सम्मान की छत
सुबह का समय था।
सर्द हवा चल रही थी।
मोहनलाल जी अपने पुराने साइकिल की चेन ठीक कर रहे थे। आज फिर उन्हें दफ्तर के लिए देर हो रही थी।
तभी सामने से उनके बेटे रवि की नई चमचमाती कार आकर रुकी।
“पापा, आखिर कब तक ये पुरानी साइकिल चलाते रहेंगे? चलिए, मैं छोड़ देता हूं।”
मोहनलाल जी ने बिना सिर उठाए कहा,
“तुम्हें ऑफिस नहीं जाना क्या?”
रवि थोड़ा झुंझलाया,
“जाना है… लेकिन लोग क्या सोचते होंगे? सरकारी अफसर का बाप साइकिल से जाता है!”
मोहनलाल जी ने इस बार उसकी ओर देखा।
“लोग क्या सोचते हैं, ये सोचने के लिए मेरे पास समय नहीं है बेटा।”
रवि गाड़ी घुमाकर चला गया।
दरवाज़े पर खड़ी सावित्री देवी सब सुन रही थीं।
उन्होंने धीमे से कहा,
“जब वो कह रहा था तो चले जाते।”
मोहनलाल जी मुस्कुराए,
“जिस दिन मैं उसके सहारे चलने लगा, उस दिन से वो मुझे बोझ समझने लगेगा।”
सावित्री चुप हो गईं।
बदलता व्यवहार...
रवि की शादी को डेढ़ साल हुआ था। उसकी पत्नी प्रिया पढ़ी-लिखी, समझदार लड़की थी… लेकिन शादी के बाद रवि बदलने लगा था।
पहले हर बात में “पापा” कहते नहीं थकता था, अब हर बात में “लोग क्या कहेंगे” जुड़ गया था।
धीरे-धीरे दोनों ने घर में अलग रसोई बना ली।
फिर बात अलग रहने तक पहुंच गई।
एक दिन रवि ने साफ कह दिया,
“पापा… हम नया फ्लैट देखने का सोच रहे हैं। ऑफिस यहां से काफी दूर पड़ता है। रोज़ आना-जाना मुश्किल हो जाता है… इसलिए शायद हमें वहां शिफ्ट होना पड़े।”
सावित्री देवी की आंखें भर आईं।
मोहनलाल जी ने बस इतना कहा,
“ठीक है बेटा, जहां तुम्हें अच्छा लगे।”
दो महीने में ही रवि और प्रिया शहर के पॉश इलाके में शिफ्ट हो गए।
अब घर बहुत शांत रहने लगा था।
पहले जहां शाम को हंसी की आवाजें गूंजती थीं, अब वहां सिर्फ घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती थी।
सावित्री कभी-कभी कहतीं,
“अलग घर में रहता है तो क्या हुआ… कम से कम आँखों के सामने तो था। जब मन करता, उसका चेहरा देख लेती थी। अब तो बस यादें ही साथ हैं।”
मोहनलाल जी चुप रहते।
उन्होंने अपनी पेंशन और थोड़ी बचत से घर का एक हिस्सा ठीक कराया और किराए पर दे दिया।
“कम से कम घर में रौनक तो रहेगी,” उन्होंने कहा।
असल में वो सावित्री के भविष्य की चिंता कर रहे थे।
अचानक आई जरूरत...
एक साल बाद की बात है।
शाम ढल रही थी। आँगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी। सावित्री तुलसी में पानी देकर अंदर जाने ही वाली थीं कि दरवाज़े पर किसी ने आवाज़ दी—
“मम्मी!”
आवाज़ पहचानते ही उनका दिल धड़क उठा।
वो जल्दी से बाहर आईं। सामने रवि खड़ा था।
“अरे बेटा! अचानक? सब ठीक तो है?” उन्होंने घबराहट और खुशी के मिले-जुले भाव से पूछा।
रवि थोड़ा असहज लग रहा था। नज़रें झुकी हुई थीं।
“मम्मी… प्रिया मां बनने वाली है।”
सावित्री की आंखें खुशी से चमक उठीं।
“सच? ये तो बहुत बड़ी खुशखबरी है!” उनकी आवाज़ भावुक हो गई।
रवि ने धीमे से कहा,
“हाँ मम्मी… लेकिन डॉक्टर ने कहा है कि उसे पूरा आराम चाहिए। वो ज़्यादा काम नहीं कर सकती। हम चाहते हैं कि आप और पापा हमारे साथ चलो। प्रिया को आपकी जरूरत है।”
सावित्री ने उम्मीद भरी नज़र से मोहनलाल जी की ओर देखा, जो चुपचाप दरवाज़े के पास खड़े सब सुन रहे थे।
मोहनलाल जी ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“बेटा, हम यहीं ठीक हैं।”
रवि ने थोड़ा अधीर होकर कहा,
“पापा, अब पुरानी बातें छोड़ दीजिए। वो सब गलतफहमियाँ थीं।”
मोहनलाल जी की आवाज़ इस बार थोड़ी कड़ी हो गई।
“पुरानी बातें नहीं बेटा… अनुभव हैं। अनुभव सिखाते हैं कि जब जरूरत खत्म हो जाती है, तो अक्सर रिश्तों का व्यवहार भी बदल जाता है।”
रवि कुछ पल चुप खड़ा रहा। उसके पास जवाब नहीं था।
स्थिति संभालने के लिए सावित्री बोलीं,
“एक काम करो बेटा, तुम दोनों यहीं आ जाओ। घर बड़ा है। मैं प्रिया की देखभाल भी कर लूंगी और सब साथ रहेंगे तो अच्छा भी लगेगा।”
रवि ने धीमे स्वर में कहा,
“मम्मी… वो फ्लैट अभी लिया है। लोन चल रहा है। उसे छोड़ना आसान नहीं है।”
मोहनलाल जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
“और हमने भी घर का एक हिस्सा किराए पर दे दिया है। दो दिन में किरायेदार आ जाएंगे। अब यहां पहले जैसी जगह नहीं है।”
रवि का चेहरा उतर गया। शायद उसे उम्मीद थी कि माता-पिता बिना शर्त उसके साथ चल पड़ेंगे।
कुछ क्षण भारी खामोशी में बीते।
फिर उसने बस इतना कहा, “ठीक है मम्मी…”
और बिना पीछे मुड़े धीरे-धीरे चला गया।
सावित्री दरवाज़े पर खड़ी उसे जाते हुए देखती रहीं। उनकी आंखों में खुशी की जगह अब नमी थी।
सच्चा सहारा...
रात पूरी तरह ढल चुकी थी।
आँगन में सन्नाटा पसरा था।
सावित्री चुपचाप चारपाई पर बैठी थीं। उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
“हमारा ही बेटा है… कैसे मना कर दिया आपने?” उनकी आवाज़ भर्रा गई।
मोहनलाल जी उनके पास आकर धीरे से बैठे।
“मैं उसे सज़ा नहीं दे रहा हूँ, सावित्री… मैं तुम्हारा भविष्य सुरक्षित कर रहा हूँ।”
सावित्री ने नम आँखों से उनकी ओर देखा।
मोहनलाल जी ने शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा,
“सोचो… अगर कल मैं नहीं रहा तो? क्या तुम उसके घर में सम्मान से रह पाओगी? या हर बात पर ताने सुनोगी?”
यह सुनकर सावित्री चुप हो गईं। उनके आँसू और तेज़ बहने लगे, लेकिन अब उनमें शिकायत कम और समझ ज्यादा थी।
मोहनलाल जी ने आगे कहा,
“यह घर तुम्हारा है। हमने पूरी ज़िंदगी की मेहनत से इसे बनाया है। इसका एक हिस्सा किराए पर रहेगा तो आमदनी भी होती रहेगी। तुम्हें किसी के सामने हाथ फैलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।”
सावित्री ने धीरे से अपने आँसू पोंछे।
“आप ठीक कह रहे हैं,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
“अपना वही होता है जो हर परिस्थिति में साथ दे… जो ज़रूरत के हिसाब से साथ न बदले।”
मोहनलाल जी ने गहरी साँस ली।
कई दिनों बाद उनके चेहरे पर सुकून दिखाई दे रहा था।
उस रात दोनों ने पहली बार यह महसूस किया कि
कभी-कभी अपने ही बच्चों से दूरी बनाना,
अपने सम्मान को बचाने के लिए ज़रूरी हो जाता है।
कुछ ही महीनों में उस घर का सन्नाटा बदलने लगा।
किराएदारों के छोटे-छोटे बच्चों की खिलखिलाहट आंगन में गूंजने लगी।
जहां कभी उदासी पसरी रहती थी, वहां अब फिर से जीवन लौट आया था।
सावित्री देवी रोज सुबह आंगन में तुलसी को जल चढ़ातीं, दीया जलातीं और फिर पड़ोस की महिलाओं के साथ बैठकर थोड़ी देर हंसी-मजाक कर लेतीं। उनके चेहरे पर अब पहले जैसी बेचैनी नहीं, एक शांत संतोष था।
मोहनलाल जी भी अपने पुराने साइकिल से ही बाजार जाते। लोगों की बातों की परवाह करना उन्होंने बहुत पहले छोड़ दिया था। उनके लिए सादगी ही सम्मान थी।
एक दिन अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।
सावित्री ने दरवाजा खोला तो सामने रवि खड़ा था। उसकी आंखों में झिझक थी… और गोद में एक नन्हा-सा बच्चा।
“मम्मी…” उसकी आवाज भर्रा गई।
मोहनलाल जी भी बाहर आ गए।
रवि धीरे से बोला,
“पापा… ये आपका पोता है।”
मोहनलाल जी ने कांपते हाथों से बच्चे को अपनी गोद में लिया। नन्हीं उंगलियों ने उनकी उंगली थाम ली। उनकी आंखें भर आईं।
कुछ पल के मौन के बाद उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“बेटा, यह घर हमेशा तुम्हारे लिए खुला है… लेकिन सम्मान के साथ।”
रवि की नजरें झुक गईं। शायद पहली बार उसने पिता की चुप्पी के पीछे छिपा दर्द समझा था।
उस दिन के बाद मुलाकातें बढ़ने लगीं।
रिश्तों की दूरी धीरे-धीरे कम होने लगी।
लेकिन इस बार मोहनलाल और सावित्री ने एक बात साफ समझ ली थी—
प्यार जरूरी है,
पर आत्मसम्मान उससे भी ज्यादा जरूरी है।
उन्होंने तय कर लिया था कि अब उनका जीवन किसी के सहारे नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और संतोष के सहारे चलेगा।
क्योंकि रिश्ते दिल से बनते हैं,
पर टिकते तभी हैं जब उनमें सम्मान बना रहे।

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