अधूरा घर

Emotional Indian family portrait in a traditional village home courtyard at sunset, showing elderly parents with their pregnant daughter and son-in-law sharing a warm moment.


छोटे से गांव में रमेश चौधरी का एक साधारण सा घर था। घर बड़ा नहीं था, लेकिन उसमें अपनापन बहुत था। पत्नी सावित्री, बेटा निखिल और बेटी कृतिका — यही उनका संसार था।


कृतिका घर की जान थी। उसकी हँसी से आँगन गूंजता रहता। पढ़ाई में होशियार और स्वभाव से सरल।


समय बीतता गया और कृतिका की शादी तय हो गई। लड़का अच्छा था, परिवार भी सुलझा हुआ। रमेश जी ने अपनी सामर्थ्य से बढ़कर बेटी की शादी की तैयारी की।


शादी धूमधाम से हुई। लेकिन जैसे ही विदाई का समय आया, रमेश जी की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।


“बेटी, खुश रहना,” बस इतना ही कह पाए।


कृतिका चली गई।


और उसी दिन से घर जैसे अधूरा हो गया।



कुछ महीने धीरे-धीरे यूँ ही बीत गए।

इसी बीच निखिल की नौकरी दूसरे शहर में लग गई। घर में खुशखबरी तो थी, पर उसके साथ एक और विदाई भी जुड़ी थी। तैयारी हुई, सामान बाँधा गया, और एक सुबह वह भी चला गया।


उस दिन के बाद घर सच में बदल गया।


अब उस बड़े से घर में केवल रमेश जी और सावित्री जी ही रह गए थे। जिन कमरों में कभी बच्चों की आवाजें गूंजती थीं, वहाँ अब सन्नाटा ठहर गया था। दीवारें जैसे हर कदम की आहट सुनने को तरसती थीं।


एक शाम सावित्री जी रसोई से बाहर आईं। बरामदे में बैठकर उन्होंने धीरे से कहा—

“लगता है… अब घर बहुत बड़ा हो गया है।”


रमेश जी ने उनकी ओर देखा, पर कुछ बोले नहीं।

असल में घर बड़ा नहीं हुआ था, बस खाली हो गया था।


शामें अब पहले जैसी नहीं रहीं।

पहले चाय के साथ हँसी, शिकायतें और दिनभर की बातें होती थीं।

अब वही चाय दो कपों में चुपचाप ठंडी हो जाती।


दोनों बरामदे में बैठते जरूर थे, पर शब्द कम और खामोशी ज्यादा साथ बैठती थी।

कभी-कभी दूर गली में खेलते बच्चों की आवाज आती, तो दोनों अनायास ही एक-दूसरे की तरफ देख लेते — जैसे किसी पुराने समय की याद अचानक दरवाजे पर दस्तक दे गई हो।


घर वही था, लोग वही थे…

पर जीवन की रौनक जैसे कहीं और चली गई थी।



एक दिन दोपहर के समय अचानक कृतिका का फोन आया। उस समय रमेश जी बरामदे में बैठे अख़बार पढ़ रहे थे। फोन की घंटी बजते ही उन्होंने तुरंत कॉल उठा ली।


“हेलो पापा!” उधर से कृतिका की चहकती आवाज सुनाई दी।


रमेश जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“खुश रहो बेटा। कैसी हो? सब ठीक है न?”


“हाँ पापा, सब बिल्कुल ठीक है। दरअसल आपको एक खुशखबरी देनी थी। मैं और आदित्य अगले महीने आपके पास आ रहे हैं।”


“अरे वाह!” रमेश जी उत्साह से बोले, “यह तो बहुत अच्छी बात है। कितने दिन के लिए आ रहे हो?”


उधर कुछ क्षण के लिए खामोशी छा गई। कृतिका जैसे शब्द तलाश रही हो।


“पापा…” उसने धीमे स्वर में कहा, “अगर आप अनुमति दें तो… हम हमेशा के लिए आना चाहते हैं।”


रमेश जी एक पल को चौंक गए। उनके हाथ में पकड़ा अख़बार धीरे से नीचे खिसक गया।

“हमेशा के लिए? बेटी, सब ठीक तो है न? कोई परेशानी तो नहीं?”


कृतिका ने तुरंत समझाते हुए कहा,

“नहीं पापा, ऐसी कोई बात नहीं है। आदित्य की नौकरी का ट्रांसफर हमारे शहर में हो गया है। हमने सोचा… अगर आप और मम्मी चाहें तो हम आपके साथ ही रहें। इतने बड़े घर में आप दोनों अकेले रहते हैं, तो क्यों न हम सब साथ रहें?”


रमेश जी की आवाज भर्रा गई।

“बेटी, यह घर तो तुम्हारा ही है… पूछने की क्या जरूरत थी?”


कृतिका हँस पड़ी,

“फिर भी पापा, आपकी अनुमति जरूरी है।”


फोन रखते ही रमेश जी कुछ देर तक चुप बैठे रहे। उनकी आँखों में नमी थी, पर चेहरे पर संतोष की रेखाएँ साफ झलक रही थीं।


जब उन्होंने यह बात सावित्री जी को बताई, तो उनकी आँखों में खुशी की चमक उतर आई।

“सच कह रहे हैं आप? हमारी बिटिया वापस आ रही है?”


उस पल घर की खामोशी जैसे खुद-ब-खुद टूट गई थी। 



एक महीने बाद कृतिका और आदित्य आ गए।


घर में फिर से रौनक लौट आई। सुबह रसोई से हँसी की आवाज आने लगी। शाम को चारों साथ बैठकर खाना खाते।


आदित्य बहुत समझदार था। वह रमेश जी से हर काम में सलाह लेता।


धीरे-धीरे घर का खालीपन भरने लगा।


लेकिन समाज को यह रास नहीं आया।


पड़ोसी कहने लगे,

“आजकल के लड़के तो ससुराल में रहना पसंद नहीं करते।”


कुछ रिश्तेदार ताने मारते —

“दामाद घरजमाई बन गया क्या?”


रमेश जी को यह बातें चुभतीं।



एक शाम रमेश जी बरामदे में चुपचाप बैठे थे। पड़ोसियों की कुछ बातें उनके कानों में गूँज रही थीं। मन में हल्की-सी चिंता घर कर गई थी।


उन्होंने आदित्य को पास बुलाया।


“बेटा, एक बात कहूँ… बुरा तो नहीं मानोगे?”


आदित्य तुरंत पास आकर बैठ गया।

“अरे पापा, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? कहिए न।”


रमेश जी ने धीमे स्वर में कहा,

“अगर तुम्हें यहाँ रहते कभी असहज महसूस हो… अगर लोगों की बातें तुम्हें चुभती हों… तो तुम चाहो तो अलग घर ले सकते हो। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हें कुछ सहना पड़े।”


आदित्य कुछ पल उन्हें देखता रहा। फिर हल्के से मुस्कुराया।


“पापा, लोग तो कुछ न कुछ कहते ही रहेंगे। लेकिन मैं यह जानता हूँ कि घर ईंट-पत्थर की दीवारों से नहीं बनता… घर तो अपनों के साथ से बनता है। यहाँ मुझे सम्मान भी मिलता है, अपनापन भी और आपका आशीर्वाद भी। मैं यहाँ रहकर खुद को छोटा नहीं, बल्कि बहुत भाग्यशाली समझता हूँ।”


यह सुनते ही रमेश जी की आँखें नम हो गईं। उन्होंने आदित्य के कंधे पर हाथ रख दिया।


तभी अंदर से कृतिका भी आ गई। उसने दोनों की बातें सुन ली थीं।


वह मुस्कुराकर बोली,

“पापा, आपने हमें हमेशा सिखाया है कि परिवार साथ रहने से मजबूत होता है। मुश्किलें आएँ तो भागना नहीं, मिलकर सामना करना चाहिए। आज हम वही सीख निभा रहे हैं।”


रमेश जी ने दोनों को सीने से लगा लिया। उस पल उन्हें लगा, उन्होंने सिर्फ बेटी ही नहीं, एक सच्चा बेटा भी पाया है।



कुछ ही महीनों बाद सावित्री जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। पहले तो सबने सोचा सामान्य कमजोरी होगी, लेकिन जाँच के बाद डॉक्टर ने कुछ दिनों तक नियमित इलाज और अस्पताल के चक्कर लगाने की सलाह दी।


घर का माहौल एकदम बदल गया। जहाँ पहले हँसी गूंजती थी, वहाँ अब चिंता की खामोशी फैल गई।


सुबह-सुबह आदित्य उन्हें अस्पताल ले जाता। दवाइयों की पर्ची संभालता, डॉक्टर से विस्तार से बात करता, समय पर दवा देता। रात को भी कई बार उठकर देखता कि उन्हें कोई असुविधा तो नहीं हो रही।


रमेश जी चुपचाप यह सब देखते रहते। उनके मन में एक अजीब-सी कृतज्ञता भरती जा रही थी।


निखिल भी छुट्टी लेकर आया था, लेकिन उसकी नौकरी दूसरे शहर में थी। ज्यादा दिन रुक पाना उसके लिए संभव नहीं था। वह भी चिंतित था, पर परिस्थितियाँ उसे बाँधे हुए थीं।


एक रात अस्पताल से लौटते समय, बरामदे में हल्की-सी रोशनी जल रही थी। सावित्री जी सो चुकी थीं। आदित्य दवाइयों का डिब्बा व्यवस्थित कर रहा था।


रमेश जी धीरे से उसके पास आकर बैठ गए।


कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर भारी आवाज में रमेश जी बोले—


“बेटा… भगवान ने मुझे सिर्फ बेटा नहीं दिया… बेटा और दामाद दोनों दिए हैं। मैं सच में बहुत भाग्यशाली हूँ।”


आदित्य ने तुरंत उनका हाथ थाम लिया। उसकी आँखें भी नम थीं।


“पापा, मैं दामाद नहीं हूँ… आपका बेटा हूँ। और बेटा अपने माता-पिता के लिए जो करता है, वही कर रहा हूँ।”


रमेश जी की आँखों से आँसू ढलक पड़े। उन्होंने आदित्य के कंधे पर हाथ रख दिया।


उस क्षण रिश्तों की परिभाषा बदल गई थी।

वह अब औपचारिक संबंध नहीं रहा था — वह सच्चा, अपनापन भरा परिवार बन चुका था।



धीरे-धीरे सावित्री जी ठीक हो गईं।


घर अब पहले जैसा नहीं था — उससे बेहतर था।


कुछ महीनों बाद निखिल भी वापस उसी शहर में ट्रांसफर लेकर आ गया।


अब घर में फिर से बच्चों की खिलखिलाहट गूंजने लगी — क्योंकि कृतिका माँ बनने वाली थी।


रमेश जी बरामदे में बैठे मुस्कुरा रहे थे।


उन्होंने धीरे से कहा,

“घर कभी अधूरा नहीं था… बस हमें समझने में समय लगा कि परिवार साथ हो तो हर खालीपन भर जाता है।”



संदेश:

परिवार का अर्थ सिर्फ परंपरा निभाना नहीं है।

परिवार वह है जहाँ हर सदस्य एक-दूसरे के लिए खड़ा रहे।


कभी-कभी समाज कुछ भी कहे, लेकिन अगर दिल साफ हो और नीयत सच्ची हो —

तो हर अधूरा घर पूरा हो जाता है।




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