरी साँस ली और बोली—
“हाँ… पैसे और नाम से इंसान बड़ा नहीं बनता।
बड़ा बनाती है उसकी सोच।”
दोनों चुप हो गईं।
कमरे में पहली बार खामोशी बोझ नहीं लगी।
अगली सुबह मंदिर की घंटी की आवाज़ के साथ घर जागा।
मोना और मानसी आँगन में झाड़ू लगा रही थीं।
उनके चेहरे पर वही सादगी थी, वही अपनापन।
रानी और रेखा धीरे-धीरे पास आईं।
रानी ने हिचकिचाते हुए कहा—
“मोना… मानसी…”
दोनों ने पलटकर देखा।
रेखा ने सिर थोड़ा झुकाया और बोली—
“अगर बुरा न मानो तो एक बात कहें?”
मोना मुस्कुरा दी,
“ज़रूर।”
रानी की आवाज़ भर्रा गई—
“हमें भी सिखा दो…
कैसे इस घर को अपना बनाया जाता है।”
मानसी ने कुछ नहीं कहा।
बस आगे बढ़कर रेखा का हाथ थाम लिया।
मोना ने शांत स्वर में कहा—
“घर ईंट-पत्थर से नहीं बनता।
घर बनता है अपनाने से, समझने से।”
रेखा की आँखें भर आईं।
उस पल चारों बहुएँ अलग नहीं थीं—
बस चार दिल थे,
जो एक ही घर में धड़कना सीख रहे थे।
कहानी का भाव:
चारों बहुएँ अलग-अलग घरों से आई थीं,
लेकिन सीख एक ही थी—
👉 संस्कार दिखावे से नहीं, व्यवहार से पहचाने जाते हैं।
👉 अमीरी पैसे में नहीं, सोच में होती है।

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