जब दोष कुंडली से निकलकर दिल में उतर आया

Emotional Indian family moment showing a young bride expressing her feelings respectfully to her mother-in-law inside a traditional home, symbolizing understanding, family values, and emotional healing


“मैं शादी करूँगा तो सिर्फ राधा से…

वरना मैं ज़िंदगी भर अकेला रह लूँगा।”


आकाश की आवाज़ तेज़ नहीं थी,

लेकिन उसमें ऐसा ठहराव था

जिसके आगे बहस बेकार थी।


माँ — सरला देवी — पलंग के किनारे बैठीं रो रही थीं।


“बेटा…

तू मेरी गोद में पला है।

मैं तेरा बुरा कैसे चाहूँगी?

उस लड़की की कुंडली में ग्रह दोष है।

ऐसी बहू घर में आती है

तो खुशियाँ धीरे-धीरे मर जाती हैं।”


आकाश की आँखें भी भर आईं।


“माँ…

अगर मेरी खुशियाँ मरेंगी

तो सिर्फ तब

जब आप मेरी खुशी को

दोष समझेंगी।”


घर में कई रातें बिना नींद के बीतीं।

आख़िर माँ को झुकना पड़ा।


पंडित जी आए।

पूजा-पाठ हुआ।

राधा की प्रतीकात्मक शादी

एक पेड़ से कराई गई।


माँ का मन तब भी नहीं माना।


राधा बहू बनकर आई —

लाल जोड़े में,

हाथ काँपते हुए,

और दिल में एक ही डर —

कहीं मैं इस घर में बोझ न बन जाऊँ।


शुरुआत के दिनों में

वह हर काम पर मुस्कुराती रही।


लेकिन घर में जैसे ही कुछ गलत होता,

उँगली उसी पर उठती।


दूध ज़रा-सा फट जाता —

तो घर में फुसफुसाहट फैल जाती,

“इसी के आने से हुआ है…”


मंदिर में जलता दीया

अगर हवा से बुझ जाता —

तो दोष भी उसी पर आ टिकता,

“देखा… अशुभ कदम।”


आकाश सब सुनकर भी चुप रहता —

क्योंकि माँ को जवाब देना

उसे अपमान लगता था।


और राधा…

वह तो और भी चुप हो जाती।


क्योंकि वह जानती थी —

हर बार अपनी सफ़ाई देना

हर बार खुद को

और छोटा कर देना होता है।



क्योंकि वह जानती थी —

हर बार जवाब देना

हर बार हार जाना होता है।


एक दिन आकाश अचानक बीमार पड़ गया।

चेहरा पीला था, आँखों में थकान उतर आई थी।

बिस्तर पर लेटा वह किसी बुझते दीपक-सा लग रहा था।


डॉक्टर ने नाड़ी देखी,

रिपोर्टें उलटीं-पलटीं

और शांत स्वर में कहा—


“शरीर में कोई बड़ी बीमारी नहीं है।

बस बहुत ज़्यादा तनाव है।

आराम चाहिए… और अपनापन भी।”


घर लौटते ही

माँ का डर गुस्से में बदल गया।

वह रो पड़ीं, चीख पड़ीं—


“मैंने कहा था ना!

मैंने पहले ही समझाया था!

इस लड़की ने मेरे बेटे की ज़िंदगी जहरीली कर दी है।

इसी के कदम अशुभ हैं!”


शब्द नहीं थे,

मानो पत्थर थे

जो सीधे राधा के सीने पर आकर गिरे।


उस पल

राधा का वर्षों से बंधा सब्र

टूटकर बिखर गया।


वह बिना कुछ कहे

धीरे-धीरे माँ के पास गई,

और उनके पैरों में बैठ गई।


उसकी आवाज़ काँप रही थी,

आँखों से आँसू बह रहे थे—


“माँ…

अगर सच में

मेरे इस घर में आने से

आपका बेटा बीमार पड़ा है,

तो मैं आज ही

यह घर छोड़ दूँगी।


मुझे किसी से शिकायत नहीं होगी।


बस…

एक सवाल पूछने का हक़ दे दीजिए।


जब आपको पता था

कि मेरी कुंडली में दोष है,

तो आपने मुझे

इस घर की बहू क्यों बनाया?


क्या सिर्फ इसलिए

कि मैं हर दर्द चुपचाप सह लूँ,

हर परेशानी का दोष अपने सिर ले लूँ,

और कभी सवाल न करूँ?”


कमरे में सन्नाटा था।

सिर्फ राधा की सिसकियाँ

और माँ की भारी साँसें।


उस पल

माँ के दिल में

पहली बार कुछ टूटने लगा था…



माँ चुप थीं।


राधा की आवाज़ रोते-रोते टूट गई।


“दोष मेरी कुंडली में नहीं है माँ…

दोष उस डर में है

जो आपने मेरे लिए पाल रखा है।”


वह एक पल रुकी,

जैसे हिम्मत समेट रही हो।


“जिस दिन

आप मुझे बहू नहीं,

अपनी बेटी मान लेंगी…

उसी दिन

यह सारा दोष

अपने आप खत्म हो जाएगा।”


इतना कहकर

राधा की आँखों से आँसू बह निकले।

वह और कुछ नहीं बोल पाई।


कमरे में सन्नाटा था—

कोई ताना नहीं,

कोई आरोप नहीं,

बस राधा की दबाई हुई सिसकियाँ

जो दीवारों से टकराकर

सरला देवी के दिल तक पहुँच रही थीं।


उस रात

सरला देवी की आँखों में नींद नहीं थी।


बार-बार

राधा का झुका हुआ चेहरा,

उसकी काँपती आवाज़,

और वे शब्द

उनके मन में गूंजते रहे।


पहली बार

उन्होंने खुद से पूछा—

दोष सच में कुंडली में था…

या कहीं उनके अपने मन में?


पहली बार

उन्हें लगा

कि बहू ने उनका बेटा नहीं छीना,

बल्कि उनके डर ने।


कुछ हफ्तों बाद

आकाश पूरी तरह ठीक हो गया।

और कुछ महीनों में

उसे प्रमोशन मिल गया।


उस दिन

माँ ने खुद राधा के हाथों से

मिठाई खाई।


और पहली बार कहा—


“आज समझ में आया बेटा…

दोष ग्रहों में नहीं,

हमारी सोच में होता है।


और आज

मैं उस दोष से मुक्त हो रही हूँ।”


राधा रो पड़ी।


क्योंकि

आज पहली बार

वह बहू नहीं,

घर की बेटी बनी थी।




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