अपनी थाली का सुख

 

Indian joint family sharing a peaceful morning in a traditional courtyard with mother-in-law and daughters-in-law smiling together


सुबह का समय था।

आंगन में धूप की हल्की किरणें पड़ रही थीं।


राधा रसोई में चाय बना रही थी और उसकी जेठानी पूजा आटा गूंथ रही थी। तभी बाहर गली से तेज आवाजें आने लगीं।


“अरे छोड़ो मुझे… मैं अब और नहीं सहूंगी!”


राधा ने खिड़की से झांककर देखा और जोर से बोली,

“मम्मी जी! जरा बाहर आइए… देखिए सामने क्या हो रहा है!”


उसकी सास कमला देवी जल्दी से बाहर आईं। साथ में उनके पति गोपाल जी भी आ गए।


सामने वर्मा जी के घर के बाहर भीड़ लगी थी। उनकी दोनों बहुएं आपस में जोर-जोर से बहस कर रही थीं। वर्मा जी और उनकी पत्नी उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे थे।


कमला देवी ने सिर हिलाते हुए कहा,

“आजकल की बहुएं… जरा सी बात पर घर की इज्जत सड़क पर ले आती हैं।”


राधा चुप रही, लेकिन पूजा ने धीरे से मुस्कुरा कर उसे देखा।



घर की पुरानी आदत...


कमला देवी बुरी नहीं थीं, उनका मन साफ था।

लेकिन उनकी एक आदत थी — हर बात में पड़ोस का उदाहरण देना।


वो अक्सर कहतीं—


“देखो मिश्रा जी की बहू, रोज सुबह चार बजे उठ जाती है।”

“गुप्ता जी की बहू को देखो, हमेशा साड़ी में ही रहती है।”

“और वर्मा जी की बहुएं… कैसे मिल-जुलकर सारा काम करती हैं।”


राधा और पूजा दोनों पढ़ी-लिखी और समझदार थीं। आपस में उनकी बहुत अच्छी बनती थी। वे मिलकर घर का सारा काम हंसी-खुशी कर लेती थीं।

लेकिन रोज-रोज की तुलना उनके दिल को चुभने लगी थी। उन्हें लगता था कि उनकी कोशिशों की कोई कद्र ही नहीं है।


एक दिन कपड़े धोते समय पूजा ने धीरे से कहा,

“मम्मी जी, आजकल तो वॉशिंग मशीन है। जब मशीन से काम जल्दी और आसानी से हो सकता है, तो हाथ से धोने की क्या जरूरत है?”


कमला देवी तुरंत बोलीं,

“अरे शर्मा जी की बहू तो आज भी हाथ से ही कपड़े धोती है। मेहनत करने से ही घर में बरकत रहती है। मशीनों पर ज्यादा भरोसा ठीक नहीं।”


राधा ने नम्रता से कहा,

“मम्मी जी, मेहनत अपनी जगह है… लेकिन अगर घर में सुविधा है, तो उसका इस्तेमाल करना गलत तो नहीं है।”


बस, यही बात कमला देवी को खटक गई।

उन्हें लगा जैसे बहुएं उनकी बात काट रही हैं। उनका चेहरा सख्त हो गया और माहौल अचानक भारी हो उठा।



अचानक बदला माहौल...


लेकिन आज का दृश्य अलग था।


वर्मा जी के घर से तेज आवाजें आ रही थीं।

पूरी कॉलोनी में चर्चा फैल चुकी थी कि उनकी दोनों बहुएं अब अलग रहने की जिद पर अड़ गई हैं। वे अपने-अपने पतियों के साथ अलग घर लेना चाहती थीं।


यह सुनकर कमला देवी का मन खिन्न हो गया।

घर लौटते ही उन्होंने नाराज़ स्वर में कहा —


“कैसे संस्कार दिए हैं उनके मां-बाप ने! जिसने बेटे को पाल-पोस कर बड़ा किया, उसी मां-बाप को छोड़कर अलग रहने की बात कर रही हैं। आजकल की बहुओं को जरा भी शर्म नहीं रही।”


घर में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।


राधा ने धीरे से अवसर देखकर शांत स्वर में कहा —


“मम्मी जी… आप तो हमेशा कहती थीं कि पड़ोस की बहुओं से सीखो। तो क्या अब ये भी सीखना चाहिए?”


पूजा ने भी हल्की मुस्कान के साथ बात आगे बढ़ाई —


“अगर उनकी हर बात अच्छी थी, तो ये फैसला भी सही ही होगा… है ना?”


गोपाल जी अपनी हंसी रोक न सके।

दोनों बेटे भी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।


कमला देवी पहले तो कुछ पल चुप रहीं।

उनके चेहरे का गुस्सा धीरे-धीरे सोच में बदल गया।


फिर उन्होंने धीमे स्वर में कहा —


“नहीं… ये सीखने वाली बात नहीं है।”


राधा ने आगे बढ़कर प्यार से उनका हाथ थाम लिया और बोली —


“मम्मी जी, हर घर की अपनी परिस्थिति होती है। जो बाहर से अच्छा या आदर्श दिखता है, जरूरी नहीं कि अंदर से भी वैसा ही हो। हमें अपने घर की खुशियों पर ध्यान देना चाहिए, न कि दूसरों की नकल करने पर।”


कमला देवी की आंखों में पहली बार एक अलग सी समझ झलक रही थी।

उन्हें महसूस हुआ कि तुलना से सिर्फ दूरी बढ़ती है, अपनापन नहीं।


उस दिन घर में बहस नहीं हुई…

बल्कि एक सीख ने जन्म लिया। 



सच की समझ...


उस दिन के बाद कमला देवी के व्यवहार में सचमुच बदलाव दिखने लगा।


उन्होंने पहली बार खुलकर कहा —


“मेरी बहुएँ जैसी हैं, मुझे मंज़ूर हैं। हर घर की अपनी थाली होती है। दूर से दूसरे की थाली में घी ज़्यादा दिखता है, लेकिन असली स्वाद तो अपनी थाली का ही होता है।”


यह सुनकर पूजा की आँखों में संतोष और खुशी झलक उठी।

राधा ने मुस्कुराते हुए उनके सामने चाय का कप रख दिया।


कमला देवी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा —


“अब अगर किसी से कुछ सीखना है, तो बस यही कि अपने घर को कैसे खुश रखा जाए।”


आँगन में हल्की-हल्की हवा बह रही थी।

तुलसी के पत्ते भी जैसे धीरे-धीरे हिलकर मुस्कुरा रहे थे।


उस दिन घर में पहली बार सचमुच सुकून और अपनापन महसूस हो रहा था। 


सीख:


दूसरों से तुलना करने से कभी सच्चा सुख नहीं मिलता।


हर घर की अपनी परिस्थितियाँ होती हैं, अपनी खुशियाँ होती हैं और अपनी परेशानियाँ भी। बाहर से जो दिखता है, वह हमेशा पूरा सच नहीं होता।


इसलिए अपनी थाली में जो मिला है, उसी में संतोष करना सीख लिया जाए — तो वही घर स्वर्ग जैसा बन जाता है। 




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.