हम दोनों की पहली रसोई
शादी को अभी सिर्फ दो दिन हुए थे।
घर में अभी भी मेहमानों की चहल-पहल की खुशबू थी। सुबह का समय था और रसोई में बर्तनों की खनक सुनाई दे रही थी।
नेहा घबराई हुई आटा गूंध रही थी।
“हे भगवान… आटा इतना गीला कैसे हो गया? आज मेरी पहली रसोई है और मैं तो गड़बड़ कर दूँगी…”
तभी पीछे से राहुल की आवाज़ आई —
“गड़बड़ नहीं करोगी, क्योंकि आज तुम्हारी नहीं, हम दोनों की पहली रसोई है।”
नेहा ने मुड़कर देखा — राहुल मुस्कुरा रहा था।
“आप यहाँ क्या कर रहे हैं? कोई देख लेगा तो?”
“देखने दो। जब माँ के साथ खड़ा हो सकता हूँ, तो अपनी पत्नी के साथ क्यों नहीं?”
राहुल ने डिब्बे से सूखा आटा निकाला और गीले आटे में मिलाने लगा। नेहा चूल्हा साफ करने लगी। दोनों काम करते-करते हँस भी रहे थे।
नेहा ने मज़ाक में राहुल के गाल पर आटा लगा दिया।
“ये क्या किया आपने?” राहुल हँसा।
“अब बराबरी हो गई,” नेहा खिलखिलाई।
तभी दरवाज़े पर खड़ी कविता और नयना सब देख रही थीं।
“वाह देवर जी! आज तो जोरों के गुलाम बन गए!” कविता बोली।
राहुल शांत आवाज़ में बोला —
“अगर पत्नी का साथ देना गुलामी है, तो मुझे ये मंज़ूर है।”
दोनों भाभियाँ मुँह बनाकर चली गईं।
सास का गुस्सा...
कुछ देर बाद आशा नीचे रसोई में आईं। जैसे ही उन्होंने अंदर झाँका, उनका माथा सिकुड़ गया। सामने राहुल और नेहा दोनों साथ-साथ खड़े खाना बना रहे थे। राहुल आटा बेल रहा था और नेहा सब्ज़ी में मसाले डाल रही थी। दोनों के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी।
आशा की आवाज़ थोड़ी तेज़ हो गई —
“राहुल! ये क्या चल रहा है? आज पहली रसोई है… और पहली रसोई तो बहू की होती है!”
नेहा घबरा गई। उसके हाथ रुक गए। उसे लगा शायद उससे कोई बड़ी गलती हो गई हो। वह धीरे से बोली, “माँ जी, वो… मैं…”
लेकिन इससे पहले कि वह कुछ और कह पाती, राहुल ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया। उसकी आवाज़ शांत थी, पर शब्दों में आत्मविश्वास था —
“माँ, शादी हम दोनों की हुई है। अगर बहू की पहली रसोई होती है, तो बेटे की क्यों नहीं? आज हम दोनों मिलकर खाना बना रहे हैं। इसमें गलत क्या है?”
रसोई में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। आशा ने दोनों को ध्यान से देखा। उनके चेहरे पर नाराज़गी तो थी, पर साथ ही एक सोच भी थी।
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस धीमे कदमों से मुड़कर बाहर चली गईं।
लेकिन राहुल की बात उनके मन में कहीं गहराई तक उतर चुकी थी।
पिता की समझदारी..
ऊपर कमरे में जाकर आशा गुस्से में बोलीं —
“सुनिए जी, आज आपके बेटे ने हद कर दी। बहू की पहली रसोई थी और वो खुद उसके साथ खड़ा होकर खाना बना रहा था। क्या ज़माना आ गया है? हमारे समय में ऐसा कभी हुआ था क्या?”
सुरेश ने अख़बार मोड़ा, चश्मा उतारा और शांत स्वर में बोले —
“भाग्यवान, ज़माना सच में बदल गया है… और अच्छा ही बदला है। पहले मर्द घर के काम को अपनी शान के खिलाफ समझते थे। हम लोगों से जो नहीं हो पाया, वो हमारा बेटा कर रहा है।”
आशा अभी भी नाराज़ थीं —
“पर लोग क्या कहेंगे? बेटा बीवी के पीछे-पीछे घूम रहा है।”
सुरेश हल्का सा मुस्कुराए —
“लोग तो कुछ भी कहेंगे। लेकिन सोचो… जो इज़्ज़त और साथ तुम्हें कभी खुलकर नहीं मिला, वही हमारा बेटा अपनी पत्नी को दे रहा है। इसमें बुराई नहीं, गर्व की बात है। पत्नी का सम्मान करने से बेटा माँ से दूर नहीं होता, बल्कि और बड़ा इंसान बनता है।”
आशा के चेहरे का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगा।
वो चुप हो गईं, लेकिन इस बार उनकी चुप्पी गुस्से की नहीं… सोच की थी।
खाने की मेज़ पर...
थोड़ी ही देर में पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गया।
नेहा हल्की घबराहट के साथ एक-एक करके सबके सामने पूड़ियाँ, गरम सब्ज़ी, दाल और चावल परोसने लगी। उसके हाथ थोड़ा काँप रहे थे, लेकिन चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी।
सबने खाना चखा।
आकाश ने पहला कौर लेते ही कहा —
“वाह! खाना तो सच में बहुत स्वादिष्ट बना है।”
पवन भी मुस्कुराते हुए बोला —
“लगता है नई बहू घर बहुत अच्छे से संभाल लेगी।”
राहुल ने प्यार से नेहा की ओर देखा और कहा —
“ये सिर्फ नेहा की नहीं, हमारी टीम वर्क है।”
राहुल की ये बात सुनकर नेहा के मन का सारा डर दूर हो गया।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि वह इस घर में अकेली नहीं है — उसके साथ उसका साथी खड़ा है।
उसके अंदर एक नया आत्मविश्वास जाग उठा, और उसके चेहरे की मुस्कान अब सच्ची और गहरी थी।
दो साल पहले…
दो साल पहले की बात है।
शहर के एक शांत से रेस्टोरेंट में राहुल और नेहा की पहली मुलाकात हुई थी। वे एक-दूसरे को जानते नहीं थे — बस किस्मत ने उन्हें एक ही टेबल के आसपास बैठा दिया था।
उसी समय एक छोटी-सी गलती हो गई।
वेटर ने ऑर्डर बदल दिया। नेहा की प्लेट में वो डिश आ गई जिसमें पेरी-पेरी पनीर था, और उसे उससे एलर्जी थी।
नेहा पहले से ही भूखी और थोड़ी परेशान थी। गुस्से में उसने वेटर से कह दिया —
“ये मेरा ऑर्डर नहीं है। इतनी बड़ी गलती कैसे हो सकती है?”
बेचारा वेटर घबरा गया और माफी मांगने लगा।
तभी पास की टेबल से राहुल ने मुस्कुराते हुए कहा —
“नाक पर इतना गुस्सा लेकर चलना भारी नहीं पड़ता?”
नेहा ने उसकी तरफ घूरकर देखा —
“आपको क्या?”
राहुल ने हँसते हुए जवाब दिया —
“मुझे कुछ नहीं… बस लगा कि गुस्सा आपकी खूबसूरती से ज़्यादा ध्यान खींच रहा है।”
नेहा चाहकर भी मुस्कान छुपा नहीं पाई।
राहुल ने खुद उठकर वेटर से सही प्लेट ली और नेहा की टेबल पर रख दी।
“अब खाना आराम से खाइए… और अगर चाहें तो गुस्सा भी थोड़ा कम कर दीजिए।”
बस वहीं से बातचीत शुरू हुई।
खाने के दौरान छोटी-छोटी बातें हुईं। नाम पूछे गए। काम के बारे में बात हुई। पसंद-नापसंद जानी गई।
उस दिन दो अजनबी साथ बैठे थे…
लेकिन जाते-जाते दोनों के चेहरे पर एक अनजानी सी मुस्कान थी।
उसके बाद सोशल मीडिया पर जुड़ना, रोज़ की बातें, छोटे-छोटे मैसेज, लंबी कॉल्स…
धीरे-धीरे दोस्ती गहरी हुई।
और कब वो दोस्ती प्यार में बदल गई, उन्हें खुद भी पता नहीं चला।
माँ की नापसंद बहू...
जब राहुल ने एक दिन हिम्मत जुटाकर घर में अपनी शादी की बात छेड़ी, तो घर का माहौल अचानक बदल गया।
आशा का चेहरा सख्त हो गया।
“कैसी लड़की है वो?” उन्होंने तीखे स्वर में पूछा।
“माँ… उसका नाम नेहा है,” राहुल ने धीरे से कहा, “वो समझदार है, पढ़ी-लिखी है… और मैं उससे शादी करना चाहता हूँ।”
आशा की भौंहें तन गईं।
“मॉडर्न लड़की है। हमारे घर के संस्कारों में ढल पाएगी भी या नहीं? ऊपर से हमारी जात की भी नहीं है। हमारे खानदान में आज तक किसी ने लव मैरिज नहीं की। रिश्तेदार क्या कहेंगे?”
राहुल ने गहरी साँस ली, लेकिन उसकी आवाज़ शांत ही रही।
“माँ, मुझे अपनी पूरी जिंदगी उसके साथ बितानी है। लोगों की बातों के साथ नहीं। मैं जानता हूँ वो इस घर को संभाल लेगी। बस आपको एक मौका देना होगा।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
घर के बाकी लोग राहुल की खुशी देखकर हामी भरने लगे। बहुत समझाने के बाद शादी तो हो गई… लेकिन आशा के मन की दीवारें अभी भी खड़ी थीं।
उन्होंने बहू को घर में तो स्वीकार किया, पर दिल में जगह देने में उन्हें अभी वक्त लगना था।
धीरे-धीरे बदलाव...
एक दिन दोपहर के समय नेहा छत पर कपड़े धो रही थी।
सूरज हल्का-हल्का चमक रहा था और हवा में गीले कपड़ों की खुशबू घुली हुई थी।
नेहा झुककर साबुन से कपड़े रगड़ रही थी। उसके माथे पर पसीना था, लेकिन चेहरे पर कोई शिकायत नहीं।
तभी पीछे से कदमों की आहट आई।
राहुल चुपचाप उसके पास आकर बैठ गया और बोला,
“इतना सारा काम अकेले क्यों कर रही हो?”
नेहा घबराकर बोली,
“आप यहाँ क्यों आ गए? अगर किसी ने देख लिया तो फिर बातें बनाएंगे।”
राहुल ने मुस्कुराते हुए साबुन उठाया और एक शर्ट रगड़ते हुए कहा,
“देखने दो। काम करने में शर्म कैसी? ये हमारा घर है, और ये हमारा काम है।”
नेहा ने धीमे से कहा,
“पर लोग क्या कहेंगे?”
“लोग तो कुछ भी कहेंगे,” राहुल बोला, “पर मुझे फर्क नहीं पड़ता। जब मैं माँ की मदद कर सकता हूँ, तो अपनी पत्नी की क्यों नहीं?”
इतने में सामने वाली छत से पड़ोस की एक लड़की हँसते हुए बोली —
“भाभी, आप तो बहुत लकी हो! काश मुझे भी राहुल भैया जैसा पति मिले।”
नेहा के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।
धीरे-धीरे मोहल्ले में चर्चा होने लगी —
“देखो, राहुल अपनी पत्नी की मदद करता है।”
“आजकल ऐसे पति कहाँ मिलते हैं!”
“सच में, ये नई सोच है।”
और पहली बार नेहा को महसूस हुआ कि सम्मान छिपाकर नहीं, खुले दिल से निभाया जाता है।
एक दिन…
एक सुबह आशा की नींद थोड़ी देर से खुली।
आमतौर पर इस समय तक बड़ी बहुएँ रसोई में खटपट शुरू कर देती थीं, लेकिन आज घर में अजीब सी शांति थी।
वो धीरे-धीरे उठकर बाहर आईं।
रसोई से हल्की सी चाय की खुशबू आ रही थी।
उन्होंने देखा — नेहा चुपचाप गैस के सामने खड़ी थी। बाल ढीले से बंधे हुए, चेहरे पर बिना किसी दिखावे की सादगी। वह बहुत ध्यान से अदरक कूट रही थी।
आशा कुछ बोल पातीं उससे पहले ही नेहा ने मुड़कर उन्हें देख लिया।
“अरे माँ जी, आप उठ गईं? बस आपकी चाय बन गई है। और हाँ… आपकी दवाई का समय भी हो गया है,” उसने बेहद नरमी से कहा।
उसकी आवाज़ में बनावटी मिठास नहीं थी, बस सच्ची चिंता थी।
आशा पहली बार उसे गौर से देखने लगीं।
ना कोई जवाब, ना कोई शिकायत, ना कोई ताना — बस अपनापन।
उस शाम अचानक आशा की तबीयत बिगड़ गई।
हल्का बुखार और तेज़ सिरदर्द।
घर के बाकी लोग अपने कामों में लगे रहे, लेकिन नेहा उनके पास बैठ गई।
वह बार-बार ठंडे पानी की पट्टी रखती, दवा देती, और धीरे-धीरे उनका सिर दबाती।
“आप सो जाइए माँ जी, मैं यहीं हूँ,” उसने धीमे से कहा।
रात गहराती गई।
घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ती रहीं।
पर नेहा की आँखों में नींद नहीं आई।
सुबह जब आशा की आँख खुली, तो बुखार काफी उतर चुका था।
उन्होंने इधर-उधर देखा।
नेहा उसी कुर्सी पर बैठी थी, सिर दीवार से टिका हुआ, हाथ अब भी आशा के बिस्तर पर रखे हुए… और थकान से वहीं सो गई थी।
आशा का गला भर आया।
जिस लड़की को वो अब तक पराई समझती थीं, उसने बिना किसी शिकायत के रात भर उनकी सेवा की थी।
उनकी आँखों से चुपचाप दो आँसू निकल आए।
शायद पहली बार उन्हें बहू नहीं… एक बेटी दिखी थी।
दिल का दरवाज़ा खुला...
नाश्ते की मेज़ पर पूरा परिवार बैठा था। माहौल आज कुछ अलग-सा शांत था।
आशा ने धीरे से पानी का गिलास रखा और बोलीं —
“आज मैं एक बात साफ कहना चाहती हूँ… आज से इस घर की रसोई सिर्फ बहू की ज़िम्मेदारी नहीं होगी। ये घर हम सबका है, तो काम भी मिलकर होगा। और… नेहा…”
नेहा घबराकर तुरंत खड़ी हो गई। उसके मन में जाने कितने सवाल एक साथ उठने लगे।
आशा ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।
“बेटी, तूने अपने व्यवहार और प्यार से मेरा दिल जीत लिया है। मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं है।”
राहुल की आँखों में सुकून था। वह हल्के से मुस्कुरा रहा था।
नेहा की आँखें नम हो गईं। खुशी के आँसू गालों पर ढलक आए। उसने झुककर आशा के पैर छुए।
उस पल घर में सिर्फ एक बात महसूस हो रही थी —
रिश्ते ताने से नहीं, अपनापन से बनते हैं।
सीख:
घर तब नहीं टूटता
जब बेटा अपनी पत्नी का साथ देता है।
घर तब टूटता है
जब लोग दिल में शक और गलतफहमियाँ पाल लेते हैं।
और घर तब जुड़ता है
जब एक औरत दूसरी औरत को दुश्मन नहीं,
अपनी बेटी समझकर अपनाती है।
— रिश्ते साथ से बनते हैं, शक से नहीं।

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