हवेली की पहली रसोई: जब नई बहू ने जीत लिया सबका दिल
शहर से थोड़ा दूर एक बहुत बड़ी और पुरानी हवेली थी। उस हवेली में मेहरा परिवार रहता था। हवेली में एक खास कमरा था जहाँ पुराने गहने, तलवारें, तस्वीरें और एक बड़ा सा चाँदी का पुश्तैनी आसन रखा था।
कहा जाता था कि उस आसन पर बैठकर ही हर नई बहू अपनी पहली रसोई का खाना परोसती है।
नई बहू का आगमन...
आज घर में नई बहू नेहा का गृहप्रवेश था। पूरा घर रोशनी और खुशियों से जगमगा रहा था। नेहा एक साधारण परिवार से आई थी, लेकिन उसके संस्कार, सादगी और मेहनती स्वभाव ने सबका मन पहले ही जीत लिया था।
जब वह अपने पति के साथ मुख्य दरवाज़े पर पहुँची, तभी उसकी ननद रिया शरारती मुस्कान के साथ सामने आकर खड़ी हो गई। उसने मज़ाकिया अंदाज़ में रास्ता रोक लिया।
“भैया, ऐसे ही अंदर चले जाओगे क्या? आज तो नेग देना पड़ेगा, तब ही भाभी को अंदर जाने दूँगी!”
उसकी बात सुनकर सब लोग हँस पड़े। माहौल और भी खुशनुमा हो गया। नेहा शर्म से मुस्कुरा रही थी और चुपचाप सिर झुकाए खड़ी थी।
आख़िरकार नेग मिलने के बाद रिया ने खुशी-खुशी रास्ता छोड़ दिया और नेहा का गृहप्रवेश पूरे रीति-रिवाज़ के साथ हुआ।
पहली सुबह...
अगली सुबह नेहा जल्दी उठकर तैयार हुई। उसने हल्की गुलाबी रंग की साड़ी पहनी और सादे गहनों के साथ नीचे आ गई। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी और मन में नए घर को अपनाने की भावना।
उसे देखते ही उसकी जेठानी सोनल ने भौंहें चढ़ाते हुए कहा,
“अरे नेहा, इतनी साधारण साड़ी? हमारी हवेली में तो बहुएँ पहली सुबह भारी साड़ी और पूरे गहनों में तैयार होती हैं।”
नेहा थोड़ा झिझक गई, लेकिन कुछ बोली नहीं।
तभी पीछे से दादी-सास की आवाज़ आई,
“सोनल, सादगी में भी बहुत सुंदरता होती है। बहू जैसी है, वैसी ही अच्छी लग रही है। लेकिन हमारे घर की कुछ परंपराएँ भी हैं, जिन्हें निभाना जरूरी है।”
यह कहकर दादी-सास ने एक लाल रंग की भारी बनारसी साड़ी और सोने के गहनों का डिब्बा नेहा के हाथ में रख दिया।
“आज से तुम इस घर की बड़ी हवेली की बहू हो। इसलिए तुम्हें हमारे रीति-रिवाज़ के अनुसार ही तैयार होना होगा।”
नेहा ने आदर से सिर झुकाया और कहा,
“जी दादी जी।”
वह चुपचाप अपने कमरे में गई, बनारसी साड़ी पहनी, सारे गहने पहने और पूरी तरह से सजकर वापस नीचे आई। अब वह सच में हवेली की बहू जैसी लग रही थी।
पहली रसोई की घोषणा...
शाम का समय था। दादी-सास ने सबको हॉल में बुलाया और गंभीर आवाज़ में बोलीं—
“कल हमारे घर कुछ बड़े और खास मेहमान आने वाले हैं। इसलिए कल नेहा की पहली रसोई होगी। और याद रहे, खाना हमारे पुश्तैनी आसन के चारों तरफ बैठकर ही खाया जाएगा।”
नेहा ने जब उस बड़े से आसन की तरफ देखा तो वह घबरा गई। आसन इतना बड़ा था कि उसके चारों ओर आराम से 40-50 लोग बैठ सकते थे।
नेहा ने धीरे से पूछा,
“दादी जी… यहाँ तो बहुत सारे लोग बैठ जाएंगे।”
दादी-सास ने शांत लेकिन सख्त स्वर में कहा,
“हाँ, और उन सबके लिए खाना तुम्हें अकेले ही बनाना होगा। यह हमारे घर की परंपरा है।”
यह सुनते ही नेहा के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। उसके मन में हल्का-सा डर बैठ गया, लेकिन उसने अपने चेहरे पर घबराहट नहीं आने दी।
डर और साजिश...
जेठानी सोनल और दूसरी जेठानी पूजा एक-दूसरे की तरफ देखकर धीमे स्वर में बोलीं,
“देखते हैं, ये इस परीक्षा में कैसे पास होती है।”
दोनों के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, जैसे वे मन ही मन कोई योजना बना रही हों।
अगली सुबह नेहा बहुत जल्दी, लगभग चार बजे ही उठ गई।
रात भर उसे ठीक से नींद भी नहीं आई थी, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
वह नहा-धोकर साफ साड़ी पहनकर सबसे पहले मंदिर में गई।
भगवान के सामने हाथ जोड़कर बोली,
“हे भगवान, आज मेरी लाज रख लेना।”
इसके बाद उसने रसोई में जाकर चूल्हे पर हल्दी और रोली से छोटा सा स्वास्तिक बनाया, दीपक जलाया और पहली रसोई का काम शुरू कर दिया।
नेहा ने क्या-क्या बनाया?
नेहा ने सबसे पहले स्वादिष्ट मिठाइयाँ तैयार कीं —
बेसन का हलवा – देसी घी और मेवों से बना
गाजर का हलवा – ताज़ी गाजर और दूध से तैयार
खीर – चावल, दूध और इलायची की खुशबू से भरपूर
रसमलाई – नरम रसगुल्ले और केसर वाले दूध के साथ
इसके बाद नेहा ने तरह-तरह की रोटियाँ और पूड़ियाँ बनाईं —
पूरी – गरमागरम और फूली हुई
लच्छा पराठा – परतदार और कुरकुरा
नान – तंदूर में सिककर तैयार
मिस्सी रोटी – बेसन और मसालों से बनी स्वादिष्ट रोटी
अंत में नेहा ने मुख्य व्यंजन तैयार किए —
शाही पनीर – काजू और मलाई की ग्रेवी में
दाल मखनी – मक्खन और क्रीम से भरपूर
मिक्स वेज – ताज़ी सब्ज़ियों का स्वादिष्ट मिश्रण
जीरा राइस – घी और जीरे की खुशबू वाला चावल
इस तरह नेहा ने अपनी पहली रसोई में प्यार, मेहनत और स्वाद से भरा हुआ भव्य भोजन तैयार किया
नेहा सुबह से लगातार काम में लगी हुई थी। भारी साड़ी और गहनों का बोझ होने के बावजूद उसके हाथ एक पल के लिए भी नहीं रुके। वह पूरी लगन और धैर्य से हर पकवान तैयार कर रही थी।
इसी बीच मौका देखकर उसकी जेठानियाँ चुपके से रसोई में आईं। इधर-उधर देखा कि कोई आसपास तो नहीं है, और जल्दी से दाल में बहुत सारा नमक डालकर वहाँ से निकल गईं।
थोड़ी देर बाद नेहा वापस रसोई में आई। उसने दाल में तड़का लगाने से पहले स्वाद चखने का सोचा। जैसे ही दाल उसके मुँह में गई, वह चौंक उठी।
“अरे! दाल में इतना नमक कैसे हो गया? मैंने तो नापकर ही डाला था…”
कुछ पल के लिए वह घबरा गई, लेकिन तुरंत खुद को संभाल लिया। उसने सोचा, “घबराने से कुछ नहीं होगा, उपाय ढूँढना पड़ेगा।”
तभी उसे याद आया कि उसने कुछ आलू उबालकर रखे हैं। उसने जल्दी से आलुओं को मैश किया और दाल में मिला दिया। फिर अच्छी तरह से दाल को उबालने दिया।
कुछ देर बाद उसने दोबारा दाल चखी।
इस बार स्वाद बिल्कुल संतुलित था।
नेहा ने राहत की साँस ली और मन ही मन भगवान को धन्यवाद दिया। अब वह पूरे आत्मविश्वास के साथ खाना परोसने की तैयारी करने लगी।
परीक्षा का समय...
सब लोग पुश्तैनी आसन के चारों ओर आदर से बैठ गए।
नेहा हल्के काँपते हाथों से सबको खाना परोसने लगी। उसके मन की धड़कनें तेज थीं, लेकिन चेहरे पर शांति थी।
जैसे ही मेहमानों ने पहला कौर मुँह में रखा, सबकी आँखें चमक उठीं।
“वाह! ऐसा स्वाद हमने पहले कभी नहीं चखा!” एक मेहमान उत्साह से बोला।
विदेशी मेहमान भी मुस्कुराते हुए बोले,
“यह खाना बहुत ही स्वादिष्ट है। सच में कमाल कर दिया!”
नेहा की साँसें अब भी थमी हुई थीं, क्योंकि सबसे ज़रूरी पल अभी बाकी था।
दादी-सास ने धीरे से एक कौर लिया।
पूरा हॉल कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल शांत हो गया।
सबकी नज़रें दादी पर टिक गईं।
दादी ने आँखें बंद कर स्वाद महसूस किया… फिर धीरे-धीरे उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान फैल गई।
उन्होंने नेहा की ओर देखकर कहा,
“आज से तुम इस घर की सच्ची और योग्य बहू हो। तुमने हमारी परंपरा का मान रखा है।”
इतना कहकर दादी उठीं, अपने कमरे में गईं और एक मखमली डिब्बा लेकर लौटीं।
डिब्बा खोलते ही उसमें रखा पुश्तैनी हीरों का हार चमक उठा।
दादी ने वह हार नेहा के गले में पहनाते हुए कहा,
“यह हमारे खानदान की सबसे कीमती निशानी है। आज से यह तुम्हारा है।”
नेहा की आँखें खुशी और सम्मान के आँसुओं से भर गईं।
बड़ा दिल...
जेठानियाँ सिर झुकाकर नेहा के सामने खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।
सोनल धीमी आवाज़ में बोली,
“नेहा… हमें माफ कर दो। दाल में नमक हमने ही मिलाया था। हम तुम्हें असफल देखना चाहती थीं। हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”
पूजा ने भी सिर झुका लिया,
“हमें जलन हो रही थी, इसलिए हमने ऐसा किया। सच में हमें शर्म आ रही है।”
नेहा ने दोनों की ओर देखा। उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न शिकायत — बस शांति थी।
वह हल्की सी मुस्कान के साथ बोली,
“गलती हर इंसान से होती है। अगर हम एक-दूसरे को माफ करना सीख लें, तो घर हमेशा खुश रहेगा।”
फिर वह दादी जी की ओर मुड़ी और विनम्रता से बोली,
“दादी जी, आपने मुझे जो गहने दिए हैं, वो मेरे लिए आशीर्वाद हैं। लेकिन मैं चाहती हूँ कि ये गहने हम तीनों बहुओं में बराबर बाँट दिए जाएँ। इस घर की हर बहू का इन पर समान अधिकार है। मैं अकेले ये सब नहीं ले सकती।”
उसकी बात सुनकर पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। सब हैरानी से नेहा को देखने लगे।
दादी जी की आँखें भर आईं। उन्होंने नेहा को पास बुलाकर उसके सिर पर हाथ फेरा और भावुक होकर बोलीं,
“आज सच में इस घर को बहू नहीं, बेटी मिली है। जो अपने हिस्से की खुशी भी बाँटना जानती है, वही असली बड़ी होती है।”
दादी जी ने उसी समय सारे गहने तीनों बहुओं में बराबर बाँट दिए।
उस दिन हवेली में सिर्फ जीत की नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास की भी शुरुआत हुई।
कहानी की सीख:
मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।
सच्चाई और धैर्य के साथ हर परीक्षा आसानी से पार की जा सकती है।
जिसका दिल बड़ा होता है, वही वास्तव में सबसे बड़ा इंसान बनता है।
और उस दिन के बाद हवेली में किसी भी बहू की परीक्षा नहीं ली गई।
सब लोग प्रेम और सम्मान के साथ हँसी-खुशी रहने लगे।

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