छूटा हुआ पर्स और बचा हुआ भरोसा
सुबह के ठीक साढ़े सात बजे थे।
रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी गूँज रही थी
और ड्रॉइंग रूम में स्कूल बैग खुला पड़ा था।
नेहा एक हाथ से चाय छान रही थी
और दूसरे हाथ से अपनी बेटी अन्वी की चोटी बाँधने की कोशिश कर रही थी।
“मम्मा… आज पीटी है, जूते सफ़ेद होने चाहिए!”
अन्वी ने आईने में खुद को देखते हुए याद दिलाया।
“अरे बाबा, कल ही तो धोए थे!”
नेहा मुस्कुराई,
लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान थकी हुई थी।
पिछले तीन महीने से
उसका हर दिन ऐसे ही भागदौड़ में कट रहा था।
पति—आदित्य—नौकरी बदलने की कोशिश में था।
पुरानी नौकरी जा चुकी थी,
नई अभी मिली नहीं थी।
ऊपर से सास—शारदा जी—
हर बात में एक ही ताना—
“हमारे ज़माने में तो आदमी घर बैठा नहीं करता था।”
नेहा चुप रहती।
क्योंकि जवाब देने से
हालात नहीं बदलते।
दरवाज़े की घंटी बजी।
“आ गई… कुसुम आंटी।”
नेहा ने राहत की साँस ली।
कुसुम आंटी—
पिछले आठ साल से इस घर में झाड़ू-पोंछा करती थीं।
कम बोलने वाली,
लेकिन आँखों में गज़ब की सच्चाई।
“बहू जी, आज ज़रा देर हो गई।
बस से उतरते-उतरते पैर फिसल गया था।”
उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
“अरे! आपको लगी तो नहीं?”
नेहा तुरंत चिंतित हो गई।
“नहीं-नहीं… भगवान की दया है।”
कुसुम आंटी ने झाड़ू उठाई।
दिन किसी तरह बीत गया।
शाम को जब नेहा बाज़ार से लौटी,
तो उसे लगा—
कुछ कमी है।
उसका पर्स…
बैग में नहीं था।
दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
उस पर्स में—
महीने का आख़िरी पैसा
एटीएम कार्ड
आधार की कॉपी
सब कुछ था।
“कहीं बाज़ार में गिर गया?”
या…
“ऑटो में रह गया?”
आँखों के सामने अँधेरा सा छा गया।
आदित्य घर लौटा,
नेहा की हालत देख समझ गया।
शारदा जी ने तुरंत फ़ैसला सुनाया—
“आज कुसुम आई थी न?
बस… वही ले गई होगी।
इन गरीबों का भरोसा मत किया करो।”
नेहा का दिल बैठ गया।
“मम्मी जी…
ऐसे कैसे कह सकती हैं आप?”
उसकी आवाज़ काँप गई।
“तो और कौन ले जाएगा?
घर में बाहर का आदमी कौन है?”
शारदा जी अड़ी रहीं।
आदित्य चुप था।
वह किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले
सच जानना चाहता था।
अगले दिन सुबह—
दरवाज़े पर फिर घंटी बजी।
नेहा ने दरवाज़ा खोला
तो सामने कुसुम आंटी खड़ी थीं।
हाथ में वही भूरा पर्स।
“बहू जी…
कल पोंछा लगाते समय
सोफ़े के नीचे पड़ा मिला।
मैंने खोला नहीं।
बस भगवान को याद करके रख लिया था।”
नेहा की आँखों से आँसू बह निकले।
“आंटी…
आप जानती हैं,
हमने आपके बारे में क्या सोच लिया था?”
उसने भर्राई आवाज़ में कहा।
कुसुम आंटी बस इतना बोलीं—
“बेटी…
सोचना तो हर कोई जानता है,
लेकिन भरोसा
बहुत कम लोग निभा पाते हैं।”
पीछे खड़ी शारदा जी
कुछ बोल नहीं पाईं।
उस दिन पहली बार
उनकी आँखें झुकी हुई थीं।
आदित्य ने पर्स लिया,
और कुसुम आंटी के हाथ में
पाँच हज़ार रुपये रख दिए।
“यह इनाम नहीं है,
यह सम्मान है।”
कुसुम आंटी ने पैसे नहीं देखे।
बस सिर झुकाया
और बोलीं—
“इंसान बने रहिए बेटा।
यही सबसे बड़ी कमाई है।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
नेहा देर तक
खाली दीवार को देखती रही।
उसे लगा—
कभी-कभी
जो सबसे ग़रीब दिखता है,
वही सबसे अमीर होता है।
ईमानदारी में।
और इंसानियत में।

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