घर की धुरी

Indian family reunion scene showing husband and wife resolving differences at home

 


सुमित और कविता की शादी को दस साल हो चुके थे। उनका एक बेटा था – आरव। घर में सुमित के माता-पिता भी रहते थे। ऊपर से देखने पर सब कुछ ठीक लगता था, पर भीतर ही भीतर छोटी-छोटी बातों ने मन में दूरी बना दी थी।


एक दिन कविता बोली,

“सुनो जी, रसोई की चिमनी कई दिनों से खराब है। धुआँ पूरे घर में फैल जाता है। गैस का बटन भी ढीला हो गया है। कई बार कहा, पर आप सुनते ही नहीं।”


सुमित ने अख़बार मोड़ते हुए कहा,

“कविता, मैं सुबह से शाम तक ऑफिस में खटता हूँ। घर आते ही ये शिकायतें शुरू कर देती हो। थोड़ा चैन से बैठने दो।”


कविता चुप हो गई, पर उसके मन में दुख रह गया।



रोज़ की दिनचर्या...


सुमित सुबह 8 बजे उठता, नाश्ता करता और 9 बजे ऑफिस चला जाता। शाम 7 बजे लौटकर मोबाइल में लग जाता या दोस्तों से मिलने निकल जाता।


दूसरी ओर कविता सुबह 5 बजे उठती।

घर की सफाई, नाश्ता, आरव को स्कूल भेजना, सास-ससुर की दवाइयाँ, दोपहर का भोजन, कपड़े धोना, शाम की चाय, होमवर्क, रात का खाना… रात के 11 बज जाते, तब कहीं जाकर उसे बैठने का समय मिलता।


एक दिन सुमित ने गुस्से में कह दिया,

“तुम करती ही क्या हो सारा दिन? इतनी सी बात के लिए रोज़ टोकती रहती हो!”


यह सुनकर कविता का दिल टूट गया।

वह बोली,

“अगर मैं कुछ नहीं करती, तो तुम एक दिन अकेले सब संभालकर देख लो।”


बात बढ़ गई। गुस्से में कविता अपने मायके चली गई।



घर की सच्चाई...


पहले दिन तो सुमित को लगा कि अच्छा है, शांति रहेगी।

पर धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि घर चलाना आसान नहीं।


ऑफिस से लौटकर उसे खुद चाय बनानी पड़ती।

आरव का होमवर्क देखना पड़ता।

माँ की दवाइयों का समय याद रखना पड़ता।

कपड़े प्रेस कराने भेजना, दूध लाना, सब्ज़ी लेना…


थकान दोगुनी हो गई।


आखिर उसने एक कामवाली रखी – ₹4000 महीना।

खाना बनाने वाली – ₹5000 महीना।

माँ की देखभाल के लिए एक लड़का – ₹6000 महीना।


कुल खर्च लगभग ₹15000 महीना हो गया।


एक महीने में ही सुमित को समझ आ गया कि कविता का काम कितना बड़ा था, जिसका उसने कभी मूल्य ही नहीं समझा।



उधर कविता…


मायके में बैठकर रोने के बजाय कविता ने सिलाई का काम शुरू कर दिया।

वह सुंदर कुशन कवर और बैग बनाने लगी।

धीरे-धीरे उसका काम चल निकला। उसे अपने हुनर पर विश्वास हो गया।


पर मन के एक कोने में घर की याद थी।



दो महीने बाद सुमित ने फोन किया।


“कविता… माफ़ कर दो। मैंने तुम्हारी मेहनत को कभी समझा ही नहीं। तुम घर की नींव हो। तुम्हारे बिना घर खाली-खाली है। लौट आओ। इस बार हम मिलकर काम बाँटेंगे।”


कविता की आँखें नम हो गईं।

वह बोली, “अगर सच में साथ निभाना है, तो काम भी साथ बाँटना होगा।”


सुमित ने वादा किया।


कविता वापस आ गई।

अब सुमित हर रविवार को घर की सफाई में हाथ बँटाता।

आरव का होमवर्क वही देखता।

छोटी-मोटी मरम्मत तुरंत करवा देता।


घर में फिर से हँसी लौट आई।


सुमित को समझ आ गया कि

घर सिर्फ दीवारों से नहीं, बल्कि समझ और सहयोग से चलता है।


और कविता को यह विश्वास मिला कि

सम्मान से बड़ा कोई उपहार नहीं होता।


सीख:

घर की गाड़ी दो पहियों से चलती है।

अगर एक पहिया कमजोर पड़े, तो दूसरा संभाल ले – यही सच्चा साथ है। 




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