अमीर बहू और गरीब कनक की कहानी

 

Indian daughter-in-law standing respectfully in traditional home interior



शहर के सबसे बड़े जूलरी शोरूम में आज खूब चहल-पहल थी।

शारदा अपनी बड़ी बहू मिथाली के साथ सोना खरीदने आई थीं।


मिथाली बहुत अमीर घर की बेटी थी। उसके लिए सोना खरीदना कोई बड़ी बात नहीं थी। उसने बिना दाम पूछे ही हार, कमरबंद और कंगन खरीद लिए।


शारदा एक भारी नौलखा हार को देख रही थीं।

मिथाली बोली,

“मम्मी जी, पसंद है तो पैक करवा लीजिए। दाम की चिंता मत कीजिए।”


लाखों का बिल एक झटके में भर दिया गया।

लोग हैरान थे, पर मिथाली मुस्कुरा रही थी।


घर लौटकर शारदा अपनी सास गंगा देवी को गहने दिखाने लगीं।

लेकिन गंगा देवी बोलीं,

“सोने से कोई इंसान नहीं बिकता, शारदा। रिश्ते दिल से बनते हैं।”


शारदा को यह बात अच्छी नहीं लगी।



गरीब कनक से मुलाकात...


कुछ दिनों बाद पूरा परिवार एक बड़ी शादी में शामिल होने गया।

शादी का माहौल बहुत ही सुंदर था—हर तरफ रोशनी, फूलों की खुशबू और मेहमानों की चहल-पहल।


उसी शादी में एक साधारण सी लड़की, कनक, दरवाजे पर खड़े होकर फूलों की सजावट कर रही थी। उसके कपड़े साधारण थे, लेकिन चेहरे पर सादगी और मेहनत की चमक साफ दिखाई दे रही थी।


तभी दो लड़के वहाँ आए और उसे बेवजह परेशान करने लगे।

“अरे सुनो, इतना काम क्यों कर रही हो? हमारे साथ चलो, मज़े करेंगे…” वे हँसते हुए बोले।


कनक घबरा गई। वह चुपचाप अपना काम करती रही, लेकिन उसकी आँखों में डर साफ झलक रहा था।


उसी समय नवीन वहाँ पहुँचा। उसने यह सब देखा तो गुस्से में बोला,

“बहुत हो गया! अगर एक शब्द और कहा तो अभी मालिक को बुलाता हूँ।”


नवीन की सख्त आवाज़ सुनकर दोनों लड़के वहाँ से भाग गए।


कनक अभी भी घबराई हुई थी। वह कुर्सी पर खड़ी होकर फूल लगा रही थी, तभी उसका संतुलन बिगड़ गया और वह फिसलकर सीधे नवीन से टकरा गई।


“सॉरी… मैं जानबूझकर नहीं गिरी,” कनक घबराते हुए बोली।


नवीन ने मुस्कुराकर कहा,

“कोई बात नहीं, संभल कर काम कीजिए।”


कुछ पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं। उस एक पल में जैसे समय थम सा गया।

नवीन को कनक की सादगी और मासूमियत बहुत भा गई।


बातों-बातों में उसे पता चला कि कनक इस दुनिया में बिल्कुल अकेली है। माता-पिता अब नहीं रहे, और वह शादियों में छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा करती है।


नवीन के मन में उसके लिए सम्मान और अपनापन जाग गया।


बेचैन दिल...


शादी से घर लौटने के बाद भी नवीन का मन शांत नहीं हुआ।

वह अपने कमरे में लेटा था, लेकिन उसकी आँखों के सामने बार-बार कनक का चेहरा आ रहा था।


“ये क्या हो गया मुझे…?” वह खुद से बुदबुदाया।


उधर दादी गंगा देवी ने अपने पोते के चेहरे की बेचैनी पढ़ ली थी।

वह मुस्कुराईं और मन ही मन बोलीं,

“लगता है मेरे पोते का दिल सच में किसी पर आ गया है…”


उन्हें सब समझ आ गया था—यह सिर्फ एक मुलाकात नहीं, एक नई कहानी की शुरुआत थी। 


गंगा देवी ने परिवार के सामने कहा,

“मैं अपने पोते की शादी कनक से कराऊँगी।”


शारदा और मिथाली नाराज़ हो गईं।

“गरीब लड़की हमारे घर की बहू नहीं बन सकती!” — शारदा बोलीं।


लेकिन गंगा देवी ने हार नहीं मानी।

एक मंदिर में नवीन और कनक की शादी करवा दी।



नया घर, नई परीक्षा...


कनक ने जब पहली बार अपने ससुराल की दहलीज़ पार की, तो उसके मन में ढेरों सपने थे। उसे लगा था कि अब उसे अपना परिवार मिल जाएगा, जहाँ उसे अपनापन और प्यार मिलेगा।

लेकिन उसका स्वागत वैसा नहीं था जैसा उसने सोचा था। घर का माहौल ठंडा था—न मुस्कान, न अपनापन।


मिथाली ने शुरू से ही उसे अपनाने के बजाय उससे घर का सारा काम करवाना शुरू कर दिया।

सुबह होते ही कनक रसोई में लग जाती—सबके लिए नाश्ता बनाती, फिर झाड़ू-पोंछा करती। उसके बाद कपड़े धोती, बर्तन साफ करती और दोपहर का खाना तैयार करती।


वह थक जाती, पर चेहरे पर कभी शिकायत नहीं लाती।


एक दिन मिथाली की किटी पार्टी थी। उसकी सहेलियाँ घर आईं। सब सोने के गहनों और महंगे कपड़ों की बातें कर रही थीं। तभी किसी ने कनक को देखकर पूछा,

“ये लड़की कौन है?”


मिथाली ने बिना सोचे-समझे कह दिया,

“अरे, ये हमारी नौकरानी है।”


ये शब्द कनक के दिल में तीर की तरह चुभ गए।

वह कुछ पल के लिए रुक गई, लेकिन फिर चुपचाप सिर झुकाकर रसोई में चली गई।


उसने अपने आँसू पोंछे और सोचा—

"शायद एक दिन मेरा व्यवहार ही सबका दिल बदल देगा।"


वह हर दिन पूरे मन से काम करती रही।

सबके लिए स्वादिष्ट खाना बनाती, घर को साफ-सुथरा रखती और बड़ों का सम्मान करती।


उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसकी मेहनत और सच्चाई ज़रूर पहचानी जाएगी। 



जन्मदिन का तोहफा...


कनक का जन्मदिन था।

सुबह से ही वह चुपचाप अपने काम में लगी हुई थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि कोई उसका जन्मदिन याद रखेगा।


शाम को नवीन मुस्कुराते हुए उसके कमरे में आया।

“हैप्पी बर्थडे, कनक,” उसने प्यार से कहा।


कनक हैरान रह गई।

“आपको याद था?” उसकी आँखों में चमक आ गई।


नवीन ने एक छोटा सा डिब्बा उसके हाथ में रखा।

“ये तुम्हारे लिए है।”


कनक ने काँपते हाथों से डिब्बा खोला। अंदर एक सुंदर सा सोने का हार चमक रहा था।

“ये… मेरे लिए?” उसकी आँखें भर आईं।


नवीन ने कहा, “तुम्हारा खाली गला मुझे अच्छा नहीं लगता। तुम इस घर की बहू हो, और तुम्हें भी सम्मान मिलना चाहिए।”


कनक की खुशी ज्यादा देर टिक न सकी। तभी शारदा और मिथाली कमरे में आ गईं।


शारदा ने गुस्से में कहा,

“अच्छा तो ये चाल है तुम्हारी? मेरे बेटे को फँसाकर उससे गहने ले रही हो?”


इतना कहकर शारदा ने कनक के गाल पर जोर से थप्पड़ मार दिया और उसके हाथ से हार छीन लिया।


कनक सन्न रह गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

“माजी, मैंने कुछ नहीं माँगा… ये तो इन्होंने खुद दिया है…”


लेकिन कोई उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

शारदा और मिथाली गुस्से में कमरे से बाहर चली गईं।


कनक धीरे से ज़मीन पर बैठ गई। उसने पास रखी अपने माता-पिता की तस्वीर उठा ली।

आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।


“माँ… पापा… आप दोनों मुझे छोड़कर क्यों चले गए?”

“अगर आप होते, तो कोई मुझे इस तरह अपमानित नहीं करता… मैं इतनी अकेली क्यों हूँ?”


वह तस्वीर को सीने से लगाकर रोती रही।


तभी अचानक उसका फोन बज उठा।

कनक ने काँपते हाथों से आँसू पोंछे और फोन उठाया।


“हेलो… क्या मेरी बात कनक जी से हो रही है?”

फोन के उस पार एक गंभीर आवाज़ थी।


कनक ने धीमे से जवाब दिया, “जी… मैं ही कनक बोल रही हूँ…”



छुपा हुआ सच...


फोन पर एक गंभीर और धीमी आवाज़ आई—


“बेटी, क्या मैं कनक से बात कर रहा हूँ?”


“जी, मैं ही कनक बोल रही हूँ… आप कौन?” कनक ने घबराते हुए पूछा।


“बेटी, मेरा नाम मिथिलेश है। मैं तुम्हारे नाना जी का वकील हूँ।”


यह सुनकर कनक कुछ पल के लिए चुप रह गई।

“नाना…? लेकिन मेरे तो कोई नाना नहीं हैं। माँ ने कभी उनके बारे में कुछ नहीं बताया।”


मिथिलेश ने शांत स्वर में कहा,

“बेटी, तुम्हारी माँ ने अपने परिवार के खिलाफ जाकर एक साधारण माली से शादी की थी। तुम्हारे नाना इस शहर के बहुत बड़े और सम्मानित रईस थे। उन्हें यह रिश्ता मंजूर नहीं था, इसलिए उन्होंने तुम्हारी माँ से सारे संबंध तोड़ लिए थे।”


कनक की आँखें भर आईं।

“तो फिर अब आप मुझे क्यों फोन कर रहे हैं?”


वकील ने धीरे से कहा,

“बेटी, इंसान गुस्से में फैसले ले लेता है, लेकिन खून का रिश्ता कभी खत्म नहीं होता। तुम्हारे नाना जी ने जीवन के आख़िरी समय में अपनी गलती महसूस की। उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी है। उन्होंने कहा था कि जब समय सही हो, तब तुम्हें यह सच बताया जाए।”


अगले दिन कनक दिए गए पते पर पहुँची।

वह एक पुराना लेकिन शाही बंगला था। अंदर बड़े-बड़े झूमर, पुरानी तस्वीरें और लकड़ी का भारी फर्नीचर था।


मिथिलेश ने उसे बैठाकर एक फाइल उसके सामने रखी।

“यह तुम्हारे नाना जी की वसीयत है।”


कनक काँपते हाथों से कागज़ देखने लगी।

उसमें लिखा था कि शहर में कई ज़मीनें, मकान, खेत और बैंक में जमा करोड़ों रुपये—सब कुछ कनक के नाम है।


कनक की आँखों से आँसू बह निकले।

उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जो लड़की अब तक दो वक्त की रोटी के लिए मेहनत करती थी, वही आज करोड़ों की मालकिन बन चुकी है।


लेकिन उसके दिल में घमंड नहीं था—सिर्फ़ एक सवाल था—

“काश, माँ यह दिन देखने के लिए ज़िंदा होतीं…” 



कनक जब उस पुराने बंगले से वापस घर लौटी, तो उसके चेहरे पर न कोई घमंड था और न ही कोई बदलाव।

जैसे वह पहले थी, वैसी ही रही — शांत, विनम्र और सबका आदर करने वाली।


उसने घर में कदम रखते ही सबसे पहले गंगा देवी और शारदा के पैर छुए। फिर चुपचाप रसोई में जाकर रोज़ की तरह काम में लग गई। मानो कुछ हुआ ही न हो।


कुछ दिनों बाद वही वकील साहब पूरे परिवार के सामने आए। उनके हाथ में कुछ कागज़ थे।

उन्होंने सबके सामने सच बताया —


“कनक इस शहर के सबसे बड़े रईस की नातिन है। उसके नाना ने अपनी सारी संपत्ति इसके नाम की है।”


यह सुनकर सब स्तब्ध रह गए।

शारदा और मिथाली एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं। उन्हें अपने व्यवहार पर शर्म आने लगी। जिस लड़की को वे नौकरानी समझती थीं, वह तो करोड़ों की मालकिन निकली।


लेकिन कनक के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं था। वह पहले की तरह ही सबके लिए चाय लेकर आई और चुपचाप खड़ी हो गई।


गंगा देवी मुस्कुराईं और बोलीं,

“देखा शारदा, असली अमीरी सोने-चांदी से नहीं होती। असली अमीरी संस्कारों और अच्छे दिल से होती है।”


शारदा की आँखें झुक गईं।

उन्हें अपने शब्द और व्यवहार याद आने लगे।


कनक धीरे से उनके पास गई, उनके पैर छुए और बोली,

“माँ, मुझे आपकी दौलत या घर की शान नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ आपका प्यार चाहिए।”


यह सुनते ही शारदा की आँखों से आँसू बहने लगे।

उन्होंने कनक को उठाकर सीने से लगा लिया।


उस पल घर में पहली बार सच्ची खुशी और अपनापन महसूस हुआ।

सोने के गहनों की चमक फीकी पड़ गई, लेकिन रिश्तों की चमक और भी ज्यादा जगमगा उठी।



सीख:


पैसा इंसान को बड़ा नहीं बनाता।


संस्कार और सादगी ही असली दौलत हैं।


गरीब समझकर किसी का अपमान नहीं करना चाहिए।


प्यार और धैर्य से हर दिल जीता जा सकता है।





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