अनामिका की दोपहर

 

42-year-old Indian woman teacher smiling confidently while teaching students in a bright classroom with natural morning sunlight


अनामिका ने अलमारी बंद की।

कपड़ों की तह ठीक करते-करते

उसे पता ही नहीं चला

कि घड़ी तीन बजा चुकी है।


रसोई साफ़ थी।

फर्श चमक रहा था।

बच्चे ट्यूशन पर थे।

पति दफ़्तर में।


घर शांत था—

इतना शांत

कि अपनी साँसें भी सुनाई दे रही थीं।


वह सोफ़े पर बैठ गई।

टीवी चालू किया।

समाचार, धारावाहिक, रियलिटी शो—

सब बदले,

पर मन नहीं बदला।


उसने टीवी बंद कर दिया।


दीवार पर टंगी

उसकी शादी की तस्वीर पर नज़र गई।


लाल जोड़े में मुस्कुराती लड़की—

आँखों में उम्मीदें,

चेहरे पर आत्मविश्वास।


वह कुछ देर

उस तस्वीर को देखती रही।


“क्या सच में वह मैं थी?”

उसने मन ही मन पूछा।



बीते साल...


शादी को पंद्रह साल हो चुके थे।

दो बच्चे।

एक ससुराल।

हज़ार ज़िम्मेदारियाँ।


अनामिका कभी एक स्कूल में अध्यापिका थी।

उसे पढ़ाना सचमुच पसंद था।

बच्चों के उत्सुक सवाल,

कॉपियाँ जाँचते समय की तल्लीनता,

स्टाफ रूम की हल्की-फुल्की हँसी—

ये सब उसके दिन का हिस्सा थे,

और उसकी पहचान भी।


लेकिन पहले बच्चे के जन्म के बाद

घर में एक ही बात बार-बार दोहराई गई—


“घर ज़्यादा ज़रूरी है।”


किसी ने ज़ोर से नहीं कहा,

पर इतना ज़रूर कहा

कि वह समझ जाए।


उसने नौकरी छोड़ दी।


सोचा था—

बस कुछ साल की बात है।

बच्चे थोड़े बड़े हो जाएँ,

तो वह फिर से स्कूल लौट जाएगी।


पर साल चुपचाप गुजरते गए।

बच्चे बड़े होते गए।

ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती गईं।


और देखते ही देखते

वे “कुछ साल”

पूरी ज़िंदगी बन गए।



फोन की घंटी...


फोन की घंटी बजी।


अनामिका ने हाथ पोंछते हुए रिसीवर उठाया।


“हाँ, बोलो,” उसने धीमे स्वर में कहा।


उधर से रवि की आवाज़ आई—

सीधी, व्यस्त और जल्दी में।


“आज क्लाइंट डिनर है।

मेरे लिए मत रुकना।

और हाँ, पापा की दवाई समय से दे देना।”


“ठीक है,” उसने जवाब दिया।


बस इतना ही।


न “कैसी हो?”

न “आज दिन कैसा रहा?”

न “थक तो नहीं गई?”


फोन कट गया।


कुछ पल वह वैसे ही खड़ी रही,

जैसे शब्द अभी भी कानों में गूँज रहे हों।


फिर धीरे से खिड़की के पास आकर खड़ी हो गई।


सामने वाली बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल पर

एक लड़की बालकनी में बैठी थी।

गोद में लैपटॉप,

पास में कॉफी का मग,

बाल खुलकर कंधों पर बिखरे हुए।


वह स्क्रीन पर झुकी कुछ टाइप कर रही थी—

कभी रुककर सोचती,

कभी हल्का-सा मुस्कुराती।


अनामिका की नज़र वहीं ठहर गई।


उसे अपना पुराना स्टाफ रूम याद आ गया—

चॉक की हल्की खुशबू,

कॉपी के ढेर,

सहकर्मियों की हँसी,

और बच्चों की आवाज़—

“मैम, एक बार फिर समझाइए ना।”


वह भी कभी

ऐसे ही काम में डूबी रहती थी।

थकती थी,

पर उस थकान में संतोष होता था।


आज उसके हाथ खाली थे—

पर मन भरा हुआ था

किसी अनकहे खालीपन से।


उसने एक गहरी साँस ली

और खिड़की से हट गई।


रसोई में अभी भी

कई छोटे-छोटे काम

उसका इंतज़ार कर रहे थे।



आईना...


वह कमरे में गई।

आईने के सामने खड़ी हुई।


चेहरे पर हल्की झुर्रियाँ।

आँखों के नीचे काले घेरे।

बालों में कुछ सफ़ेद लटें।


रवि अक्सर कहा करता था—


“थोड़ा अपना ध्यान रखा करो।

तुम पहले जैसी नहीं दिखती।”


‘पहले जैसी’…


यह शब्द उसके मन में

कहीं अटक कर रह गया।


पहले जैसी—


क्या जब वह अपनी कमाई पर

खुद का छोटा-सा गर्व महसूस करती थी?


जब वह स्कूल से लौटते समय

बिना वजह मुस्कुरा देती थी?


जब उसके फैसले

उसे डराते नहीं,

बल्कि मजबूत बनाते थे?


या फिर

पहले जैसी का मतलब

सिर्फ़ उसका चेहरा था—

या उसकी वह चमक

जो अब ज़िम्मेदारियों की परतों में

धीमी पड़ गई थी?


वह देर तक सोचती रही—

आख़िर “पहले जैसी”

होना किसे कहते हैं?



शाम...


बच्चे लौट आए।

होमवर्क, दूध, नाश्ता—

सब चलता रहा।


रात को

सबने खाना खाया।


उसकी थाली

आख़िर में लगी।


रसोई में खड़े-खड़े

उसने दो कौर खाए।


किसी ने नहीं पूछा—

“तुम बैठकर क्यों नहीं खाती?”



एक छोटी सी घटना...


अगले दिन

बेटी ने पूछा—


“मम्मी, आप क्या बनना चाहती थीं?”


अनामिका चौंकी।


“क्यों?”


“हमारी टीचर ने पूछा था—

आपकी मम्मी क्या करती हैं?”


बेटी ने जवाब दिया था—

“वो घर पर रहती हैं।”


बेटी ने मासूमियत से पूछा—

“मम्मी, क्या घर पर रहना ही आपका सपना था?”


यह सवाल

सीधा दिल पर लगा।


वह मुस्कुराई—

पर आँखें भीग गईं।



रात की बातचीत...


रवि देर से आया।


थका हुआ था।

कपड़े बदले,

खाना खाया।


अनामिका ने धीरे से कहा—


“मैं फिर से पढ़ाना चाहती हूँ।”


रवि ने हैरानी से देखा।


“अब?

इस उम्र में?

घर का क्या होगा?”


उसने शांत स्वर में कहा—

“घर संभाल लूँगी।

पर खुद को भी संभालना है।”


रवि कुछ देर चुप रहा।


फिर उसने हल्की-सी साँस लेकर कहा—


“अगर तुम्हें लगता है कि तुम सब संभाल पाओगी…

तो कोशिश कर लो।”


उसके शब्दों में उत्साह कम था,

संकोच ज़्यादा।


यह खुला समर्थन नहीं था,

पर साफ़ इनकार भी नहीं।



अगली सुबह...


अनामिका जल्दी उठी।

सबके लिए नाश्ता बनाया।

बच्चों को तैयार किया।

ससुर की दवाई रखी।


फिर उसने अपनी पुरानी फाइल निकाली।

डिग्रियाँ, प्रमाणपत्र,

कुछ पुराने लेसन प्लान।


उसने धीरे से मुस्कुराया।


कितना समय बीत गया था—

पर वह सब

अब भी उसका था।


उसने पास के स्कूल में फोन किया।


“मैडम, अभी वैकेंसी तो नहीं है,

पर आप अपना रिज़्यूमे भेज दीजिए।”


उसने भेज दिया।


दिल धड़क रहा था—

डर भी था,

उत्साह भी।



कुछ हफ्तों बाद

उसे पार्ट-टाइम नौकरी मिल गई।


पहले दिन

जब उसने क्लास में कदम रखा—

बच्चों ने एक साथ कहा—


“गुड मॉर्निंग मैम!”


उसकी आँखें चमक उठीं।


घर लौटकर

उसने आईने में खुद को देखा।


वही चेहरा था—

पर अब उसमें

थोड़ी रोशनी थी।


रवि ने भी महसूस किया।


“आज खुश लग रही हो,” उसने कहा।


अनामिका मुस्कुराई—


“क्योंकि आज मैं

थोड़ी-सी

अपने लिए भी जी रही हूँ।”



उसने सब कुछ नहीं बदला।


घर अब भी वही था।

ज़िम्मेदारियाँ भी वही थीं।


पर फर्क इतना था—

अब वह खुद को

हर बार पीछे करके

सबको आगे नहीं कर रही थी।


अब वह अपनी जगह

बीच में खड़ी थी—

गुम होकर नहीं,

बल्कि मौजूद रहकर।


उसने सीखा—


त्याग अच्छा है,

पर खुद को मिटाकर नहीं।


और उस दिन

दोपहर की ख़ामोशी में

पहली बार

उसे अकेलापन नहीं लगा।


क्योंकि अब

उसके साथ

वह खुद थी।





No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.