नई माँ
रीमा दुल्हन बनी चुपचाप बैठी थी। माथे पर सिंदूर, हाथों में लाल चूड़ियाँ, और आँखों में ढेर सारे अनजाने सपने। तभी पाँच साल का नन्हा रोहन धीरे-धीरे उसके पास आया और उसकी साड़ी का पल्लू पकड़कर बोला—
“आप सच में मेरी माँ हो ना?”
रीमा का दिल पिघल गया। उसने उसे गोद में उठा लिया।
“हाँ बेटा… अगर तुम चाहो तो।”
रोहन खिलखिलाकर हँस पड़ा। उस हँसी में वर्षों से सूना पड़ा आँगन जैसे गूंज उठा।
रीमा का अतीत...
रीमा एक साधारण और संस्कारी परिवार की लड़की थी। उसके पिता मोहल्ले में छोटी-सी दर्जी की दुकान चलाते थे। दिन-भर सिलाई मशीन पर झुके रहने के बाद भी इतनी ही आमदनी हो पाती थी कि घर का गुज़ारा किसी तरह चल सके। घर में रीमा के अलावा तीन छोटी बहनें थीं। पढ़ाई, राशन, कपड़े— हर ज़रूरत सोच-समझकर पूरी करनी पड़ती थी। पैसों की तंगी जैसे परिवार की स्थायी साथी बन गई थी।
रीमा बड़ी थी, इसलिए जिम्मेदारियाँ भी उसी के हिस्से ज्यादा आती थीं। कई बार उसके लिए रिश्ते आए, पर हर बार बात दहेज पर आकर अटक जाती। कोई मोटी रकम माँगता, तो कोई गहने और सामान की लंबी सूची थमा देता। रीमा के पिता बेबस होकर रह जाते। हर बार एक नई उम्मीद टूट जाती।
इसी बीच एक दिन एक नया रिश्ता आया— विवेक शर्मा का। वह सरकारी नौकरी में थे, स्वभाव से शांत और जिम्मेदार। पर वे विधुर थे। उनकी पत्नी का देहांत उनके पुत्र रोहन के जन्म के समय ही हो गया था। तब से वे अकेले ही बच्चे की परवरिश कर रहे थे।
रीमा के पिता गहरे असमंजस में पड़ गए। एक ओर बेटी का भविष्य था, दूसरी ओर उसकी अधूरी इच्छाएँ। मगर सबसे बड़ी बात यह थी कि विवेक ने स्पष्ट कह दिया था— “हमें किसी प्रकार का दहेज नहीं चाहिए।” उनके शब्दों में सच्चाई और व्यवहार में सरलता थी।
घर की परिस्थितियों और पिता की चिंता को देखते हुए रीमा ने चुपचाप इस रिश्ते के लिए सहमति दे दी। उसके मन में कई अनकहे सवाल थे, कई अधूरे सपने भी… पर उसने स्वयं को समझा लिया—
“शायद यही मेरी किस्मत है।”
पहली रात की सच्चाई...
शादी के बाद की वह पहली रात थी। कमरे में हल्की रोशनी थी। रीमा घूँघट डाले पलंग के एक कोने में चुपचाप बैठी थी। उसके मन में हजारों प्रश्न थे, पर होंठ बिल्कुल मौन।
कुछ देर बाद विवेक कमरे में आए। उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया और कुछ क्षण तक बिना कुछ कहे खड़े रहे। फिर पास रखी कुर्सी खींचकर बैठ गए। उनके चेहरे पर गंभीरता साफ झलक रही थी।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद उन्होंने धीमे, लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा—
“रीमा, मैं तुम्हें एक बात साफ-साफ कहना चाहता हूँ। मैंने यह विवाह केवल रोहन के लिए किया है। उसे माँ की जरूरत थी… और मैं अकेले उसकी हर कमी पूरी नहीं कर पा रहा था। मैं अपनी पहली पत्नी को आज भी भूल नहीं पाया हूँ। शायद कभी पूरी तरह भूल भी न सकूँ। इसलिए… मैं नहीं जानता कि तुम्हें पत्नी का वह स्थान दे पाऊँगा या नहीं, जिसकी तुम हकदार हो। लेकिन इतना वचन देता हूँ कि तुम्हें हमेशा सम्मान दूँगा, तुम्हारी सुरक्षा और सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखूँगा।”
उनके शब्द कमरे की शांति को चीरते हुए रीमा के हृदय तक उतर गए।
रीमा का दिल जैसे एक पल को रुक सा गया। उसके मन में जो छोटे-छोटे सपने पल रहे थे, वे मानो उसी क्षण बिखर गए। फिर भी उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। उसने बस धीरे से सिर झुका लिया और धीमे स्वर में कहा—
“जी…”
विवेक उठकर सोफे की ओर चले गए।
रात भर रीमा की आँखों में नींद नहीं आई। तकिये में मुँह छुपाकर वह बहुत रोई। उसे लगा जैसे उसका अपना कोई स्थान ही नहीं है इस नए जीवन में। वह सोचती रही— क्या यही विवाह है? क्या यही उसका भविष्य है?
लेकिन भोर की हल्की रोशनी के साथ उसके मन में भी एक नया विचार जन्म लेने लगा। उसने आँसू पोंछे और आईने में खुद को देखा।
धीरे से उसने मन ही मन कहा—
“अगर किस्मत ने मुझे यह घर दिया है, तो मैं इसे दिल से अपनाऊँगी। चाहे मुझे पत्नी का अधिकार मिले या न मिले, मैं इस घर को अपना घर बनाऊँगी… और रोहन को अपना बेटा।”
उस क्षण उसने अपने टूटे हुए सपनों को समेटकर एक नया संकल्प बाँध लिया।
रोहन की दुनिया...
रोहन धीरे-धीरे पूरी तरह रीमा से घुलमिल गया था। अब उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के साथ रीमा का नाम जुड़ गया था। सुबह वह उसे प्यार से जगाती, नहलाकर स्कूल की यूनिफॉर्म पहनाती, उसके बालों में हल्के हाथों से तेल लगाकर कंघी करती। टिफ़िन में उसकी पसंद का खाना रखती और जाते समय माथे पर चूमकर कहती—
“शरारत मत करना, ध्यान से पढ़ना।”
शाम को लौटने पर रोहन सबसे पहले अपना बस्ता एक तरफ़ रखकर रीमा से लिपट जाता। रात को वह उसी की गोद में सिर रखकर कहानी सुनते-सुनते सो जाता।
एक दिन अचानक रोहन ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा—
“माँ, जब आप पास होती हो ना… मुझे बिल्कुल डर नहीं लगता।”
उसके इन मासूम शब्दों ने जैसे रीमा के मन की सारी रिक्तता भर दी। उसकी आँखें नम हो उठीं। उसने रोहन को सीने से लगा लिया। उस क्षण उसे लगा मानो ईश्वर ने उसके जीवन की सबसे बड़ी कमी पूरी कर दी हो— उसे माँ बनने का सच्चा सुख मिल गया था।
ननद की ईर्ष्या...
विवेक की बड़ी बहन कविता सिंह कुछ दिनों के लिए मायके आईं। उनके आने से घर में रौनक तो बढ़ी, पर उनके मन में एक अजीब-सी खटास भी थी।
रीमा जिस तरह पूरे मन से घर सँभाल रही थी—रसोई की व्यवस्था से लेकर रोहन की पढ़ाई और दिनचर्या तक—यह सब कविता को खटकने लगा। रोहन का रीमा से हर समय लिपटा रहना, उसे “माँ” कहकर पुकारना और उसी के हाथ से खाना खाना… यह सब देखकर कविता के मन में ईर्ष्या की हल्की-सी आग सुलग उठती।
वह अवसर मिलते ही ताना कस देतीं—
“वाह! नई बहू ने तो आते ही घर पर पूरा अधिकार जमा लिया।”
या फिर मुस्कुराकर कहतीं—
“अरे, बहुत जल्दी रंग दिखा रही है… अभी तो आए कुछ ही दिन हुए हैं।”
उनकी बातों में छिपी चुभन साफ महसूस होती थी।
रीमा सब समझती थी, फिर भी शांत रहती। वह जानती थी कि उलझने से घर का वातावरण बिगड़ेगा। उसने निश्चय कर रखा था कि चाहे जितने ताने सुनने पड़ें, वह सम्मान और धैर्य नहीं छोड़ेगी। उसके लिए सबसे ज़रूरी था—घर की शांति और रोहन की मुस्कान।
एक दिन…
एक शाम रीमा रोज़ की तरह दूध लेने बाज़ार चली गई। जाते समय उसने रोहन के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,
“मैं अभी आई बेटा, कहीं मत जाना।”
रोहन सिर हिलाकर कविता बुआ के पास बैठ गया।
घर में हल्की सी खामोशी थी। कविता ने उसे अपने पास खींच लिया और धीरे-धीरे उसके बाल सहलाने लगीं। कुछ क्षण बाद वह धीमे स्वर में बोलीं—
“रोहन बेटा… तू इसको ‘माँ-माँ’ क्यों कहता रहता है?”
रोहन मासूमियत से बोला,
“क्योंकि ये मेरी माँ हैं ना…”
कविता के होंठों पर हल्की-सी व्यंग्य भरी मुस्कान आई। वह उसके और करीब झुककर बोलीं—
“नहीं बेटा… यह तेरी असली माँ नहीं है। तेरी असली माँ तो भगवान के पास है। यह तो बस… ऐसे ही आई है इस घर में। समझा कर, ज्यादा लगाव मत रखा कर इससे।”
रोहन की आँखों में अचानक डर उतर आया।
“मतलब… ये मेरी माँ नहीं हैं?” उसकी आवाज काँप गई।
“नहीं,” कविता ने और ज़हर घोलते हुए कहा, “सौतेली माँ है। सौतेली माँ कैसी होती है, पता है? कहानियों में सुना है ना…”
रोहन का चेहरा उतर गया। वह घबराकर दरवाज़े की ओर देखने लगा — जैसे रीमा अभी आ जाए।
उसी समय दरवाज़ा खुला। रीमा दूध का बर्तन हाथ में लिए भीतर आई। सामने का दृश्य देखकर उसके कदम रुक गए। उसने रोहन के चेहरे पर फैला भय साफ देख लिया।
उसका दिल धक् से रह गया।
दूध का बर्तन नीचे रखकर वह तेज़ी से आगे बढ़ी। उसकी आवाज पहली बार कड़ी हुई—
“दीदी, यह आप क्या कह रही हैं?”
कविता तनकर बैठ गईं।
“सच ही तो बता रही हूँ। इसमें गलत क्या है?”
रीमा का धैर्य अब टूट चुका था। आँखों में पीड़ा और आक्रोश एक साथ उमड़ आए।
“दीदी, आप जो भी सोचती हों, वह आपकी बात है। पर एक मासूम बच्चे के मन में उसके अपने ही घर के लिए डर और ज़हर भरना ठीक नहीं है। वह अभी बहुत छोटा है… उसके मन में ऐसी बातें क्यों डाल रही हैं?”
कविता तमतमा उठीं।
“तू मुझे सिखाएगी? अभी दो दिन हुए आए, और घर पर कब्जा जमाने लगी! मेरे ही भाई को मुझसे दूर कर दिया!”
रीमा ने संयम बनाए रखने की कोशिश की, पर उसकी आवाज काँप गई—
“मैंने किसी को किसी से दूर नहीं किया, दीदी। मैं तो बस इस घर को अपना मानकर निभाने की कोशिश कर रही हूँ।”
तभी दरवाज़े पर आहट हुई।
सबकी नज़र उधर गई।
दरवाज़े पर विवेक खड़े थे।
उनके चेहरे पर गहरी गंभीरता थी। स्पष्ट था— उन्होंने सब सुन लिया था।
घर में एक पल को सन्नाटा छा गया।
रोहन भागकर रीमा से लिपट गया। उसके छोटे-छोटे हाथ रीमा की साड़ी कसकर पकड़ चुके थे— जैसे डर रहा हो कि कोई उसे छीन न ले।
विवेक धीरे-धीरे अंदर आए। उनकी नज़र पहले रोहन पर गई, फिर रीमा की भीगी आँखों पर, और अंत में कविता पर ठहर गई।
कमरे की हवा भारी हो चुकी थी… और अब निर्णय का समय सामने खड़ा था।
निर्णय का क्षण...
विवेक तेज़ क़दमों से आगे बढ़े। उनके चेहरे पर आज असामान्य दृढ़ता थी। उन्होंने अपनी बहन की ओर सीधा देखते हुए शांत किंतु कठोर स्वर में कहा—
“दीदी, अब बस। बहुत हो चुका। मैं अब और एक शब्द भी नहीं सुनूँगा। रीमा इस घर की सिर्फ बहू ही नहीं है… वह मेरी पत्नी है। और रोहन की माँ है। उसने इस घर को दिल से अपनाया है। अगर किसी ने उसे अपमानित करने या दुख पहुँचाने की कोशिश की, तो मैं चुप नहीं रहूँगा।”
कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
रीमा वहीं खड़ी रह गई— जैसे समय थम गया हो। उसके कानों को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह वही विवेक हैं, जिन्होंने अब तक उसे दूरी पर रखा था। आज पहली बार उन्होंने उसे पूरे अधिकार के साथ “मेरी पत्नी” कहा था। उसकी आँखें अनायास भर आईं।
कविता के होंठ हिले, मानो कुछ कहना चाहती हों, पर शब्द साथ नहीं दे पाए। विवेक की दृढ़ आवाज़ और स्पष्ट निर्णय ने उन्हें निरुत्तर कर दिया। वह चुपचाप नज़रें झुकाकर खड़ी रह गईं।
उस रात कमरे का वातावरण कुछ अलग था।
विवेक ने रोज़ की तरह सोफ़े की ओर कदम तो बढ़ाए, पर इस बार उन्होंने तकिया नहीं उठाया। कुछ क्षण चुप खड़े रहे, फिर धीमे से पलंग के किनारे बैठ गए।
कमरे में हल्की रोशनी थी। रीमा ने संकोच से उनकी ओर देखा। उसका मन धड़क रहा था।
विवेक ने गहरी साँस ली और नरम स्वर में कहा—
“रीमा… मैंने तुम्हें बहुत दूर रखा। शायद अपने अतीत से बाहर निकल नहीं पा रहा था। लेकिन आज मुझे एहसास हुआ है कि तुमने इस घर को सचमुच अपना लिया है। रोहन के लिए, मेरे लिए… तुमने हर रिश्ता दिल से निभाया है। अगर तुम चाहो तो… क्या हम अपने जीवन की नई शुरुआत कर सकते हैं?”
रीमा की आँखें भर आईं। इतने दिनों का मौन जैसे पिघल गया।
काँपती आवाज़ में उसने कहा—
“मैंने तो कभी दूरी चाही ही नहीं, विवेक जी। मैंने तो बस आपका साथ चाहा था… आपका विश्वास।”
विवेक ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया। उस स्पर्श में स्वीकार था, सम्मान था और एक नई शुरुआत का वचन भी।
तभी दरवाज़ा धीरे से खुला और रोहन नींद में उनींदी आँखें मलता हुआ अंदर आया। दोनों को साथ बैठे देखकर वह मुस्कुरा उठा और दौड़कर उनके बीच आकर लेट गया।
“अब हम तीनों साथ सोएँगे!” — उसने मासूम खुशी से कहा।
विवेक और रीमा एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए।
उस रात पहली बार उस कमरे में दूरी नहीं, अपनापन था।
तीनों की हल्की हँसी में एक नए परिवार की शुरुआत की मधुर ध्वनि घुल गई।
सच्ची माँ...
समय बीतता गया।
रीमा ने कभी रोहन को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह उसकी कोख से नहीं जन्मा।
एक दिन विद्यालय में कक्षा अध्यापिका ने बच्चों से परिचय पूछते हुए कहा—
“बच्चों, बताओ, तुम्हारी माँ का नाम क्या है?”
जब रोहन की बारी आई, तो वह पूरे आत्मविश्वास और चमकती आँखों के साथ खड़ा हुआ। उसके चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी। उसने स्पष्ट और ऊँची आवाज़ में कहा—
“मेरी माँ का नाम रीमा है। वह दुनिया की सबसे अच्छी माँ है।”
रीमा ने यह सुना तो उसकी आँखें भर आईं।
रीमा अब पूरी तरह समझ चुकी थी कि माँ बनने के लिए जन्म देना ज़रूरी नहीं होता।
माँ वह होती है जो बच्चे के आँसू पोंछे, उसके डर को अपने आँचल में छिपा ले और बिना किसी स्वार्थ के उसे अपनाए।
खून का रिश्ता शरीर से जुड़ता है, लेकिन दिल का रिश्ता आत्मा से जुड़ता है— और वही सबसे गहरा होता है।
उस दिन के बाद उस घर में किसी के मन में कोई शंका या दूरी नहीं रही।
हर संबंध अपनी जगह पर सच्चा और मजबूत हो गया।
अब वह मकान केवल दीवारों का ढाँचा नहीं था, बल्कि एक सच्चा घर बन चुका था—
जहाँ प्रेम की गरमाहट थी,
सम्मान की नींव थी,
और विश्वास की मजबूत डोर से सब एक-दूसरे से बँधे हुए थे।

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