दो घरों के बीच

 

Working Indian woman balancing office responsibilities and family expectations in a warm home kitchen scene


सुबह का समय था।


रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी लगातार गूंज रही थी और आँगन में तुलसी के पास सुनहरी धूप फैल चुकी थी। घर में दिन की भागदौड़ शुरू हो चुकी थी।


आरती एक हाथ से बेटे की पानी की बोतल भर रही थी और दूसरे हाथ से उसका टिफिन बंद कर रही थी। खुद भी उसे ऑफिस के लिए तैयार होना था। घड़ी की सुइयाँ जैसे आज कुछ ज्यादा ही तेज़ चल रही थीं।


तभी अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।


आरती ने जल्दी से हाथ पोंछे और दरवाज़ा खोला। सामने उसकी ननद पूजा खड़ी थी — हाथ में बैग, चेहरे पर चमकती मुस्कान।


“सरप्राइज़!” पूजा ने उत्साह से कहा और बिना जवाब का इंतज़ार किए अंदर आ गई।


आरती हल्का सा मुस्कुराई, “अरे दीदी, बता देतीं तो मैं लेने आ जाती।”


पूजा हँसते हुए बोली, “अरे, अपने ही घर आने में कैसी सूचना?”


इतने में सास सावित्री जी भी कमरे से बाहर आ गईं। बेटी को सामने देखकर उनका चेहरा खिल उठा।


“अरे मेरी बिटिया आ गई! चलो, अब तो घर में रौनक हो जाएगी।”


माँ-बेटी एक-दूसरे से लिपट गईं।


आरती ने घड़ी की ओर देखा — उसे सच में देर हो रही थी। उसने जल्दी-जल्दी सबके लिए नाश्ता लगाया, बेटे का बैग संभाला और जाते-जाते बोली,


“दीदी, आप आराम कीजिए, मैं ऑफिस से आकर बात करती हूँ।”


इतना कहकर वह जल्दी से बाहर निकल गई, जबकि घर के अंदर एक नई हलचल की शुरुआत हो चुकी थी।



शुरू हुई अनकही खींचतान...


शाम को जब आरती ऑफिस से लौटी तो उसका चेहरा थकान से भरा हुआ था। दिन भर की भागदौड़ के बाद जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसकी नज़र सामने के दृश्य पर पड़ी — पूजा आराम से सोफे पर बैठी टीवी देख रही थी और सावित्री जी रसोई में कुछ काम कर रही थीं।


आरती ने चुपचाप अपना बैग एक तरफ रखा और दुपट्टा ठीक करते हुए अंदर आ गई।


तभी रसोई से सास की आवाज़ आई —

“आरती, ज़रा चाय बना दे।”


आरती ने एक पल को आँखें बंद कीं। शरीर थक चुका था, लेकिन बिना कुछ कहे वह सीधे रसोई की ओर बढ़ गई। उसने गैस जलाई, पानी चढ़ाया और चाय बनाने लगी।


ड्रॉइंग रूम से पूजा की धीमी आवाज़ आई —

“भाभी, आप ऑफिस से इतनी देर में आती हो… फिर घर के काम का क्या होता है?”


आरती ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया —

“जितना हो पाता है, कर लेती हूँ दीदी। बाकी धीरे-धीरे संभाल लेती हूँ।”


पूजा ने रिमोट टेबल पर रखते हुए कहा —

“हमारे समय में तो भाभियाँ घर से बाहर काम नहीं करती थीं। पहले घर संभालती थीं, फिर बाकी कुछ सोचती थीं।”


आरती के हाथ चाय छानते हुए पल भर को रुक गए।

उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन खुद को रोक लिया।


वह ट्रे में चाय के कप सजाकर बाहर ले आई। चेहरे पर वही शांति थी, पर दिल में कई अनकहे शब्द चुपचाप दबे रह गए।



धीरे-धीरे बढ़ता दबाव...


अगले दिन सुबह चाय पीते समय पूजा ने मुस्कुराते हुए कहा,

“भाभी, मैं इतने दिनों बाद आई हूँ… आप दो-चार दिन की छुट्टी ले लो ना। साथ बैठेंगे, बातें करेंगे, थोड़ा घूम भी आएँगे।”


आरती ने धीमे और संयमित स्वर में जवाब दिया,

“दीदी, सच कहूँ तो इस समय ऑफिस में बहुत जरूरी प्रोजेक्ट चल रहा है। मेरी जिम्मेदारी है वहाँ रहना। अभी छुट्टी लेना मेरे लिए मुश्किल है।”


यह सुनते ही पूजा का चेहरा उतर गया। उसने हल्का सा मुंह बना लिया, जैसे उसकी बात को महत्व ही न दिया गया हो।


तभी सावित्री जी ने बात आगे बढ़ाई,

“इतना भी क्या काम है कि अपनी ननद के लिए दो दिन नहीं निकाल सकती? रिश्ते भी कोई चीज़ होते हैं।”


ये शब्द सुनकर आरती के दिल को गहरी ठेस लगी।

वह कुछ पल चुप रही। उसके मन में कई बातें उमड़ने लगीं।


वो रोज सुबह सबसे पहले उठती थी। सबके लिए नाश्ता और खाना बनाती, बच्चे को तैयार करती, खुद ऑफिस जाती। दिनभर काम के बाद थकी हुई लौटती, फिर घर के बाकी काम संभालती। किसी से शिकायत नहीं करती थी।


लेकिन आज उसे लगा कि उसके प्रयास जैसे किसी को दिखाई ही नहीं देते।

मानो उसकी मेहनत की कोई कीमत ही न हो।



पति की चुप्पी...


रात काफी हो चुकी थी।

घर के बाकी लोग अपने-अपने कमरों में जा चुके थे। कमरे की हल्की पीली रोशनी में आरती चुपचाप अलमारी के पास खड़ी कपड़े समेट रही थी, लेकिन उसके हाथों की रफ्तार बता रही थी कि उसके मन में बहुत कुछ चल रहा है।


अमित मोबाइल पर कुछ देख रहा था। तभी आरती ने धीमी लेकिन भारी आवाज़ में कहा —


“तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?”


अमित ने नज़र उठाई, “किस बारे में?”


आरती उसके सामने आकर खड़ी हो गई।


“हर बार जब मम्मी और दीदी मुझे सुनाती हैं… तब तुम चुप क्यों रहते हो? एक बार भी नहीं कहते कि मैं भी इस घर की जिम्मेदारी निभा रही हूँ।”


अमित ने हल्की सांस ली, फिर बोला —


“मैं बीच में क्या बोलूँ, आरती? अगर कुछ कह दूँ तो मम्मी और दीदी को बुरा लग जाएगा। घर में और तनाव हो जाएगा।”


आरती की आँखें भर आईं। उसकी आवाज़ काँप गई —


“और मुझे जो बुरा लगता है… उसका क्या?

मैं भी इंसान हूँ, अमित। मुझे भी दुख होता है।

दिनभर ऑफिस संभालती हूँ, घर आकर सबका ख्याल रखती हूँ… फिर भी गलत मैं ही ठहराई जाती हूँ। और तुम… तुम बस चुप रह जाते हो।”


अमित के पास कोई जवाब नहीं था।


कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।

घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही थी।


आरती धीरे से बोली —


“कभी सोचा है, तुम्हारी ये चुप्पी मुझे कितना अकेला कर देती है?”


अमित सिर झुकाकर बैठा रहा।

उसकी चुप्पी ही उस रात का सबसे भारी जवाब थी।



एक दिन सच सामने आ ही गया...


तीसरे दिन पूजा ने फिर ताना मार ही दिया।


“भाभी, आपको तो अपने ऑफिस से ही फुर्सत नहीं मिलती। रिश्तों के लिए समय ही नहीं है आपके पास।”


इस बार आरती ने चुप रहने के बजाय गहरी साँस ली। उसकी आवाज़ ऊँची नहीं थी, लेकिन शब्दों में आत्मविश्वास साफ झलक रहा था।


“दीदी, रिश्ते सिर्फ छुट्टी लेने से नहीं निभते।


मैं रोज सुबह सबसे पहले उठती हूँ, घर का काम करती हूँ, आपकी पसंद का खाना बनाती हूँ, बच्चे को संभालती हूँ, मम्मी जी का ध्यान रखती हूँ… फिर ऑफिस जाती हूँ। शाम को लौटकर भी घर की जिम्मेदारियाँ निभाती हूँ।


अगर मैं नौकरी करती हूँ तो क्या इससे मेरा इस घर पर हक कम हो जाता है? क्या मैं इस घर की सदस्य नहीं रही?”


कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। पूजा और सावित्री जी दोनों उसे देखती रह गईं।


आरती ने धीरे लेकिन साफ शब्दों में आगे कहा—


“आप जब चाहें मायके आ सकती हैं, यह आपका पूरा अधिकार है। यह घर आपका भी है।

लेकिन मुझे भी अपने काम और जिम्मेदारियों का अधिकार है।


ऑफिस जाना मेरी मजबूरी नहीं, मेरी जिम्मेदारी है।

और जिम्मेदारियाँ निभाना रिश्तों की कद्र न करने के बराबर नहीं होता।


रिश्ते समझ से चलते हैं, सिर्फ मौजूद रहने से नहीं।”


उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, बस सच था।



पहली बार पति ने साथ दिया...


अमित धीरे-धीरे आगे बढ़ा। इस बार उसकी आवाज़ में हिचक नहीं थी, बल्कि साफ़ दृढ़ता थी।


“दीदी, आरती बिल्कुल सही कह रही है। वो सुबह से रात तक घर भी संभालती है और ऑफिस की ज़िम्मेदारियाँ भी निभाती है। हमने कभी ये सोचा ही नहीं कि उस पर कितना दबाव रहता होगा। हमें उसका साथ देना चाहिए, न कि उससे हर बार और उम्मीदें लगानी चाहिए।”


कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।


सावित्री जी चुप रह गईं। शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि बात सिर्फ अधिकार की नहीं, समझ और सम्मान की भी है।


पूजा के चेहरे का भाव भी बदल गया। उसे पहली बार लगा कि शायद वो सच में आरती से ज़्यादा उम्मीद कर रही थी।


बदलाव की शुरुआत...


अगले दिन सुबह का माहौल पहले जैसा तनावभरा नहीं था।

रसोई में आरती हमेशा की तरह नाश्ता बना रही थी। तभी पूजा धीरे-धीरे अंदर आई।


कुछ पल चुप रहने के बाद उसने हल्की आवाज़ में कहा,

“भाभी… आज चाय मैं बना दूँ?”


आरती ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में पहली बार ताने नहीं, अपनापन था।


वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली,

“क्यों नहीं दीदी… रसोई तो हम दोनों की है।”


पूजा ने गैस जलाई, पानी रखा और बोली,

“भाभी, शायद मैं आपकी परेशानी समझ नहीं पाई। मैं जब भी आती थी, बस ये सोचती थी कि मायका मेरा है… पर ये नहीं सोचा कि अब ये घर आपका भी उतना ही है।”


आरती ने शांत स्वर में कहा,

“दीदी, आपका आना मुझे कभी बुरा नहीं लगा। बस उम्मीदें थोड़ी ज़्यादा हो जाती थीं… और मैं हर बार सब कुछ अकेले संभालने की कोशिश करती रहती थी।”


इतने में सावित्री जी भी रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं।

उन्होंने दोनों को साथ काम करते देखा तो उनके चेहरे पर सुकून आ गया।


धीरे-धीरे घर का माहौल सच में बदलने लगा।

अब पूजा जब मायके आती, तो आराम के साथ-साथ हाथ भी बँटाती।

आरती भी ऑफिस से लौटकर बिना बोझ के बातें कर पाती।


सावित्री जी ने मन ही मन स्वीकार किया कि समय सचमुच बदल चुका है।

आज की बहू सिर्फ घर की जिम्मेदारी नहीं निभाती, बल्कि बाहर की दुनिया में भी कंधे से कंधा मिलाकर चलती है।


उन्हें समझ आ गया था कि

घर तभी खुशहाल रहता है,

जब उसमें अधिकार से ज्यादा समझ और सम्मान हो।



कहानी की सीख:


रिश्ते अधिकार जताने से नहीं,

एक-दूसरे को समझने से मजबूत होते हैं।


मायका बेटी का अपना घर होता है,

लेकिन वही घर बहू का भी संसार बन जाता है।


जब दोनों एक-दूसरे की भावनाओं और परिस्थितियों को समझ लें,

तो घर में तकरार नहीं,

सिर्फ अपनापन और सम्मान बसता है।




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