सात साल की खामोशी, एक दिन में खत्म

 

Emotional Indian family reunion in hospital during Bhai Dooj festival, sister applying tilak to her brother while parents watch with tears of joy


सुबह की हल्की धूप आँगन में फैल रही थी। तुलसी के पास दिया अभी भी जल रहा था। रसोई में चाय की खुशबू घुल रही थी।


“बहू सुनो…” सासू माँ ने कमरे से आवाज़ दी।


“जी माँ जी…”


“कल तेरे देवर-देवरानी आ रहे हैं। और हाँ, तेरी छोटी ननद भी बच्चों के साथ आएगी। भैया दूज है न… कुछ अच्छा सा बना लेना। और जो भी भिगोना हो, आज ही भिगो देना।”


“जी माँ जी…”


काम खत्म करके मीरा अपने कमरे में आई और बिस्तर पर लेट गई। लेकिन नींद उसकी आँखों से बहुत दूर थी। छत को देखते-देखते उसका मन सात साल पीछे चला गया।


सात साल… इतने लंबे समय में उसने अपने मायके का दरवाज़ा नहीं देखा था।


ना माँ…

ना बाबा…

ना छोटा भाई रोहन…


रोहन तब बारह साल का था। हर शाम स्कूल से आते ही उसकी बातें शुरू हो जाती थीं — “दीदी आज क्या हुआ पता है?” और मीरा उसकी हर बात बड़े ध्यान से सुनती थी।


लेकिन जब मीरा ने अपनी पसंद से शादी करने का फैसला किया, सब बदल गया।


आरव… एक साधारण परिवार का, पढ़ा-लिखा, समझदार लड़का। एक निजी कॉलेज में लेक्चरर था। मीरा उससे प्यार करती थी। पर जाति अलग थी। समाज का डर बड़ा था।


माँ-बाबा ने साफ कह दिया था —

“अगर आरव को चुना, तो हमें छोड़ना पड़ेगा।”


मीरा ने बहुत रोकर समझाया, पर कोई नहीं माना। आख़िरकार उसने आरव का हाथ थाम लिया।


शादी के बाद आरव के माता-पिता ने उसे बेटी से बढ़कर प्यार दिया। कभी किसी बात की कमी नहीं होने दी। लेकिन मायके की कमी… वो दिल के किसी कोने में हमेशा चुभती रही।


इन सात सालों में न कभी माँ का फोन आया, न बाबा की कोई खबर। रोहन ने भी शायद बहन से दूरी बना ली थी।


मीरा अक्सर सोचती —

क्या रोहन को कोई राखी बाँधता होगा?

क्या भैया दूज पर कोई उसके माथे पर टीका करता होगा?


वह इन्हीं सोचों में खोई थी कि अचानक उसका फोन बजा। अनजान नंबर था।


“हेलो?”


उधर से घबराई हुई आवाज़ आई —

“दीदी… मैं रोहन बोल रहा हूँ…”


मीरा का दिल धड़क उठा।

“रोहन…?”


“दीदी… माँ को हार्ट अटैक आया है। सिटी हॉस्पिटल में हैं। वो आपको याद कर रही हैं। बार-बार आपका नाम ले रही हैं… प्लीज दीदी आ जाओ…”


मीरा के हाथ काँपने लगे।


रोहन रोते हुए बोला,

“दीदी… बाबा को सब पता चल गया है। उन्हें पता है कि मेरी पढ़ाई के लिए जो पैसे आते थे, वो आरव जीजू भेजते थे। हर महीने चुपचाप… ताकि घर का खर्च चलता रहे। बाबा बहुत पछता रहे हैं। माँ भी रोती रहती हैं। कहती हैं पता नहीं हमारी बेटी हमें माफ़ करेगी या नहीं…”


मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे याद आया — आरव हर महीने चुपचाप कुछ पैसे ट्रांसफर करता था। जब मीरा पूछती, तो बस मुस्कुरा देता।


“परिवार कभी टूटना नहीं चाहिए,” वह कहता था।


मीरा समझ नहीं पा रही थी क्या करे। तभी पीछे से सासू माँ की आवाज़ आई।


“बेटा, क्या हुआ?”


मीरा मुड़ी। सासू माँ उसके पास खड़ी थीं। उन्होंने सब सुन लिया था।


उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखा।

“जा बेटा… देर मत कर। देव (ड्राइवर) को मैंने बोल दिया है, गाड़ी निकाल रहा है। मैं यहाँ सब संभाल लूँगी।”


“माँ जी… कल मेहमान…”


“अरे, मेहमान तो आते-जाते रहेंगे। माँ-बाप बार-बार नहीं मिलते। और सुन… रोना बंद कर। तेरी माँ को कुछ नहीं होगा। अभी तो मुझे उनसे मिलना है। समधन से ठीक से झगड़ा भी तो करना है कि उन्होंने मेरी बेटी को सात साल दूर रखा!” उन्होंने हल्की मुस्कान के साथ कहा।


मीरा हल्का सा हँस पड़ी, आँसुओं के बीच।


सासू माँ ने अलमारी से एक छोटा डिब्बा निकाला।


“ये देख… हर साल तूने जो भैया दूज का टीका संभाल कर रखा था ना… और ये बादाम, ये रोली… सब ले जा। आज अपने भाई के माथे पर खुद टीका लगाना। परमात्मा ने मौका दिया है, शिकायतें खत्म करने का।”


मीरा ने सासू माँ के पैर छुए।

“धन्यवाद माँ जी…”


“धन्यवाद नहीं बेटा… माँ हूँ तेरी।”


कुछ ही देर में मीरा अस्पताल पहुँची। आईसीयू के बाहर बाबा बैठे थे। बाल पहले से ज्यादा सफेद हो चुके थे। आँखें सूजी हुई थीं।


मीरा को देखते ही वे खड़े हो गए। दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।


फिर बाबा की आवाज़ काँपी —

“मीरा… बेटी… माफ़ कर दे…”


बस इतना सुनते ही मीरा उनके गले लग गई।

“बाबा… आप ऐसा क्यों कह रहे हैं…”


रोहन पास खड़ा रो रहा था।

“दीदी…” वह भागकर मीरा से लिपट गया।


डॉक्टर ने बताया — अब खतरा टल चुका है।


मीरा धीरे से माँ के पास गई। माँ ने आँखें खोलीं। मीरा को सामने देखकर उनकी आँखों में चमक आ गई।


“मीरा… तू आ गई…”


“हाँ माँ… अब कहीं नहीं जाऊँगी बिना मिले।”


माँ के हाथ काँप रहे थे। मीरा ने उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया।


कुछ देर बाद मीरा ने अपने बैग से रोली और चावल निकाले। अस्पताल के कमरे में ही उसने रोहन के माथे पर टीका लगाया।


“भैया दूज मुबारक हो…” उसकी आवाज़ भर्रा गई।


रोहन ने भी आँसू पोंछते हुए कहा,

“दीदी, अब कभी दूर मत जाना।”


तभी दरवाज़े पर सासू माँ की आवाज़ आई —

“अरे, हमें भी तो अंदर आने दो! देखना है मेरी समधन कैसी हैं!”


सबकी नज़र दरवाज़े की ओर गई। सासू माँ मुस्कुराती हुई अंदर आईं।


उन्होंने मीरा की माँ का हाथ पकड़ा और बोलीं —

“अब ये हमारी भी बेटी है। इसे फिर कभी अकेला मत छोड़िएगा।”


कमरे में हल्की सी हँसी फैल गई।


सात साल की दूरी कुछ ही पलों में पिघल गई।


उस दिन मीरा ने समझा —

प्यार कभी हारता नहीं।

समय लगता है, पर रिश्ते लौट आते हैं…

बस दिल का दरवाज़ा खुला होना चाहिए।




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