बारिश, पकौड़े और परिवार की सीख

 

Indian joint family enjoying fresh pakoras and masala tea during a rainy evening inside a cozy home


शर्मा परिवार में हमेशा रौनक रहती थी। घर में दादी, पापा, मम्मी, बड़ा बेटा अजय, बड़ी बहू राधा, छोटा बेटा विवेक और छोटी बहू नेहा रहते थे।


बरसात का मौसम शुरू हुआ तो घर में चाय-पकौड़ों की मांग बढ़ गई।


एक दिन शाम को तेज़ बारिश होने लगी। ठंडी हवा चल रही थी।


दादी बोलीं,

“अरे वाह! क्या मौसम हो गया है। नेहा बहू, ज़रा गरमा-गरम कुछ बना दे, चाय के साथ मज़ा आ जाएगा।”


नेहा ने जल्दी से फ्रिज खोला। उसे दो दिन पुराने ब्रेड पकोड़े दिख गए। उसने सोचा — “तेल बच जाएगा, मेहनत भी नहीं करनी पड़ेगी।” उसने उन्हें माइक्रोवेव में गरम किया और प्लेट में सजाकर ले आई।


सबने पहला कौर लिया।


पापा जी ने भौं सिकोड़ ली,

“अरे ये तो अंदर से ठंडे हैं और तेल की बदबू भी आ रही है!”


दादी बोलीं,

“नेहा, ये आज के नहीं लग रहे।”


नेहा घबरा गई,

“मांजी… वो… परसों के हैं। सोचा खराब न हों इसलिए गरम कर दिए।”


उधर राधा चुपचाप रसोई में गई। उसने बेसन घोला, प्याज़ काटी, हरी मिर्च डाली और ताज़े पकौड़े तल दिए। साथ में अदरक वाली चाय भी बना लाई।


दादी ने खुश होकर कहा,

“अरे राधा बहू, क्या बात है! ऐसे मौसम में ताज़ा पकौड़े ही अच्छे लगते हैं।”


नेहा को बुरा लगा। उसे लगा सब राधा की ही तारीफ करते हैं।



अगला दिन...


अगले दिन दोपहर में मोहल्ले की पड़ोसन मीना जी घबराई-सी शर्मा जी के घर पहुँचीं। उनके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।


उन्होंने आते ही कहा,

“अरे भाभी, बड़ी मुसीबत हो गई। अचानक मेरे घर मेहमान आ गए हैं और घर में बनाने को कुछ खास तैयार नहीं है। ज़रा मदद कर दीजिए, कुछ जल्दी बनाना है।”


घर में दादी और दोनों बहुएँ बैठी थीं।


नेहा तुरंत बोली,

“अरे आंटी, मेरे पास फ्रिज में फ्रोजन कटलेट रखे हैं और रेडीमेड नूडल्स भी हैं। बस दस मिनट में गरम हो जाएंगे, वही बना लेते हैं।”


राधा ने शांत स्वर में कहा,

“अगर आप कहें तो मैं ताज़ी सब्ज़ियों से वेज पुलाव बना देती हूँ। साथ में दही का रायता भी तैयार हो जाएगा। ज्यादा समय नहीं लगेगा।”


मीना जी ने राहत की साँस ली,

“ठीक है बेटा, तुम दोनों जो ठीक समझो बना लो। जल्दी हो जाए बस।”


नेहा ने जल्दी-जल्दी कटलेट तलकर और नूडल्स बनाकर प्लेट में सजा दिए।

उधर राधा ने ताज़ी सब्ज़ियाँ काटीं, मसालों की खुशबू के साथ पुलाव पकाया और ठंडा-सा स्वादिष्ट रायता भी तैयार कर दिया।


कुछ ही देर में सारा खाना मेहमानों के सामने परोस दिया गया।


मेहमानों ने पहले पुलाव चखा। एक मेहमान मुस्कुराते हुए बोले,

“वाह! पुलाव तो बहुत स्वादिष्ट बना है, मसालों की खुशबू भी कमाल है।”


दूसरे ने रायता खाते हुए कहा,

“सच में, घर जैसा ताज़ा स्वाद है।”


यह सुनकर राधा हल्का-सा मुस्कुरा दी।


अब एक मेहमान ने कटलेट उठाया। जैसे ही उसने एक कौर लिया, उसका चेहरा थोड़ा बदल गया।

वह धीरे से बोला,

“इसमें कुछ अजीब-सी गंध आ रही है… शायद तेल पुराना है या कटलेट ताज़े नहीं हैं।”


कमरे में अचानक सन्नाटा-सा छा गया।


नेहा का चेहरा उतर गया। उसे समझ आ गया था कि जल्दबाज़ी और शॉर्टकट की वजह से बात बिगड़ गई। वह चुपचाप खड़ी रह गई, मन ही मन पछताते हुए।



एक परेशानी...


शाम होते-होते विवेक को अचानक पेट में तेज़ दर्द होने लगा। वह पेट पकड़कर बैठ गया। घर वाले घबरा गए और तुरंत डॉक्टर को बुलाया।


डॉक्टर ने जांच करने के बाद गंभीर आवाज़ में कहा,

“लगता है बासी या ठीक से गरम न किया गया खाना खाया गया है। ऐसा खाना पेट खराब कर देता है और फूड पॉइज़निंग भी हो सकती है। आगे से सावधानी रखिए।”


डॉक्टर के जाने के बाद घर में सन्नाटा छा गया।


दादी ने प्यार से, लेकिन समझाते हुए कहा,

“नेहा बेटा, काम से बचने की आदत ठीक नहीं। खाना हो या रिश्ता — दोनों मेहनत और ताज़गी से ही अच्छे लगते हैं। बासी चीज़ें सेहत भी बिगाड़ती हैं और मन भी।”


नेहा की आँखों में आँसू भर आए। वह धीमी आवाज़ में बोली,

“मांजी, मुझसे सच में गलती हो गई। मैं जल्दी के चक्कर में सब आसान रास्ता चुन लेती थी। आगे से ऐसा नहीं करूंगी।”


राधा आगे बढ़ी, उसने नेहा का हाथ थाम लिया और मुस्कुराकर बोली,

“गलती हर किसी से होती है। हम दोनों मिलकर काम करेंगे। कल से साथ में ताज़ा और अच्छा खाना बनाएंगे।”


नेहा ने सिर हिलाया। उस दिन से उसने ठान लिया कि अब वह शॉर्टकट नहीं अपनाएगी, बल्कि पूरे मन से काम करेगी।



अगले दिन फिर बारिश हुई।


इस बार नेहा ने खुद कहा,

“आज मैं मसाला चाय और मूंग दाल के ताज़े पकौड़े बनाऊँगी।”


राधा मुस्कुरा दी।


जब सबने खाया तो दादी बोलीं,

“वाह नेहा! आज तो मज़ा आ गया।”


पापा जी ने कहा,

“देखा, मेहनत का स्वाद अलग ही होता है।”


नेहा खुश थी। उसे समझ आ गया था कि शॉर्टकट से काम तो हो जाता है, पर दिल नहीं जीत पाते।



कहानी की सीख:


बासी खाना सेहत को नुकसान पहुँचा सकता है।


कामचोरी रिश्तों में दूरी पैदा कर सकती है।


ताज़ी मेहनत, सच्ची नीयत और प्यार ही जीवन का असली स्वाद हैं।


क्योंकि सिर्फ खाना ही नहीं, रिश्तों को भी ताज़ा और सहेजकर रखना पड़ता है।





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