भरोसे की डोरी

 

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शाम का समय था। घर के आँगन में हल्की ठंडी हवा चल रही थी।


दरवाज़े पर गाड़ी रुकती है।


रीना ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने उसका देवर अमित खड़ा था… और उसके साथ एक लड़की।


“भाभी… ये नेहा है… मेरी पत्नी।”


रीना के हाथ से थाली गिरते-गिरते बची।


“क्या? शादी कर ली? वो भी बिना बताए?”


अंदर से सास कमला जी और ससुर महेश जी भी बाहर आ जाते हैं।


कमला जी के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था।


“अमित! ये क्या किया तुमने?”


अमित धीरे से बोला, “माँ, आप मान नहीं रही थीं… और नेहा के घर वाले उसकी शादी कहीं और कर रहे थे… इसलिए हमें ये कदम उठाना पड़ा।”


कमला जी गहरी सांस लेती हैं। “ठीक है… अब शादी हो गई है तो अंदर आओ।”



गृहप्रवेश...


कमला जी मन मारकर आरती की थाली ले आईं। चेहरे पर खुशी कम और औपचारिकता ज़्यादा थी।


उन्होंने धीमे लेकिन सख्त स्वर में कहा,

“दाहिने पैर से कलश गिराओ।”


नेहा ने घबराते हुए थाली की लौ को देखा, फिर झुककर कलश को हल्के से अपने दाहिने पैर से छुआ। चावल बिखरते हुए चौखट पार कर गए और वह धीरे-धीरे घर के अंदर आ गई। उसके कदमों में झिझक थी, आँखों में संकोच।


रीना मुस्कुराई और माहौल हल्का करने की कोशिश करते हुए बोली,

“चलो नेहा, अब पहली रसोई की तैयारी करो।”


नेहा का दिल तेज़ धड़क रहा था। नए घर, नए लोग, और पहली ही परीक्षा। उसने हिम्मत जुटाई और धीमे स्वर में कहा,

“जी भाभी… मैं कोशिश करूँगी।”


रसोई में जाकर उसने पूरे मन से खीर बनाई। दूध उबलता रहा, चीनी घुलती रही, और इलायची की खुशबू पूरे घर में फैल गई। जब खीर सबके सामने परोसी गई तो एक-एक कर सभी ने चखा।


“बहुत स्वादिष्ट बनी है।”

“अरे वाह, पहली ही बार में इतना अच्छा!”


सब तारीफ़ कर रहे थे।


तभी कमला जी ने हल्की मुस्कान के साथ, मगर तंज भरे स्वर में कहा,

“आजकल तो यूट्यूब देखकर कोई भी सीख जाता है।”


नेहा ने पल भर को उनकी ओर देखा। वह समझ गई कि बात सिर्फ खीर की नहीं है। उसने विनम्रता से जवाब दिया,

“जी माँजी, यूट्यूब से ही सीखा है… पर मेहनत तो मैंने ही की है ना।”


उसका स्वर शांत था, लेकिन आत्मसम्मान से भरा हुआ।


कमला जी को यही बात चुभ गई। उन्हें लगा जैसे नई बहू पहले ही दिन जवाब देने लगी हो। कमरे का माहौल अचानक थोड़ा भारी हो गया।


छोटी गलती, बड़ा ताना...


अगले दिन सुबह-सुबह नेहा घर के काम में लग गई। उसने सोचा कि आज सबको दिखा देगी कि वह भी घर अच्छे से संभाल सकती है।


वॉशिंग मशीन के पास रखे सारे कपड़े उसने एक साथ उठा लिए और बिना ज़्यादा ध्यान दिए मशीन में डाल दिए।


उसे यह समझ नहीं आया कि सफेद और रंगीन कपड़े अलग-अलग धोए जाते हैं।


कुछ देर बाद जब कपड़े धुलकर बाहर निकले, तो सब हैरान रह गए। सफेद शर्ट पर हल्का गुलाबी रंग चढ़ चुका था।


कमला जी ने जैसे ही शर्ट देखी, उनका गुस्सा फूट पड़ा।

“ये क्या किया तुमने? घर संभालना आता भी है तुम्हें?”


नेहा सकपका गई। उसके हाथ कांपने लगे। आँखों में आँसू भर आए।

“मुझसे गलती हो गई माँजी… मुझे सच में नहीं पता था कि ऐसे रंग छोड़ देगा।”


रीना ने स्थिति संभालने की कोशिश की।

“माँजी, छोटी सी गलती है। पहली बार में हो जाता है। हम भी तो सीखते-सीखते ही सीखे थे।”


लेकिन कमला जी का गुस्सा अभी शांत नहीं हुआ था। उन्होंने ताना मारते हुए कहा,

“हूँह… लव मैरिज का यही नतीजा होता है। ना घर का काम आता है, ना तौर-तरीके।”


नेहा चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी रही।

उसे शर्ट खराब होने से ज्यादा दुख इस बात का था कि उसकी एक छोटी सी गलती को उसके रिश्ते से जोड़ दिया गया था।


शक की शुरुआत...


कुछ महीनों बाद अमित के ऑफिस का काम सच में बढ़ गया था।

नई प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी उसे दी गई थी, इसलिए वह पहले से ज़्यादा व्यस्त रहने लगा।


अब अक्सर ऐसा होता कि वह देर रात घर लौटता।

कभी मीटिंग, कभी क्लाइंट कॉल, तो कभी प्रेज़ेंटेशन की तैयारी।


शुरू-शुरू में नेहा समझने की कोशिश करती रही, लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में हल्की-सी बेचैनी जन्म लेने लगी।


एक शाम अमित नहाने गया हुआ था। उसका फोन टेबल पर रखा था।

अचानक स्क्रीन चमकी — “रिया कॉलिंग…”


नेहा की नज़र उसी नाम पर टिक गई।


उसका दिल थोड़ा तेज़ धड़कने लगा।


अमित बाहर आया तो नेहा ने सीधे पूछा —

“ये रिया कौन है?”


अमित ने सामान्य लहज़े में जवाब दिया,

“ऑफिस में मेरे साथ काम करती है।”


नेहा ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“रात-रात में कॉल क्यों करती है?”


अमित ने तौलिया रखते हुए कहा,

“मीटिंग्स होती हैं नेहा… प्रोजेक्ट बहुत बड़ा है।”


बात तो सीधी थी, जवाब भी साफ था।

लेकिन नेहा का मन मानने को तैयार नहीं था।


अब जब भी अमित देर से आता, नेहा के मन में वही नाम गूंजता — रिया।

फोन बजता तो उसे लगता, ज़रूर वही होगी।

अमित मुस्कुराकर बात करता तो उसे शक होता, शायद उसी से बात कर रहा है।


धीरे-धीरे उसका भरोसा कमजोर पड़ने लगा।

छोटी-छोटी बातों में उसे छिपी हुई सच्चाई दिखाई देने लगी।

वो हर जवाब के पीछे सवाल ढूंढने लगी।


और इसी तरह, प्यार के बीच धीरे-धीरे शक की एक पतली दीवार खड़ी होने लगी।


झगड़े बढ़ते गए...


“आज फिर इतनी देर?” नेहा ने दरवाज़ा खोलते ही सवाल किया।


अमित ने थकी हुई आवाज़ में जवाब दिया, “मीटिंग थी, थोड़ा लंबा खिंच गया।”


नेहा की आँखों में शक साफ झलक रहा था।

“या फिर रिया के साथ कहीं घूम रहे थे?”


अमित एक पल के लिए चुप रह गया। उसके चेहरे पर थकान के साथ झुंझलाहट भी उभर आई।

“नेहा, प्लीज़… हर बात में उसका नाम मत लिया करो। भरोसा करो मुझ पर।”


नेहा ने ठंडी आवाज़ में कहा,

“भरोसा यूँ ही नहीं होता अमित… जब बार-बार वजह मिले, तो शक अपने आप पैदा हो जाता है।”


अमित ने गहरी सांस ली।

वो समझ नहीं पा रहा था कि खुद को कैसे साबित करे।


धीरे-धीरे यही छोटी-छोटी बातें रोज़ के झगड़े में बदलने लगीं।

घर का माहौल भारी रहने लगा।


कमला जी दूर से ये सब देखतीं और मन ही मन बुदबुदातीं —

“मैंने पहले ही कहा था… बिना सोच-समझे किए फैसलों का यही नतीजा होता है…”



एक दिन…


एक दिन सच में अमित बहुत देर से घर लौटा।


रात के साढ़े दस बज चुके थे। घर के बाकी लोग खाना खाकर अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। दरवाज़े की घंटी बजी।


नेहा दरवाज़े के पास खड़ी थी… लेकिन इस बार उसने तुरंत दरवाज़ा नहीं खोला।


उसका दिल गुस्से और दुख से भरा हुआ था।


घंटी दोबारा बजी।


“नेहा… दरवाज़ा खोलो,” बाहर से अमित की थकी हुई आवाज़ आई।


नेहा ने अंदर से ही तेज़ आवाज़ में कहा, “जहाँ थे, वहीं चले जाओ! मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता!”


कुछ पल के लिए बाहर सन्नाटा छा गया।


अमित ने एक बार फिर धीरे से कहा, “नेहा, दरवाज़ा खोलो… बात कर लेते हैं।”


लेकिन इस बार नेहा ने जवाब नहीं दिया।


बाहर खड़े अमित ने गहरी साँस ली… और बिना कुछ कहे सीढ़ियों से नीचे उतर गया।


नेहा दरवाज़े से टिककर खड़ी रह गई।

उसकी आँखों में आँसू भर आए।


“उसे मेरी कोई परवाह ही नहीं…” उसने खुद से कहा।


रात बीतती गई।

कमरे की लाइट बंद थी, लेकिन नेहा की आँखों में नींद नहीं थी।


कभी वह गुस्से में तकिया पकड़ लेती,

कभी मोबाइल उठाकर कॉल करने का सोचती,

फिर अहंकार उसे रोक देता।


आँसू चुपचाप उसके गालों पर बहते रहे।


थककर कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला…


और उसी रात…


उसने एक भयानक सपना देखा।


सपना...


वो मंदिर के बीचों-बीच खड़ी थी।


चारों तरफ रोशनी थी, शहनाई बज रही थी, मंत्रों की आवाज़ गूंज रही थी।


उसकी आँखों के सामने वही दृश्य था…


मंडप में अमित बैठा था — लेकिन उसके साथ नेहा नहीं, कोई और लड़की दुल्हन बनी बैठी थी।


कमला जी खुश होकर आरती की थाली घुमा रही थीं। उनके चेहरे पर संतोष था।


रिश्तेदार तालियाँ बजा रहे थे।


कुछ लोग आपस में फुसफुसा रहे थे —


“देखा? हर वक्त शक करने वाली पत्नी का यही अंजाम होता है…”


“घर को भरोसे से चलाया जाता है, जासूसी से नहीं…”


नेहा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसके कानों में आवाजें गूंजने लगीं।


वो भीड़ को चीरती हुई आगे बढ़ी।


उसकी आवाज़ कांप रही थी, आँखों से आँसू बह रहे थे —


“नहीं! अमित मेरे हैं… वो मेरे पति हैं… कोई उनसे मेरी जगह नहीं ले सकता…”


लेकिन जैसे उसकी आवाज़ किसी को सुनाई ही नहीं दे रही थी।


अमित ने एक बार भी उसकी तरफ नहीं देखा।


पंडित जी बोले —

“अब आप दोनों पति-पत्नी हुए।”


ये शब्द उसके सीने में तीर की तरह चुभ गए।


नेहा चीखी —

“अमित! मुझे छोड़कर मत जाओ… मैंने गलती की… मैं बदल जाऊँगी…”


और तभी…


अचानक मंदिर की घंटियाँ बहुत तेज़ बजने लगीं।


सब कुछ धुंधला होने लगा।


लोगों की हँसी गूंज बनकर उसके कानों में चुभने लगी।


उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई…


और वह घबराकर चीखते हुए गिर पड़ी —


“नहींऽऽऽ!”


उसी चीख के साथ उसकी आँख खुल गई…


वो अपने कमरे में थी… और सामने अमित उसे हिला रहा था।


“नेहा… क्या हुआ?”


उसने काँपते हुए अमित को कसकर पकड़ लिया।



हकीकत...


“नेहा… नेहा… क्या हुआ?”


अचानक किसी ने उसके कंधे को हल्के से झकझोरा।


नेहा की आँख खुली। वह तेज़-तेज़ साँस ले रही थी। माथे पर पसीना था और आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।


सामने अमित घबराया हुआ खड़ा था।


“तुम इतनी जोर से क्यों चिल्ला रही थीं? कोई बुरा सपना देखा क्या?”


नेहा कुछ पल तक कुछ बोल ही नहीं पाई। अगले ही पल वह उठकर अमित से लिपट गई। उसकी आवाज़ काँप रही थी।


“मुझे माफ कर दो अमित… मैं तुम्हारे ऊपर बेवजह शक करती रहती हूँ… अभी मैंने सपना देखा कि तुम मुझे छोड़कर किसी और से शादी कर रहे हो… मैं बहुत डर गई थी…”


अमित ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा, उसकी पीठ थपथपाई और हल्की मुस्कान के साथ बोला—


“अरे पागल, मैं तुम्हें छोड़ दूँगा? इतना भी भरोसा नहीं है अपने पति पर?”


उसने नेहा का चेहरा अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में देखते हुए कहा—


“मैं तुम्हारा हूँ… और हमेशा तुम्हारा ही रहूँगा। सपनों को हकीकत मत बनाया करो।”


नेहा की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन इस बार उनमें डर नहीं, सुकून था।



सच्चाई...


अमित ने बिना कुछ कहे अपना फोन नेहा के सामने रख दिया।


स्क्रीन पर रिया का मैसेज खुला हुआ था —


“कल की प्रेज़ेंटेशन तैयार है, सुबह मीटिंग में दिखा देंगे।”


नेहा कुछ पल तक स्क्रीन को देखती रही।

हर शब्द साफ था… सादा… बिल्कुल पेशेवर।


कोई छुपी बात नहीं।

कोई धोखा नहीं।


सिर्फ ऑफिस का काम।


उसकी आँखें झुक गईं। उसे अपने किए पर गहरा अफसोस होने लगा।

उसे एहसास हुआ कि उसने अपने ही हाथों रिश्ते में शक की दीवार खड़ी कर दी थी।


धीरे-धीरे वो कमरे से बाहर निकली और कमला जी के पास जाकर चुपचाप खड़ी हो गई।


“माँजी…” उसकी आवाज़ भर्रा गई,

“मुझसे गलती हो गई। मैं… मैं बदलना चाहती हूँ।”


कमला जी ने उसकी ओर देखा।

पहली बार उनके चेहरे पर कठोरता नहीं थी।


उन्होंने आगे बढ़कर नेहा के सिर पर हाथ रख दिया।


“बहू,” उन्होंने नरम आवाज़ में कहा,

“घर भरोसे से चलता है, शक से नहीं।

शक ज़हर की तरह होता है… धीरे-धीरे पूरे रिश्ते को अंदर से खत्म कर देता है।”


नेहा की आँखों से आँसू बह निकले,

लेकिन इस बार उन आँसुओं में डर नहीं… समझ थी।


उस दिन से उसने ठान लिया —

अब वह अपने रिश्ते को शक से नहीं, भरोसे से सींचेगी।



धीरे-धीरे नेहा ने अपने व्यवहार पर ध्यान देना शुरू किया।

उसे एहसास हुआ कि हर छोटी बात पर शक करने से घर में सिर्फ दूरी बढ़ती है, इसलिए उसने खुद को बदलने का फैसला किया।


अब वह अमित से सवाल करने के बजाय उस पर भरोसा करने लगी। उसकी बातों को ध्यान से सुनती, समझने की कोशिश करती।


अमित ने भी नेहा के इस बदलाव को महसूस किया।

वह पहले से ज़्यादा समय घर पर देने लगा। ऑफिस से लौटकर सीधे फोन में उलझने के बजाय नेहा के साथ बैठकर बातें करता, उसके दिन के बारे में पूछता।


कमला जी भी ये सब देख रही थीं।

घर का माहौल पहले जैसा तनाव भरा नहीं रहा। नेहा अब काम भी मन लगाकर करती और बात भी सम्मान से करती। धीरे-धीरे कमला जी का मन भी पिघलने लगा।


एक दिन दोपहर को कमला जी ने प्यार से आवाज़ लगाई,

“नेहा… ज़रा इधर आना।”


नेहा थोड़ा घबराते हुए आई।


कमला जी हल्की मुस्कान के साथ बोलीं,

“आज खीर बना दो… तुम्हारे हाथ की खीर सच में बहुत अच्छी बनती है।”


नेहा की आँखों में चमक आ गई।

वो समझ गई कि ये सिर्फ खीर बनाने की बात नहीं है…

ये उसके स्वीकार किए जाने का संकेत था।


उसके होंठों पर एक सच्ची, सुकून भरी मुस्कान फैल गई।



सीख:


अगर नेहा समय रहते अपने शक को पहचान लेती, तो वो डरावना सपना देखने की नौबत ही नहीं आती। इसलिए रिश्तों को बचाना है तो दिल से जुड़ना होगा, दिमाग से शक नहीं करना होगा।


शक रिश्तों को धीरे-धीरे अंदर से खोखला कर देता है।


गलतियाँ हर इंसान से होती हैं, लेकिन उन्हें समझदारी और धैर्य से सुधारा जा सकता है।


प्यार से बड़ा कोई हथियार नहीं होता — यह टूटे दिलों को भी जोड़ देता है।


सास-बहू की तकरार से अधिक जरूरी है घर की शांति और आपसी सम्मान।


भरोसा ही शादी की असली नींव है; जिस रिश्ते में विश्वास मजबूत हो, वह हर परीक्षा में खरा उतरता है।





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