खामोशी के बीच एक रिश्ता
रात गहरी हो चुकी थी।
घर के हर कोने में सन्नाटा था,
बस घड़ी की टिक-टिक और खिड़की से आती ठंडी हवा।
सोफे पर लेटी काव्या की आँखों में नींद नहीं थी।
छत को देखते-देखते उसे लग रहा था जैसे
वो किसी और की ज़िंदगी में आ गई हो।
बेड पर पीठ किए लेटा अर्णव भी जाग रहा था।
दोनों के बीच बस कुछ कदमों की दूरी थी,
लेकिन एहसासों के बीच मीलों का फासला।
कुछ देर बाद काव्या धीरे से बोली—
“आपको मेरी वजह से परेशानी तो नहीं हुई…?”
अर्णव ने पलटकर नहीं देखा।
बस हल्की-सी सांस ली।
“नहीं।”
बस एक शब्द।
ना गुस्सा, ना अपनापन।
काव्या फिर चुप हो गई।
अगली सुबह...
सुबह घर में हलचल थी।
आंगन में आवाज़ें गूंज रही थीं,
कमरों में आते-जाते कदमों की आहट थी।
सास-ससुर और रिश्तेदार,
सबकी निगाहें नई बहू को देखने को उत्सुक थीं।
काव्या ने हल्के रंग की साड़ी पहनी थी।
बाल सलीके से बंधे थे
और चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी
जो भीतर के दर्द को ढक लेती है।
रसोई में चूल्हे पर चाय चढ़ी थी।
तभी सास की आवाज़ आई—
“बहू, चाय में ज़रा अदरक ज़्यादा डाल देना,
अर्णव को बिना अदरक की चाय पसंद नहीं।”
काव्या ने बिना पलटे सिर हिलाया।
“जी, माँ।”
उसी समय अर्णव रसोई के दरवाज़े पर खड़ा था।
हाथ में मोबाइल था,
नज़रें स्क्रीन पर टिकी हुई थीं।
एक पल के लिए उसकी निगाह काव्या पर गई,
पर अगले ही पल
वह नज़रें फेरकर
फिर से मोबाइल में उलझ गया।
काव्या ने सब देख लिया,
पर कुछ कहा नहीं।
वो अब चुप रहना सीख चुकी थी।
ननद की शरारत...
दोपहर का समय था।
कमरे में हल्की धूप फैली हुई थी।
काव्या चुपचाप पलंग के किनारे बैठी थी,
हाथों की उँगलियाँ आपस में उलझी हुई थीं।
तभी दरवाज़ा धीरे से खुला
और उसकी ननद रीतिका अंदर आई।
“भाभी…
एक बात पूछूं?”
काव्या ने उसकी तरफ देखा,
होठों पर हल्की-सी मुस्कान आई।
“पूछो।”
रीतिका पलंग पर बैठ गई और कुछ हिचकिचाते हुए बोली—
“भैया…
वो ऐसे ही रहते हैं
या आपसे कुछ नाराज़ हैं?”
काव्या कुछ पल तक चुप रही।
उसकी निगाहें ज़मीन पर टिकी रहीं,
जैसे शब्दों को सही जगह ढूंढ रही हों।
फिर बहुत धीमे स्वर में बोली—
“कुछ लोगों की खामोशी
उनका दर्द होती है, रीतिका।”
रीतिका उसे गौर से देखने लगी।
“आप अलग हो, भाभी…”
वो धीरे से बोली,
“अक्सर नई बहुएँ यहाँ आकर रो पड़ती हैं,
लेकिन आप…
आप तो बस चुप रहती हो।”
काव्या उठकर खिड़की के पास चली गई।
बाहर आसमान को देखते हुए
उसकी आवाज़ थोड़ी भर्रा गई—
“क्योंकि मैंने रोना
बहुत पहले सीख लिया था…”
उसने हल्की साँस ली और कहा—
“अब थक गई हूँ।”
अर्णव का अतीत...
शाम ढल चुकी थी।
छत पर अर्णव अकेला बैठा आसमान को देख रहा था।
हवा में हल्की ठंडक थी,
और मन में वही पुरानी उलझनें।
रीतिका दबे पाँव उसके पास आई और पास बैठते हुए बोली—
“भैया…
अगर आप खुश नहीं हो,
तो भाभी को ये खामोशी क्यों दे रहे हो?”
अर्णव थोड़ा चौंका।
कुछ पल चुप रहा,
फिर धीमी आवाज़ में बोला—
“मैं किसी को सज़ा नहीं दे रहा।”
रीतिका ने उसकी ओर देखा।
“तो फिर उनसे बात क्यों नहीं करते?”
अर्णव ने नज़रें उठाकर आसमान की तरफ देखा,
जैसे जवाब वहाँ लिखा हो।
“क्योंकि जिस पर कभी सबसे ज़्यादा भरोसा किया था,
वो मुझे छोड़कर चली गई।
और अब…
भरोसा करना डराने लगा है।”
हवा थोड़ी तेज़ चली,
और अर्णव की आवाज़
पहली बार टूटती हुई-सी लगी।
पहली दरार...
रात को काव्या पानी लेने उठी।
कमरे में हल्की-सी रोशनी थी।
अर्णव जाग रहा था,
खामोशी में डूबा हुआ।
कुछ पल तक काव्या बस उसे देखती रही,
फिर जैसे खुद को समझा कर बोली—
“अगर ये रिश्ता आपको बोझ लग रहा है,
तो आप मुझसे साफ़ कह सकते हैं।”
अर्णव ने पहली बार उसकी तरफ़ देखा।
उस नज़र में झुँझलाहट नहीं थी,
बस थकान और डर था।
धीमी आवाज़ में बोला—
“और अगर मैं कह दूँ
कि मुझे रिश्तों से डर लगता है…
तो?”
काव्या की आँखें भर आईं।
लेकिन उसने पलकें झपकाकर
आँसुओं को रोक लिया।
आवाज़ शांत थी,
पर भीतर बहुत कुछ काँप रहा था।
“तो… हम दोनों एक जैसे हैं।”
एक छोटा-सा कदम...
उस रात
पहली बार
दोनों ने एक-दूसरे से
मुँह नहीं मोड़ा।
न कोई कसमें थीं,
न किसी तरह का इकरार।
बस इतना-सा हुआ कि
कमरे की खामोशी
अब पहले जैसी
अजनबी नहीं रही।
काव्या ने सोते-सोते सोचा—
हर रिश्ता इश्क़ से नहीं शुरू होता,
कुछ रिश्ते दर्द की गोद में जन्म लेते हैं।
जहाँ चाहत से पहले चुप्पी होती है,
और भरोसे से पहले डर।
अब देखना ये है—
ये दर्द हमें भीतर से तोड़ देगा,
या धीरे-धीरे
हमें एक-दूसरे से जोड़ देगा।

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