जब बेटी ने माँ को सच दिखाया

Emotional Indian mother reading a heartfelt letter at home, reflecting on daughter and daughter-in-law relationships in a warm family setting.


सुबह का समय था।


रसोई में चाय चढ़ी हुई थी, लेकिन गैस धीमी थी। जैसे घर की रफ्तार भी आज कुछ थमी हुई हो।


रीमा (बेटी) कल ही ससुराल वापस गई थी। जाते समय उसने सामान्य-सा व्यवहार किया, हँसी भी, सबको गले लगाया… पर माँ सविता जी को पता था — बेटी की आँखें कुछ कह रही थीं।


घर में अब नई बहू थी — नीलिमा। शांत, संकोची, हर बात पूछकर करने वाली।


सविता जी को लगता था कि सब कुछ ठीक चल रहा है।


पर उस दिन अलमारी साफ करते समय उन्हें एक छोटी-सी डायरी मिली।


उसमें एक पन्ना मुड़ा हुआ था।


ऊपर लिखा था —

“माँ के लिए — जब आप अकेली हों।”


सविता जी का दिल तेज़ धड़कने लगा।


उन्होंने बैठकर पढ़ना शुरू किया।



“माँ,


मैं खुश हूँ। सच में खुश हूँ।

लेकिन एक बात कहना चाहती हूँ।


जब मेरी शादी हुई थी, तब आपने मुझे समझाया था — ‘बेटी, नए घर में सबको अपना समझना।’


मैंने कोशिश की।


पर कई बार अपना बनने में बहुत समय लग जाता है।


जब घर में कोई चीज़ बदलनी होती थी — मुझसे नहीं पूछा जाता था।

जब कोई फैसला होता — मुझे बाद में पता चलता।

कभी-कभी ऐसा लगता था जैसे मैं उस घर की सदस्य नहीं, मेहमान हूँ।


मैंने कभी आपसे शिकायत नहीं की… क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि आप परेशान हों।


लेकिन माँ… अब जब हमारे घर में नीलिमा आई है, तो मुझे डर लगता है।


कहीं वो भी ऐसा महसूस न करे जैसा मैंने किया था।”



सविता जी की आँखें नम हो गईं।


उन्हें याद आया — पिछले हफ्ते उन्होंने नीलिमा से कहा था,

“ये परदे ऐसे ही अच्छे लगते हैं, अभी बदलने की जरूरत नहीं।”


नीलिमा ने चुपचाप “जी माँ” कह दिया था।


क्या उसके मन में कुछ और था?



डायरी में आगे लिखा था —


“माँ,

अगर घर में कुछ बदलना हो तो पहले नीलिमा से पूछिएगा।

अगर वो अपने मायके जाना चाहे तो उसे मत रोकिएगा।

और अगर उसके मायके वाले आएँ… तो उन्हें अतिथि नहीं, अपना समझिएगा।


माँ, मैं जानती हूँ आप बुरी नहीं हैं।

लेकिन कभी-कभी अनजाने में भी दिल दुख जाता है।


मैं नहीं चाहती कि इस घर में कोई लड़की ‘समझौता’ शब्द से शुरू हो।”



सविता जी के हाथ काँप गए।


उन्होंने पहली बार सोचा —


क्या उन्होंने भी वही किया जो उन्हें अपनी सास में बुरा लगता था?


उन्हें अपना समय याद आया…


जब वो इस घर में नई आई थीं।

हर बात पर सुनना पड़ता था —

“हमारे घर में ऐसे नहीं होता।”


आज वही शब्द उन्होंने अनजाने में दोहरा दिया था।



शाम को उन्होंने नीलिमा को बुलाया।


“बेटा, अगर तुम चाहो तो हम इस ड्राइंग रूम का रंग बदल सकते हैं। और हाँ… इस रविवार तुम्हारे मम्मी-पापा को बुला लेते हैं।”


नीलिमा ने चौंककर उनकी तरफ देखा।


“सच, माँ?”


“हाँ। और एक बात और… ये घर अब तुम्हारा है। मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हारे ऊपर नहीं।”


नीलिमा की आँखें भर आईं।



रात गहरा चुकी थी।


घर में सब सो चुके थे, लेकिन सविता जी की आँखों में नींद नहीं थी।

मन में शब्द उमड़ रहे थे, जो दिन भर गले में अटके रहे।


आख़िर उन्होंने हिम्मत करके रीमा का नंबर मिला दिया।


उधर से कुछ सेकंड बाद धीमी आवाज़ आई —

“हेलो माँ…”


सविता जी का गला भर आया।

“बेटा…”


“जी माँ? सब ठीक है ना?” रीमा की आवाज़ में हल्की चिंता थी।


कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर सविता जी ने धीमे से कहा —

“धन्यवाद।”


रीमा चौंक गई।

“धन्यवाद? किस बात के लिए, माँ?”


सविता जी की आवाज़ काँप रही थी —

“मुझे मेरी ही परछाई दिखाने के लिए… मुझे ये समझाने के लिए कि कहीं मैं वही गलती तो नहीं दोहरा रही, जो कभी मुझे चुभती थी।”


उधर कुछ क्षण बिल्कुल खामोशी रही।


फिर रीमा ने बहुत शांत स्वर में कहा —

“माँ… आईना तो हमेशा सामने ही होता है।

बस हम अक्सर उसे देखने से बचते रहते हैं।”


सविता जी की आँखों से आँसू बह निकले।

“तू इतनी बड़ी कब हो गई, रीमा?”


रीमा हल्का सा मुस्कुराई —

“जब आपने मुझे सही और गलत में फर्क करना सिखाया था… उसी दिन से, माँ।”


दोनों तरफ कुछ देर तक सिर्फ साँसों की आवाज़ थी।


उस रात कोई लंबी बात नहीं हुई —

लेकिन जो कहा गया, वह रिश्ते को और गहरा कर गया।



उस दिन के बाद घर में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया।


बस एक छोटा-सा बदलाव आया —


हर फैसला लेने से पहले एक सवाल पूछा जाने लगा —

“तुम्हें क्या ठीक लगता है?”


और यही सवाल घर को सच में घर बना गया।



संदेश:


बहू को बेटी बनाना आसान है…

पर बेटी के अनुभव को समझकर बहू का सम्मान करना —

वहीं असली परिपक्वता है।





No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.