मीरा की खीर
मीरा की शादी राघव से हुई थी।
राघव शहर में नौकरी करता था और एक बड़े परिवार से था। घर में सास सावित्री देवी, ससुर हरिराम जी, बड़ी बहू रचना, छोटा देवर करण और ननद पूजा रहती थी।
शादी के बाद जब मीरा पहली बार ससुराल आई, तो सबने औपचारिक मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया।
पर बड़ी बहू रचना के चेहरे पर अपनापन कम और तिरस्कार ज्यादा था।
“आओ बहू…” सावित्री देवी ने कहा, लेकिन आवाज़ में गर्माहट नहीं थी।
मीरा ने चुपचाप सबके पैर छुए। मन में सोचा —
"मैं इस घर को अपना बनाकर रहूँगी।"
पहली रसोई...
अगली सुबह मीरा सबसे पहले उठ गई।
हल्की-सी ठंडक थी और आँगन में अभी सूरज की किरणें भी पूरी तरह नहीं उतरी थीं।
नहा-धोकर, साफ साड़ी पहनकर और बालों में हल्का सा तेल लगाकर वह धीरे-धीरे रसोई में चली गई।
आज उसकी पहली रसोई थी।
दिल थोड़ा घबराया हुआ था, पर चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।
उसने मन ही मन सोचा —
“मुझे वही बनाना चाहिए जो मुझे सबसे अच्छी तरह आता है… चावल की खीर। मीठे से ही तो नई शुरुआत होती है।”
उसने बड़े भगोने में ताज़ा दूध डाला और गैस पर चढ़ा दिया।
दूध हल्की-हल्की उबलने लगा तो उसने पहले से भिगोए हुए चावल उसमें डाल दिए।
लकड़ी के चम्मच से वह धीरे-धीरे खीर चलाती रही, ताकि दूध नीचे न लगे।
जब चावल पककर मुलायम होने लगे, तो उसने उसमें चीनी डाली।
फिर इलायची कूटकर डाली, कुछ केसर के धागे दूध में भिगोकर मिलाए।
ऊपर से काजू और बादाम के बारीक कटे टुकड़े डाल दिए।
धीरे-धीरे खीर गाढ़ी होने लगी।
उसकी मीठी खुशबू पूरे घर में फैल गई।
रसोई जैसे मिठास से भर उठी —
और मीरा के दिल में भी एक नई उम्मीद जाग गई।
मीरा ने प्यार से सबके सामने खीर की कटोरियाँ रखीं।
गरम-गरम खीर की खुशबू पूरे कमरे में फैल गई।
ससुर जी ने एक चम्मच खाया और मुस्कुराते हुए बोले—
“वाह बहू, बहुत स्वादिष्ट बनाई है तुमने।”
ननद पूजा भी खुश होकर बोली—
“भाभी, सच में बहुत अच्छी बनी है।”
लेकिन रचना ने बिना चखे ही अपनी कटोरी एक तरफ सरका दी।
उसके चेहरे पर नाराज़गी साफ दिखाई दे रही थी।
वह हल्की सी हँसी के साथ बोली—
“हमारे घर में इतनी मीठी चीज़ नहीं बनती। और वैसे भी, पढ़े-लिखे घर की बहू बस इतनी सी साधारण खीर ही बनाएगी क्या?”
रचना की बात सुनकर मीरा की आँखें भर आईं।
दिल को ठेस लगी, पर उसने कोई जवाब नहीं दिया।
वह चुपचाप खड़ी रही।
तभी राघव ने धीरे से उसका हाथ दबाया और प्यार से कहा—
“तुम बहुत अच्छा बनाती हो, मीरा। सच में।”
दिन बीतते गए।
मीरा रोज सबसे पहले उठती।
अभी अंधेरा ही होता, लेकिन वह चुपचाप उठकर नहा-धो लेती और रसोई में लग जाती।
वह पूरे मन से घर का काम करती।
उसे सबकी पसंद और आदतें याद रहती थीं।
ससुर जी के लिए बिना चीनी की चाय बनाती।
सास के लिए हल्का और कम मसाले वाला खाना तैयार करती।
करण के लिए गरम-गरम पराठे सेंकती।
वह बिना किसी शिकायत के सबकी सेवा करती रहती।
लेकिन रचना को यह सब अच्छा नहीं लगता था।
उसे लगता था कि मीरा जानबूझकर सबका दिल जीतने की कोशिश कर रही है।
वह मन ही मन जलती और सोचती —
“हर समय अच्छी बनने का नाटक करती रहती है।”
एक दिन घर में बड़ी खुशखबरी आई।
रचना माँ बनने वाली थी।
यह सुनते ही पूरे घर में जैसे खुशी की लहर दौड़ गई। ससुर जी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई, करण ने तुरंत मिठाई लाने की बात कही और पूजा खुशी से उछल पड़ी।
सावित्री देवी तो मानो फूली ही नहीं समा रही थीं। उनकी आँखों में चमक थी। वे बार-बार भगवान का धन्यवाद कर रही थीं—
“हे भगवान, मेरी गोद भर दी तूने।”
मीरा भी सचमुच खुश थी। वह तुरंत रचना के पास गई और उसे प्यार से गले लगाकर बोली—
“दीदी, अब आपको बिल्कुल चिंता करने की जरूरत नहीं है। आप बस आराम कीजिए। घर का सारा काम मैं संभाल लूँगी।”
रचना ने उसकी ओर देखा। उसके चेहरे पर हल्की-सी झिझक थी। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन चुप ही रही। बस धीमे से सिर हिला दिया।
मुश्किल समय...
एक दोपहर घर में सिर्फ मीरा और रचना थीं। घर में अजीब सी शांति थी। बाहर हल्की धूप फैली हुई थी और अंदर रचना अपने कमरे में आराम कर रही थी।
अचानक कमरे से तेज़ आवाज आई।
“मीरा…!”
मीरा घबराकर दौड़ती हुई अंदर गई। रचना पेट पकड़कर बैठी थी, चेहरा दर्द से तना हुआ, माथे पर पसीना।
“मीरा… बहुत दर्द हो रहा है… शायद समय आ गया है…”
मीरा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा, लेकिन उसने खुद को संभाला।
“दीदी, आप घबराइए मत। मैं हूँ ना।”
उसने तुरंत पानी लाकर रचना को दिया। फिर डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर ने कहा कि तुरंत अस्पताल लेकर आएँ।
मीरा ने चारों तरफ देखा, लेकिन घर में कोई गाड़ी नहीं थी। बाकी सब लोग बाहर गए हुए थे।
एक पल के लिए वह घबरा गई, लेकिन अगले ही पल उसने हिम्मत जुटाई।
वो दौड़कर घर के बाहर गई और सड़क पर खड़े होकर ऑटो रोकने लगी। कुछ ही देर में एक ऑटो रुका।
“भैया, जल्दी अस्पताल चलना है। बहुत जरूरी है।”
ऑटो वाले ने स्थिति समझी और तुरंत तैयार हो गया।
मीरा वापस अंदर भागी। उसने सावधानी से रचना को सहारा दिया। एक हाथ से उसे थामे, दूसरे हाथ से दरवाज़ा बंद किया और किसी तरह उसे ऑटो तक ले आई।
रास्ते भर रचना दर्द से कराहती रही और मीरा उसका हाथ थामे उसे हिम्मत देती रही।
“बस दीदी, थोड़ी ही देर और… हम पहुँचने वाले हैं…”
अस्पताल पहुँचते ही मीरा ने मदद के लिए आवाज़ लगाई। नर्सें तुरंत स्ट्रेचर लेकर आईं और रचना को अंदर ले गईं।
मीरा बाहर बेंच पर बैठ गई। हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने लगी। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
कुछ घंटों बाद डॉक्टर बाहर आए।
उनके चेहरे पर मुस्कान थी।
“बधाई हो, माँ और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं।”
ये सुनते ही मीरा की आँखों से राहत के आँसू बह निकले। उसका दिल भगवान का धन्यवाद कर रहा था।
आज उसने सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं निभाई थी, बल्कि एक रिश्ता भी सच्चे मन से निभाया था।
जब रचना को होश आया, उसने सबसे पहले मीरा को देखा।
धीरे से बोली —
“अगर आज तुम नहीं होती… तो पता नहीं क्या होता।
मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया। मुझे माफ़ कर दो।”
मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“दीदी, परिवार में माफी नहीं होती। बस प्यार होता है।”
सावित्री देवी भी रो पड़ीं।
“बहू, हमने तुम्हें समझने में देर कर दी।”
कुछ दिनों बाद नामकरण का दिन आया।
घर फूलों से सजा था।
दीवारों पर रंगीन झालरें।
सावित्री देवी ने कहा —
“मीरा, तेरी पहली रसोई में हमने गलती की थी।
आज फिर से तेरी पहली रसोई होगी।
और तू वही खीर बनाएगी।”
मीरा मुस्कुराई।
इस बार उसने और भी मन से खीर बनाई।
सबने खाया।
सबने तारीफ की।
ससुर जी बोले —
“आज से ये घर सच में पूरा हुआ है।”
रचना ने बच्चे को गोद में लेकर कहा —
“जब ये बड़ा होगा, मैं इसे बताऊँगी कि इसकी चाची की खीर सबसे स्वादिष्ट है।”
सब हँस पड़े।
अंतिम संदेश:
मीरा ने सीखा था —
लड़कर नहीं,
धैर्य और प्यार से
घर जीता जाता है।
और कभी-कभी
एक कटोरी खीर
रिश्तों की कड़वाहट भी मीठी कर देती है।

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