लव मैरिज या अरेंज मैरिज?

 

Two Indian women smiling together on rooftop at sunset after accepting love and arranged marriages equally.


रीमा और कविता बचपन की पक्की सहेलियाँ थीं।

दोनों ने एक ही स्कूल में पढ़ाई की, एक ही कॉलेज में दाखिला लिया और उनकी शादी भी लगभग एक ही समय पर हुई थी।


समय के साथ किस्मत ने ऐसा साथ दिया कि उनके घर भी एक-दूसरे के सामने बन गए। अब तो रोज़ मिलना-जुलना लगा रहता था।


एक दिन शाम को दोनों अपनी-अपनी छत पर बैठी चाय पीते हुए बातें कर रही थीं।


रीमा ने गहरी साँस लेते हुए कहा,

“कविता, आजकल के बच्चों की सोच समझ ही नहीं आती। पता नहीं कब, किससे और कैसे शादी करने का फैसला कर लें।”


कविता ने सहमति में सिर हिलाते हुए जवाब दिया,

“बिलकुल सही कह रही है तू। मुझे तो अपने बेटे आरव की बहुत चिंता रहती है। कहीं वह भी लव मैरिज करने की ज़िद न कर बैठे।”


कुछ देर सोचने के बाद दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और मानो मन ही मन एक निर्णय ले लिया।


रीमा बोली,

“देख, हमें समय रहते ही कदम उठाना होगा।”


कविता ने तुरंत कहा,

“हाँ, हम अपने बच्चों की शादी खुद ही तय करेंगे। इससे बेहतर और सुरक्षित कुछ नहीं।”


और इस तरह दोनों सहेलियों ने ठान लिया कि वे अपने बच्चों की शादी अपनी पसंद से ही करवाएँगी।



रीमा का परिवार...


रीमा के दो बच्चे थे—एक बेटा और एक बेटी।


उसके बेटे का नाम आरव था और बेटी का नाम पायल।


आरव एक बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी करता था। वह जिम्मेदार और समझदार लड़का था।


पायल अभी कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी। वह होशियार और चंचल स्वभाव की लड़की थी।



कविता का परिवार...


कविता के दो बच्चे थे — एक बेटा और एक बेटी।


उसके बेटे का नाम निखिल था, जो परिवार का बिज़नेस संभालता था।

और बेटी का नाम सिया था, जो अभी कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी। 



रिश्ता तय हुआ...


कुछ दिनों बाद कविता के रिश्तेदारों ने उसके बेटे निखिल के लिए एक अच्छा रिश्ता बताया।


लड़की का नाम संध्या था। वह पढ़ी-लिखी, समझदार, संस्कारी और शांत स्वभाव की थी। उसके परिवार वाले भी बहुत अच्छे और सुसंस्कृत थे।


रिश्ते की बात आगे बढ़ी तो एक दिन कविता अपने परिवार के साथ संध्या को देखने उसके घर गई। संध्या सादे सूट में, सिर पर हल्का सा दुपट्टा लिए, सभी के लिए चाय और नाश्ता लेकर आई। उसने बड़ों के पैर छुए और सबके साथ बहुत विनम्रता से बात की।


संध्या का व्यवहार और सादगी सबको बहुत पसंद आई। बातचीत के बाद दोनों परिवारों को रिश्ता अच्छा लगा और कुछ ही समय में निखिल और संध्या की शादी तय हो गई। जल्द ही उनकी धूमधाम से शादी भी हो गई।


शादी के बाद कविता बहुत खुश थी।


वह रीमा से मुस्कुराते हुए बोली —

“देखा, अरेंज मैरिज वाली बहू कितनी अच्छी होती है।”


रीमा ने भी उसकी बात से सहमति जताते हुए हामी भर दी। 



अचानक सच सामने आया...


एक दिन आरव ऑफिस से घर लौटा। वह थोड़ा घबराया हुआ था। उसने बैग सोफे पर रखा और धीरे से बोला—


“माँ, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है।”


रीमा ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

“क्या हुआ बेटा? सब ठीक तो है?”


आरव ने हिम्मत जुटाकर कहा—

“माँ… मैं अपनी ऑफिस में साथ काम करने वाली तृषा से शादी करना चाहता हूँ।”


रीमा के हाथ से पानी का गिलास लगभग छूट ही गया।

“क्या कहा तुमने? लव मैरिज? ये कभी नहीं हो सकता! हमारे घर में ऐसी शादी नहीं होगी।”


घर का माहौल अचानक भारी हो गया।

आरव समझाने की कोशिश करने लगा—


“माँ, तृषा बहुत अच्छी लड़की है। पढ़ी-लिखी है, समझदार है और परिवार को मानने वाली है।”


लेकिन रीमा गुस्से में बोली—

“मुझे कुछ नहीं सुनना! शादी तो हम अपनी पसंद से ही करेंगे।”


इतने में पायल भी वहां आ गई। उसने शांत स्वर में कहा—

“माँ, आप इतना गुस्सा क्यों कर रही हैं? पहले तृषा से मिल तो लीजिए। बिना जाने कैसे फैसला ले सकती हैं?”


रीमा कुछ पल के लिए चुप हो गई। घर में सन्नाटा छा गया।


काफी समझाने के बाद, आखिरकार रीमा ने गहरी सांस लेते हुए कहा—

“ठीक है… मैं उस लड़की से मिलूँगी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि मैंने हाँ कर दी है।”


आरव के चेहरे पर हल्की सी उम्मीद की मुस्कान आ गई।



तृषा से मुलाकात...


तृषा पहली बार आरव के घर आई।


वह सादगी से साड़ी पहनकर आई थी। घर में प्रवेश करते ही उसने रीमा और परिवार के सभी बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। उसकी विनम्रता देखकर सबको अच्छा लगा।


फिर वह रसोई में गई और अपने हाथों से चाय और हल्का-सा नाश्ता बनाकर सबके सामने रखा। उसने बड़े आदर से सभी को परोसा।


तृषा का शांत स्वभाव, मीठी बोली और बड़ों के प्रति सम्मान देखकर रीमा का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगा। उसे महसूस हुआ कि किसी व्यक्ति की अच्छाई उसके व्यवहार से पहचानी जाती है, न कि इस बात से कि शादी लव मैरिज है या अरेंज मैरिज।


कुछ महीनों बाद, परिवार की सहमति से आरव और तृषा की शादी धूमधाम से कर दी गई।



दोनों बहुओं की तुलना...


शादी के बाद दोनों बहुएँ अपने-अपने तरीके से घर संभालने लगीं।


संध्या पूरी तरह घर पर रहती थी। वह सुबह जल्दी उठती, पूजा करती, खाना बनाती और घर के बाकी काम देखती। घर की ज़िम्मेदारी उसने बहुत अच्छे से संभाल ली थी।


वहीं तृषा नौकरी भी करती थी। ऑफिस से लौटने के बाद भी वह सास-ससुर का हाल पूछती, रसोई में मदद करती और घर के छोटे-बड़े कामों में हाथ बँटाती थी।


दोनों अपने-अपने तरीके से अच्छा करने की कोशिश कर रही थीं।


एक दिन अचानक कविता की तबीयत खराब हो गई। उन्हें तेज़ बुखार और कमजोरी महसूस होने लगी।


संध्या ने तुरंत उनका ध्यान रखा। वह उनके पास बैठी रही, पानी देती रही और ठंडी पट्टियाँ भी रखी। लेकिन उसे दवाइयों और डॉक्टर की ज़्यादा जानकारी नहीं थी, इसलिए वह थोड़ी घबरा गई।


तभी तृषा ऑफिस से लौटी। उसने हालात समझे और बिना समय गँवाए कविता को डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर से जांच करवाई, दवाइयाँ लेकर आई और समय पर दवा भी देती रही। रात भर वह कविता के पास बैठी रही।


कुछ ही दिनों में कविता की तबीयत सुधर गई।


बिस्तर पर लेटे-लेटे कविता सोचने लगीं —

“मैं अब तक लव मैरिज और अरेंज मैरिज में फर्क करती रही… लेकिन असली फर्क तो इंसान के स्वभाव में होता है। शायद मैं सच में गलत सोच रही थी।”


उस दिन से उनकी सोच बदलने लगी।



इसी बीच पायल और सिया ने हिम्मत जुटाकर अपने-अपने घर में यह बात बताने का फैसला किया कि वे दोनों अपनी पसंद के लड़कों से शादी करना चाहती हैं।


रीमा, जो पहले लव मैरिज के सख्त खिलाफ थी, अब काफी बदल चुकी थी। उसने शांत स्वर में कहा —


“अगर लड़का अच्छा है, समझदार है और हमारी बेटी को खुश रख सकता है, तो हमें क्या परेशानी हो सकती है? आखिर शादी उन्हें निभानी है।”


लेकिन कविता अभी भी असमंजस में थी। उसके मन में पुराने विचार और समाज का डर घूम रहा था। वह बोली —


“मुझे समझ नहीं आता… लोग क्या कहेंगे? और अगर आगे चलकर कुछ गलत हो गया तो?”


तभी संध्या, जो पास ही खड़ी सब सुन रही थी, आगे आई और आदर से बोली —


“माँ, एक बात कहूँ? अगर मैं आपको अच्छी लगती हूँ, तो सिर्फ इसलिए कि मेरी शादी अरेंज मैरिज से हुई, ऐसा नहीं है। अगर मेरी और निखिल की लव मैरिज होती, तो क्या मैं बदल जाती? क्या मेरे संस्कार बदल जाते?”


वह थोड़ी देर रुकी और फिर बोली —


“रिश्ता इस बात से मजबूत नहीं होता कि वह लव मैरिज है या अरेंज मैरिज। रिश्ता दिल से बनता है, भरोसे से बनता है, समझदारी और सम्मान से बनता है।”


संध्या की बातें सुनकर कविता चुप हो गई। उसके पास कोई जवाब नहीं था, लेकिन उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था कि उसके मन की सोच धीरे-धीरे बदलने लगी है।



कुछ समय बाद पायल की शादी उसकी पसंद से पूरे रीति-रिवाज़ के साथ हो गई।

सिया की शादी भी परिवार की रज़ामंदी से खुशी-खुशी संपन्न हुई।


दोनों घरों में फिर से हँसी, रौनक और खुशियों का माहौल लौट आया।


एक शाम रीमा और कविता अपनी पुरानी आदत के अनुसार छत पर बैठी थीं। हल्की हवा चल रही थी और दोनों चाय की चुस्कियाँ लेते हुए बीते दिनों को याद कर रही थीं।


कविता मुस्कुराते हुए बोली—

“रीमा, अब समझ में आया है कि असली बात क्या है। बहू लव मैरिज वाली हो या अरेंज मैरिज वाली… अगर उसका दिल अच्छा हो, तो वही घर को स्वर्ग बना देती है।”


रीमा हँसते हुए बोली—

“बिलकुल सही कहा। और अगर हमारी सोच ही छोटी हो, तो हम खुद अपने घर को नरक बना देते हैं।”


दोनों एक-दूसरे की तरफ देख कर हँस पड़ीं।

उस हँसी में समझ, अपनापन और बदलती सोच की मिठास घुली हुई थी। 



सीख:


• शादी का तरीका नहीं, बल्कि इंसान का स्वभाव और संस्कार सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं।

• समय के साथ नई पीढ़ी की सोच को समझना और स्वीकार करना ज़रूरी है।

• रिश्ते प्यार, विश्वास और आपसी सम्मान से ही मजबूत बनते हैं।

• अपनी सोच बदलने में कभी देर नहीं होती।




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