संस्कार का असली मतलब
रीमा की शादी को अभी आठ महीने ही हुए थे। उसका विवाह आदित्य से हुआ था। आदित्य एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। घर में सास लताजी, ससुर महेश जी और छोटा देवर करण रहते थे। परिवार छोटा था, पर नियम बहुत बड़े-बड़े थे।
रीमा पढ़ी-लिखी, समझदार और शांत स्वभाव की लड़की थी। मायके में उसने हमेशा खुला और प्यार भरा माहौल देखा था। लेकिन ससुराल में कदम रखते ही उसे समझ आ गया कि यहां हर काम एक नियम से होगा — और नियम बनाने वाली थीं लताजी।
सुबह चार बजे उठना, सिर पर पल्लू रखना, पहले सबको चाय देना, फिर नाश्ता बनाना — ये सब उसकी दिनचर्या बन चुका था। रीमा बिना शिकायत सब करती थी। उसे लगता था कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा।
पर लताजी को जैसे कोई न कोई कमी निकालने की आदत थी।
“रीमा, दाल में नमक थोड़ा कम है… तुम्हारी मां ने तुम्हें ठीक से खाना बनाना नहीं सिखाया क्या?”
“इतनी देर से क्यों उठी? हमारे घर की बहुएं सूरज निकलने से पहले उठ जाती हैं।”
हर बात में मायके और मां का जिक्र आता। रीमा चुप रह जाती। वह नहीं चाहती थी कि उसके कारण उसके माता-पिता का अपमान हो।
एक दिन रीमा की बचपन की सहेली ने उसे अपने घर बुलाया। वह पास ही रहती थी। रीमा ने सोचा, थोड़ी देर मिलकर आ जाएगी। उसने आदित्य को बताया और चली गई।
शाम को जब वह वापस लौटी तो घर का माहौल बदला हुआ था। आदित्य के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था।
“मां को बताए बिना चली गई? ये कोई तरीका है?” आदित्य ने ऊंची आवाज़ में कहा।
रीमा चौंक गई, “मैंने आपको बताया था…”
“मां से पूछना जरूरी था,” आदित्य ने बीच में ही रोक दिया।
रीमा चुपचाप घर के अंदर चली आई। अंदर आते ही लताजी शुरू हो गईं —
“बहू होकर इतनी आज़ादी? हमारे घर की इज्जत का जरा भी ख्याल नहीं है। कल को लोग कहेंगे बहू मनमानी करती है। यही संस्कार दिए हैं तुम्हारी मां ने?”
आज रीमा का धैर्य जवाब दे गया।
वह धीरे से बोली, “मम्मीजी, मेरी मां ने मुझे बड़ों की इज्जत करना सिखाया है, इसलिए मैं आज तक चुप रही। पर उन्होंने यह भी सिखाया है कि गलत बात पर आवाज़ उठाना जरूरी होता है।”
लताजी हैरान रह गईं। आदित्य भी चुप था।
रीमा आगे बोली, “अगर बहू के हर कदम पर रोक होगी, तो क्या वह इस घर को अपना घर समझ पाएगी? आपने हमेशा कहा कि संस्कार ज़रूरी हैं। पर संस्कार सिर्फ बहू के लिए ही क्यों? क्या बेटे को यह नहीं सिखाया जाना चाहिए कि पत्नी की बात भी सुनी जाए? कि उसका सम्मान किया जाए?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
महेश जी, जो अब तक चुप थे, पहली बार बोले, “रीमा गलत नहीं कह रही। घर सम्मान से चलता है, डर से नहीं।”
आदित्य ने पहली बार अपनी पत्नी की आंखों में आंसू देखे। उसे एहसास हुआ कि वह हमेशा मां की बात मानता रहा, पर कभी रीमा का पक्ष नहीं समझा।
उस रात घर में कोई झगड़ा नहीं हुआ। लेकिन बहुत कुछ बदल गया।
अगली सुबह लताजी ने रीमा को रसोई में बुलाया।
“बहू… अगर तुम्हें कहीं जाना हो, तो बता कर जाया करो। पर… हर बार पूछना जरूरी नहीं है। घर तुम्हारा भी है।”
रीमा की आंखों में हल्की मुस्कान आ गई। उसने पहली बार ससुराल को थोड़ा अपना महसूस किया।
धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। आदित्य अब हर बात में रीमा की राय लेने लगा। लताजी भी अब हर बात में मायके को बीच में नहीं लाती थीं।
रीमा ने सीखा — चुप रहना ही हमेशा संस्कार नहीं होता। सही समय पर सम्मानपूर्वक अपनी बात रखना भी संस्कार होता है।
और उस दिन से उस घर में एक नया नियम बन गया —
संस्कार सिर्फ बहू के लिए नहीं, पूरे परिवार के लिए होते हैं।

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