अपना घर
रीमा सुबह से ही घर के कामों में लगी थी। कभी रसोई में चाय बना रही थी, तो कभी सास-ससुर के कमरे में जाकर देख आती कि उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं।
तभी पीछे से आवाज़ आई –
“बहू, ज़रा इधर आना।”
रीमा ने मुड़कर देखा, उसके ससुर गोपाल जी खड़े थे।
“जी पिताजी?”
“तुम कब से काम में लगी हो, थोड़ा आराम भी कर लिया करो।”
रीमा मुस्कुरा दी – “आप लोग ठीक रहें, यही मेरा आराम है।”
रीमा की शादी को दस साल हो चुके थे। इन दस वर्षों में उसने अपने मायके जाना लगभग छोड़ ही दिया था। उसका पति अमित नौकरी में व्यस्त रहता था और घर की पूरी ज़िम्मेदारी रीमा के कंधों पर थी।
घर में बड़े देवर राजेश और उनकी पत्नी अलग शहर में रहते थे। त्योहार पर कभी-कभार आ जाते, लेकिन माता-पिता की सेवा का भार अमित और रीमा पर ही था।
रीमा को इससे कोई शिकायत नहीं थी। सास शारदा देवी उसे बेटी की तरह मानती थीं। कई बार कहतीं –
“पता नहीं भगवान ने मुझे बहू दी है या बेटी।”
अचानक लिया गया फैसला...
एक दिन घर में अमित और राजेश के बीच फोन पर लंबी बातचीत हुई। रीमा को कुछ समझ नहीं आया, पर दोनों भाइयों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा था।
रात को अमित ने कहा –
“रीमा, तुम कुछ दिन मायके हो आओ। माँ-पिताजी की चिंता मत करना।”
रीमा हैरान हुई। “अचानक? सब ठीक तो है?”
“हाँ, बस तुम भी थोड़ा बदल जाओगी।”
रीमा को अच्छा लगा। उसने सोचा शायद सच में अमित को उसकी थकान समझ आ गई।
बँटवारे की बात...
रीमा के मायके जाते ही घर में एक बड़ा फैसला लिया गया।
राजेश ने कहा –
“अब माँ-पिताजी को अलग-अलग रख लेते हैं। पिताजी मेरे पास रहेंगे और माँ तुम्हारे पास।”
अमित चुप रहा। उसे यह फैसला सही नहीं लग रहा था, लेकिन वह विरोध भी नहीं कर पाया।
अगले दिन राजेश आकर पिताजी को ले गया। शारदा देवी की आँखों में आँसू थे।
“हमने तो सोचा था बुढ़ापा साथ बिताएँगे,” उन्होंने धीरे से कहा।
कुछ ही दिनों में दोनों बूढ़े माता-पिता की तबियत गिरने लगी।
गोपाल जी को वहाँ घुटन महसूस होती थी।
शारदा देवी घर में चुप रहने लगीं। खाना कम कर दिया, दवाई लेना छोड़ दिया।
उधर मायके में बैठी रीमा को बेचैनी हो रही थी। उसे लग रहा था जैसे घर में कुछ गलत हो रहा है।
तभी अमित का फोन आया –
“रीमा, माँ की तबियत बहुत खराब है। तुम जल्दी आ जाओ।”
सच सामने आया...
अस्पताल पहुँचते ही रीमा ने देखा, शारदा देवी बहुत कमजोर हो चुकी थीं।
“माँजी, क्या हुआ आपको?”
शारदा देवी ने धीमी आवाज़ में कहा –
“बेटी, हम दोनों को अलग कर दिया गया है। तेरे ससुर बेटे के घर चले गए हैं। हमें अलग मत होने देना।”
रीमा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
घर पहुँचकर उसने देखा, पिताजी भी चुपचाप बैठे थे। आँखों में अजीब-सी खालीपन था।
रीमा ने अमित से पूछा –
“आपने ऐसा क्यों किया? माता-पिता कोई सामान हैं क्या, जिन्हें बाँट दिया जाए?”
अमित की आँखों से आँसू बहने लगे –
“मैं मजबूर था… भाई नहीं मान रहा था।”
रीमा ने दृढ़ आवाज़ में कहा –
“मजबूरी नहीं, यह हमारी जिम्मेदारी है। अगर हम साथ नहीं रह सकते तो मैं भी आपके साथ नहीं रहूँगी।”
अगले ही दिन रीमा खुद राजेश के घर गई और पिताजी को वापस ले आई।
“माँ-पिताजी साथ रहेंगे। चाहे हमें छोटा घर लेना पड़े, चाहे खर्च कम करना पड़े, लेकिन इन्हें अलग नहीं करेंगे।”
अमित को अपनी गलती का एहसास हो चुका था। उसने भाई से साफ कह दिया –
“माता-पिता बोझ नहीं होते। अगर हम उनका सम्मान नहीं करेंगे तो हमारे बच्चे भी हमसे यही सीखेंगे।”
धीरे-धीरे घर में फिर से रौनक लौट आई।
गोपाल जी और शारदा देवी साथ बैठकर चाय पीते।
रीमा के चेहरे पर सुकून था।
एक दिन शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़कर कहा –
“बेटी, तूने हमारा घर बचा लिया।”
रीमा मुस्कुराई –
“घर दीवारों से नहीं, अपने लोगों से बनता है।”
सीख:
माता-पिता जीवन भर हमें संभालते हैं।
बुढ़ापे में उन्हें अलग करना सबसे बड़ा अन्याय है।
परिवार साथ रहे तो हर कठिनाई आसान हो जाती है।

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