अधिकार की असली वारिस
सुबह का शांत समय था।
आँगन में तुलसी के पास धूप की हल्की किरणें उतर रही थीं। ठंडी हवा के साथ रसोई से मसालों की सुगंध फैल रही थी, और बर्तनों की खनखनाहट पूरे घर में गूंज रही थी।
रसोई में नंदिनी खड़ी थी — इस घर की बड़ी बहू।
माथे पर पसीने की बूंदें थीं, एक हाथ में बेलन और मन में अनगिनत सवाल। वह चुपचाप रोटियाँ बेल रही थी, जैसे अपने मन की बात भी आटे में ही दबा रही हो।
बरामदे में ताई जी पड़ोसन से धीमी आवाज़ में कह रही थीं —
“अरे देखो तो, बड़ी बहू सुबह से काम में लगी है… और छोटी बहू अभी तक सो रही है। फिर भी सास का सारा दुलार उसी पर बरसता है।”
ये शब्द नंदिनी के कानों तक साफ पहुँचे।
उसके हाथ एक पल के लिए रुक गए, मगर उसने तुरंत खुद को संभाल लिया। उसने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी — ऐसी बातें अब उसके लिए नई नहीं रहीं।
तीन साल पहले वह इस घर में दुल्हन बनकर आई थी।
साधारण परिवार की, पढ़ी-लिखी और संस्कारी। उसने पूरे मन से इस घर को अपनाने की कोशिश की थी।
एक साल बाद उसके देवर की शादी हुई और छोटी बहू रिद्धि इस घर में आई।
रिद्धि बड़े और अमीर परिवार से थी। नाज़ुक स्वभाव, सलीकेदार पहनावा, लेकिन काम-काज में उतनी रुचि नहीं। घर में उसके आने के बाद जैसे माहौल ही बदल गया था।
घर की मुखिया, सरोज देवी — सख्त स्वभाव की लेकिन गहरी समझ वाली महिला — सब पर अपनी नजर रखती थीं। बाहर से उनका व्यक्तित्व कठोर लगता, पर भीतर वे बहुत दूर की सोचने वाली थीं।
उनका अपना छोटा-सा कारोबार था — घर पर बनने वाले पापड़ और मसालों का, जिसका नाम था “स्वाद गृह उद्योग”।
यह व्यवसाय उन्होंने अपनी मेहनत से खड़ा किया था और उसे लेकर वे बेहद सजग रहती थीं।
नंदिनी अक्सर सोचती —
क्या वह इस घर में सिर्फ जिम्मेदारियों के लिए है?
और क्या रिद्धि सिर्फ लाड़-प्यार के लिए?
मगर वह हर सवाल को अपने मन में ही दबा लेती।
क्योंकि उसे सिखाया गया था —
“घर को जोड़ना है, तो पहले खुद को संभालना सीखो।”
और शायद… यही उसकी असली परीक्षा की शुरुआत थी।
भेदभाव की शुरुआत...
सरोज देवी का व्यवहार अक्सर नंदिनी को उलझन में डाल देता था।
वह प्यार से रिद्धि से कहतीं —
“बेटी, धूप में मत निकलना, रंग खराब हो जाएगा। तुम अंदर ही आराम करो।”
और उसी पल उनका स्वर बदल जाता।
वे नंदिनी की तरफ देखकर कहतीं —
“नंदिनी, जरा बाजार होकर आओ। सब्ज़ी भी ले आना और सप्लायर से पिछले हफ्ते का हिसाब भी पूछ लेना। देर मत करना।”
नंदिनी चुपचाप “जी माँ जी” कह देती, लेकिन उसके दिल में हल्की-सी चुभन उठती।
क्या वह इस घर की बहू नहीं थी?
क्या उसे धूप नहीं लगती?
क्या उसे थकान महसूस नहीं होती?
उसके मन में कई सवाल उमड़ते, मगर होंठ खामोश रहते।
रात को जब वह अपने कमरे में जाती, तो अमित उसे समझाता —
“नंदिनी… माँ का स्वभाव थोड़ा सख्त है। वह ऐसे ही बोलती हैं। तुम हर बात दिल पर मत लिया करो।”
नंदिनी हल्की-सी मुस्कान दे देती, लेकिन सच्चाई यह थी कि कुछ शब्द बाहर से जितने साधारण लगते हैं, भीतर उतनी ही गहरी चोट कर जाते हैं।
दिल समझाने से कहाँ मानता है?
दर्द तो फिर भी होता ही था।
त्योहार का दिन...
करवा चौथ का त्योहार आ गया था।
पूरे घर में रौनक थी। आँगन में रंगोली बन रही थी, दीवारों पर झालरें लग चुकी थीं और रसोई से मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।
शाम को सरोज देवी ने सबको हॉल में बुलाया। उनके हाथ में एक छोटा-सा मखमली डिब्बा था।
उन्होंने मुस्कुराते हुए वह डिब्बा रिद्धि को दिया।
“यह तुम्हारे लिए, बेटी।”
रिद्धि ने जैसे ही डिब्बा खोला, उसमें चमकता हुआ सोने का सुंदर कंगन था। उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं।
“धन्यवाद मम्मी जी! यह तो बहुत प्यारा है।”
पास ही खड़ी नंदिनी सब देख रही थी। उसके मन में हल्की-सी उम्मीद जगी — शायद उसके लिए भी कुछ हो। वह कुछ नहीं चाहती थी, बस एक अपनापन… एक छोटा-सा तोहफा।
तभी सरोज देवी ने अलमारी से एक मोटी फाइल निकाली और नंदिनी की ओर बढ़ा दी।
“यह पिछले साल का पूरा हिसाब है। इसमें गड़बड़ी है। दो दिन में सब ठीक करके देना।”
नंदिनी के हाथ एक पल को रुक गए।
एक को गहना… और दूसरी को काम?
उसने चुपचाप फाइल थाम ली। आँखें भर आईं, पर उसने सिर झुका लिया ताकि कोई उसकी नमी न देख सके।
वह अपने कमरे में गई। दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर बैठ गई। आँसू खुद-ब-खुद बह निकले। उसे दुख गहने का नहीं था, बल्कि उस फर्क का था जो हर बार साफ दिखाई देता था।
कुछ देर बाद उसने खुद को संभाला। आईने में अपने आँसू पोंछते हुए बोली —
“अगर जिम्मेदारी दी है, तो निभाऊँगी। मैं भागने वालों में से नहीं हूँ।”
उसने फाइल खोली और ध्यान से एक-एक पन्ना देखने लगी। देर रात तक वह हिसाब जोड़ती रही। जितना गहराई से देखती गई, उतनी ही बड़ी गड़बड़ी सामने आती गई। गोदाम से निकलने वाले माल और रजिस्टर में दर्ज माल में फर्क था। साफ था कि कहीं न कहीं चोरी हो रही थी।
दो दिन की मेहनत के बाद उसने पूरा हिसाब ठीक कर लिया और सबूतों के साथ रिपोर्ट तैयार की।
वह सास के पास गई और शांत स्वर में बोली —
“माँ जी, गड़बड़ी मिल गई है। गोदाम से माल कम निकल रहा है। शायद अंदर ही कोई चोरी कर रहा है।”
सरोज देवी ने फाइल ली, चश्मा लगाकर कुछ पन्ने देखे और बिना किसी भाव के बोलीं —
“ठीक है, रख दो।”
बस इतना ही।
न कोई शाबाशी, न धन्यवाद, न एक शब्द तारीफ का।
नंदिनी ने एक क्षण के लिए उनकी ओर देखा, फिर चुपचाप मुड़ गई। उसके मन में फिर वही खालीपन उतर आया —
शायद इस घर में उसकी मेहनत की आवाज़ अब भी किसी को सुनाई नहीं देती थी।
अचानक आई मुश्किल...
कुछ महीनों बाद सरोज देवी बीमार पड़ गईं।
डॉक्टर ने सख्त आराम की सलाह दी।
उधर कारोबार में समस्या शुरू हो गई।
मजदूर पैसे माँग रहे थे।
सप्लायर माल रोक रहे थे।
अमित और उसका भाई अपनी नौकरी में व्यस्त थे।
रिद्धि घबरा रही थी —
“अब क्या होगा? मैं तो यह सब नहीं संभाल सकती।”
सबकी नजर नंदिनी पर गई।
नंदिनी के मन में एक पल को ख्याल आया —
“जब मुझे कभी अपना नहीं माना, तो मैं क्यों संभालूँ?”
लेकिन फिर उसे लगा —
“यह घर मेरा भी है।”
वह सीधी फैक्ट्री पहुँची।
मजदूरों से बात की।
चोरी करने वाले कर्मचारी को पकड़वाया।
सप्लायर से समय माँगा।
खुद खड़े होकर पैकिंग करवाई।
दिन-रात मेहनत की।
धीरे-धीरे कारोबार संभलने लगा।
सच का खुलासा...
एक महीने बाद सरोज देवी घर लौटीं।
सबको हॉल में बुलाया।
उन्होंने कहा —
“आज मैं एक फैसला सुनाऊँगी।”
सब चौंक गए।
सरोज देवी ने गहरी सांस ली और सबकी ओर देखते हुए कहा —
“घर की ज़मीन और जो भी बचत है, वह मैं छोटी बहू रिद्धि के नाम करती हूँ।”
यह सुनते ही रिद्धि के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई देने लगी।
उसे लगा जैसे उसका भविष्य सुरक्षित हो गया हो।
नंदिनी चुपचाप खड़ी रही। उसके चेहरे पर न शिकायत थी, न उम्मीद — बस शांति।
कुछ पल रुककर सरोज देवी ने फिर कहा —
“और मेरा ‘स्वाद गृह उद्योग’… उसका पूरा अधिकार, उसकी जिम्मेदारी और मालिकाना हक मैं अपनी बड़ी बहू नंदिनी को देती हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
नंदिनी के होंठ काँप गए।
“माँ जी… मैं?” उसने धीमे से पूछा।
सरोज देवी ने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।
उनकी आवाज़ अब पहले जैसी सख्त नहीं, बल्कि नरम थी।
“हाँ, तुम। मैंने तुम्हें हमेशा कठिन काम दिए। कभी हिसाब, कभी बाज़ार, कभी मजदूरों से बात। तुमने सोचा होगा कि मैं तुमसे नाराज़ हूँ। लेकिन सच यह है कि मैं तुम्हें परख रही थी। अगर तुम्हें आराम देती, तो तुम मजबूत नहीं बनती। मुझे अपने कारोबार के लिए किसी भरोसेमंद वारिस की जरूरत थी… और वह तुम हो।”
नंदिनी की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मुझे लगा आप मुझसे नफरत करती हैं…”
सरोज देवी हल्के से मुस्कुराईं।
“नफरत नहीं, विश्वास था। रिद्धि को मैंने सुरक्षा दी है — घर और पैसा। लेकिन तुम्हें मैंने जिम्मेदारी दी है। क्योंकि तुम उसे संभाल सकती हो, बढ़ा सकती हो।”
रिद्धि भी आगे बढ़ी और नंदिनी का हाथ पकड़ लिया।
“दीदी, सच में… मैं यह सब नहीं कर पाती। आपने जिस तरह सब संभाला, वह मेरे बस की बात नहीं थी। यह हक आपका ही है।”
अमित गर्व से अपनी पत्नी को देख रहा था।
उसकी आँखों में सम्मान था — आज पहली बार नंदिनी को उसका असली स्थान मिला था।
कमरे का माहौल बदल चुका था।
आज किसी को कुछ खोने का दुख नहीं था —
क्योंकि हर किसी को उसकी क्षमता के अनुसार उसका हक मिला था।
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।
नंदिनी अब सिर्फ बड़ी बहू नहीं थी — वह व्यवसाय की मालिक थी।
रिद्धि भी धीरे-धीरे काम सीखने लगी।
सरोज देवी संतोष से सब देखतीं और कहतीं —
“हर इंसान का अपना गुण होता है। किसी को संभालना आता है, किसी को सजाना। घर तभी चलता है जब दोनों साथ हों।”
नंदिनी को समझ आ गया —
कभी-कभी जो भेदभाव दिखता है, वह असल में तैयारी होती है।
सोने को चमकने से पहले आग में तपना ही पड़ता है।
और उस दिन से नंदिनी ने ठान लिया —
वह अपनी बहू के साथ कभी भेदभाव नहीं करेगी,
लेकिन उसे मजबूत जरूर बनाएगी।
सीख:
सच्चा अधिकार वही पाता है जो जिम्मेदारी निभाना जानता है।
प्यार कभी-कभी कठोर रूप में भी मिलता है — पर उसका मकसद गिराना नहीं, उठाना होता है।

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