दो दिलों की दूरी

Indian family dining together at home, elderly mother serving traditional food while son eats happily and daughter-in-law sits thoughtfully with smartphone, emotional family moment


सुबह की हल्की धूप आँगन में फैल रही थी।

सरला जी तुलसी में पानी डालते हुए भगवान से यही प्रार्थना कर रही थीं — “हे प्रभु, बस मेरे बच्चों का घर-परिवार खुशहाल रहे।”


आज उनका मन बहुत प्रसन्न था।

तीन महीने बाद उनका बेटा रोहन और बहू निधि दिल्ली से वापस जयपुर आ रहे थे।


रोहन की नई नौकरी दिल्ली में लगी थी। शादी के तुरंत बाद ही दोनों को जाना पड़ा था। अब कंपनी ने कुछ दिनों के लिए वर्क फ्रॉम होम दे दिया था, इसलिए दोनों घर आ रहे थे।


सरला जी सुबह से ही तैयारियों में जुटी थीं।

रोहन को दाल-बाती बहुत पसंद थी, और निधि को पनीर की सब्ज़ी।

उन्होंने दोनों की पसंद का खाना बनाया।

मीठे में चूरमा भी तैयार किया।


बार-बार घड़ी देखतीं और मुस्कुरा देतीं।



दोपहर के करीब बारह बजे दरवाज़े की घंटी बजी।


सरला जी जैसे इसी पल का इंतज़ार कर रही थीं। वे जल्दी-जल्दी पल्लू ठीक करती हुई दरवाज़े तक पहुँचीं और मुस्कुराते हुए कुंडी खोली।


सामने रोहन और निधि खड़े थे। सफर की हल्की थकान उनके चेहरों पर साफ दिखाई दे रही थी।


दोनों ने झुककर सरला जी के पैर छुए।


सरला जी ने पहले बेटे के सिर पर हाथ फेरा, फिर निधि को अपने सीने से लगा लिया। उनकी आँखें खुशी से चमक उठीं।


“कैसी हो बेटा? बहुत दुबली हो गई हो!” उन्होंने स्नेह से कहा।


निधि ने हल्की सी मुस्कान दी और बोली, “ठीक हूं मम्मी जी,” फिर अपना बैग उठाकर अंदर चली गई।


रोहन घर के अंदर कदम रखते हुए बोला,

“मां, सच कहूं तो घर आकर जो सुकून मिलता है, वो कहीं और नहीं।”


यह सुनते ही सरला जी का मन भर आया। उनकी आँखों में खुशी के आँसू छलक उठे। इतने दिनों बाद घर में फिर से रौनक लौट आई थी।


पहला दिन...


खाना लग चुका था।

डाइनिंग टेबल पर गरमागरम दाल, सब्ज़ी और रोटियों की खुशबू फैल रही थी।


रोहन बड़े चाव से खाने लगा और मुस्कुराते हुए बोला —

“मां, सच में… आपके हाथ के खाने जैसा स्वाद कहीं नहीं मिलता।”


सरला जी के चेहरे पर संतोष की हल्की सी मुस्कान आ गई।


उधर निधि ने दाल का एक चम्मच चखा और हल्की सी भौंहें सिकोड़ते हुए बोली —

“मम्मी जी, इसमें इतना घी क्यों डाला है? मैं अभी डाइट पर हूं।”


सरला जी ने शांत स्वर में कहा —

“अरे बेटा, तुम्हारे लिए अलग से कम घी वाली सब्ज़ी भी बनाई है। सोचा था तुम्हें पसंद आएगी।”


निधि ने प्लेट में थोड़ा सा खाना लिया, दो-तीन कौर खाए और फिर मोबाइल उठाते हुए बोली —

“मैंने ऑनलाइन सलाद ऑर्डर कर दिया है। वही खा लूंगी।”


यह सुनकर सरला जी कुछ पल के लिए चुप रह गईं।

उन्होंने अपनी भावनाएं मन में ही दबा लीं और सोचा —


“नई पीढ़ी है… आदतें अलग होंगी। धीरे-धीरे सब समझ आ जाएगा।”


बदलता व्यवहार...


अगले कुछ दिनों में सरला जी ने एक बात गौर से महसूस की —

निधि ज़्यादातर समय अपने कमरे में ही रहती थी।


कभी वह वीडियो कॉल पर अपनी सहेलियों से बात करती,

कभी लैपटॉप खोलकर ऑफिस का काम करती,

और कभी घंटों मोबाइल पर सोशल मीडिया चलाती रहती।


घर के छोटे-मोटे कामों में भी वह ज़्यादा दिलचस्पी नहीं लेती थी।

रसोई में मदद करने की बात तो दूर, कभी यह भी नहीं पूछती थी कि कुछ करना है क्या।


सरला जी बाहर से भले ही कुछ न कहतीं,

लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें थोड़ा अकेलापन महसूस होने लगा था।


रोहन भी असमंजस में रहता।

वह समझ नहीं पाता कि क्या करे।

एक तरफ मां थीं, जिन्होंने उसे बड़ी मेहनत से पाला था,

और दूसरी तरफ पत्नी थी, जिसकी भावनाओं का भी उसे ध्यान रखना था।

वह दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहता।


एक दिन पास ही के घर में सत्संग रखा गया था।

सोसायटी की कई महिलाएँ वहां जाने वाली थीं।


सरला जी ने प्यार से कहा —

“निधि बेटा, आज पड़ोस में सत्संग है, चलो तुम भी साथ चलो। थोड़ा अच्छा लगेगा।”


निधि ने बिना ज्यादा सोचे जवाब दिया —

“मम्मी जी, मुझे ऐसे प्रोग्राम पसंद नहीं हैं। आप चली जाइए।”


उसके स्वर में न तो अपनापन था और न ही उत्साह।


सरला जी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा —

“ठीक है बेटा, कोई बात नहीं।”


और फिर चुपचाप दुपट्टा ओढ़कर अकेले ही सत्संग के लिए निकल गईं।


चलते-चलते उनके मन में एक ही ख्याल था —

“शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा…” 


टकराव...


उस रात अचानक बिजली चली गई।

पूरा घर अंधेरे में डूब गया।


कुछ देर तक इन्वर्टर ने साथ दिया, लेकिन थोड़ी ही देर में वह भी बंद हो गया। अब न पंखा चल रहा था, न लाइट।


गर्मी बहुत ज्यादा थी। हवा जैसे थम सी गई थी।


निधि पसीना पोंछते हुए झुंझलाकर बोली —

“यह कैसा घर है? यहाँ तो बिजली भी ठीक से नहीं रहती। दिल्ली में तो कभी ऐसी परेशानी नहीं होती।”


उसकी बात सुनकर सरला जी का दिल हल्का सा दुख गया।

यह वही घर था जहाँ उन्होंने अपने जीवन के कितने साल बिताए थे, कितनी यादें संजोई थीं।


लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।

चुपचाप हाथ से पंखा झलने लगीं।


रोहन ने शांत स्वर में कहा —

“निधि… यही मेरा बचपन का घर है। इसी घर में मैंने सपने देखे, यहीं बड़ा हुआ हूँ।”


रोहन की आवाज़ में हल्की सी पीड़ा थी।


निधि ने उसकी तरफ देखा।

उसे महसूस हुआ कि उसने कुछ ज्यादा ही कह दिया है।


वह चुप हो गई।

कमरे में अंधेरा था, पर उस अंधेरे में एक सच्चाई साफ दिखाई दे रही थी —

घर सिर्फ दीवारों से नहीं, भावनाओं से बनता है।


सच का सामना...


अगले दिन सुबह सब कुछ सामान्य ही था, लेकिन दोपहर होते-होते अचानक सरला जी को चक्कर आने लगे।

वे रसोई में काम कर रही थीं कि उनकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया और वे वहीं गिर पड़ीं।


रोहन उसी समय ऑफिस के काम में व्यस्त था।

निधि ने जैसे ही आवाज सुनी, वह दौड़कर रसोई में पहुंची। सरला जी को ज़मीन पर गिरा देख उसके होश उड़ गए।


घबराकर उसने तुरंत पड़ोसी शर्मा अंकल को बुलाया और उनकी मदद से सरला जी को डॉक्टर के पास ले गई।


जांच के बाद डॉक्टर ने कहा,

“घबराने की बात नहीं है। कमजोरी और ज्यादा थकान की वजह से ऐसा हुआ है। इन्हें आराम की सख्त जरूरत है।”


डॉक्टर की बात सुनकर निधि चुप हो गई।

उसे पहली बार एहसास हुआ कि मम्मी जी रोज सुबह से शाम तक घर का सारा काम अकेले करती हैं — बिना शिकायत, बिना आराम किए।


उस रात घर में सन्नाटा था।

सरला जी दवाई लेकर आराम कर रही थीं।


निधि चुपचाप रसोई में गई।

उसे खाना बनाना ठीक से नहीं आता था, फिर भी उसने मोबाइल पर वीडियो देखकर साधारण सी खिचड़ी बनाने की कोशिश की।

कई बार मसाले नापते हुए वह घबराई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।


जब खिचड़ी तैयार हुई तो वह थाली लेकर सरला जी के कमरे में गई।

रोहन दरवाज़े पर खड़ा यह सब देख रहा था, उसके चेहरे पर हैरानी साफ झलक रही थी।


निधि सरला जी के पास बैठ गई और धीमे स्वर में बोली,

“मम्मी जी… मुझसे बहुत गलती हो गई। मैंने कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं की कि आप अकेले कितना काम करती हैं। मैंने आपका दिल भी दुखाया… मुझे माफ कर दीजिए।”


सरला जी ने उसकी ओर देखा।

उनकी आंखों में नाराज़गी नहीं, बल्कि ममता थी।


उन्होंने प्यार से उसका हाथ थाम लिया और बोलीं,

“बेटा, घर अपनापन और समझदारी से चलता है, तकरार से नहीं। अगर हम एक-दूसरे को समझ लें, तो हर परेशानी छोटी लगने लगती है।”


निधि की आंखें नम हो गईं।

उस दिन से उसके मन में रिश्ते की असली अहमियत जाग चुकी थी।



अगले दिन से निधि ने धीरे-धीरे काम सीखना शुरू किया।

सरला जी ने भी उसे बेटी की तरह सिखाया — बिना ताना मारे, बिना शिकायत के।


अब सुबह तीनों साथ चाय पीते।

हंसी-मज़ाक होता।


रोहन सुकून से कहता —

“अब घर सच में घर लग रहा है।”


सीख:


रिश्ता चाहे सास-बहू का हो या पति-पत्नी का —

समझ और सम्मान दोनों तरफ से होना चाहिए।


अगर एक झुक जाए और दूसरा अकड़ जाए,

तो रिश्ता टूट जाता है।


पर अगर दोनों एक कदम आगे बढ़ाएं,

तो घर स्वर्ग बन सकता है।


रिश्ते बराबरी से निभते हैं, एहसान से नहीं। 




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.