समझ का सफर
सुबह की हल्की ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी। रसोई में चाय उबलने की आवाज़ और टोस्ट सिकने की खुशबू फैल रही थी।
घर में आज खास रौनक थी — क्योंकि शादी के बाद पहली बार ननद रिद्धिमा तीन दिन के लिए मायके आई थी। वरना वह हमेशा दो-तीन घंटे रुककर ही चली जाती थी।
उसकी भाभी कविता ने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी। वह चाहती थी कि इस बार रिद्धिमा को कोई कमी महसूस न हो।
घर में सास लता जी, पति निखिल, देवर रोहन और कविता की सात साल की बेटी परी रहती थी।
रिद्धिमा सुबह देर तक सोती रही। तभी रोहन कमरे में झांककर बोला —
“दीदी, इस बार तो आप तीन दिन के लिए आई हो, तो कहीं घूमने का प्लान बनाते हैं ना! पूरा दिन बाहर मस्ती करेंगे।”
रिद्धिमा ने करवट बदलते हुए कहा —
“आज नहीं रोहन, आज तो मैं बस आराम करूंगी। ससुराल में आराम कहाँ मिलता है।”
रोहन हँसते हुए बोला — “क्या बात है दीदी! शादी के बाद तो आप बदल ही गई हो।”
रिद्धिमा हल्की मुस्कान के साथ चुप हो गई।
दरवाजे के पास खड़ी कविता सब सुन रही थी। वह बिना कुछ बोले रसोई में चली गई।
कविता की दिनचर्या...
कविता एक बैंक में नौकरी करती थी।
उसका दिन सुबह पाँच बजे से शुरू हो जाता था। सबसे पहले वह रसोई में जाकर सबके लिए नाश्ता और टिफिन तैयार करती। फिर बेटी को स्कूल के लिए तैयार करती, सास-ससुर के लिए चाय बनाती, और उसके बाद खुद जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस के लिए निकलती।
शाम को जब वह ऑफिस से लौटती, तो उसे आराम का समय नहीं मिलता था। घर पहुँचते ही फिर रसोई का काम, बेटी का होमवर्क, घर की सफाई और रात का खाना बनाने में लग जाती।
घर में कोई उसकी खास मदद नहीं करता था। सबको यही लगता था कि बैंक में बैठकर काम करना आसान होता है, इसलिए वह थकती नहीं होगी।
इसी वजह से जब भी परिवार में कहीं घूमने का प्लान बनता, कविता अक्सर मना कर देती। उसे पता था कि बाहर से लौटने के बाद सब लोग सोफे पर बैठकर आराम करेंगे, लेकिन उसे अकेले ही रसोई में लगना पड़ेगा। इसलिए उसके लिए घूमना खुशी से ज्यादा थकान बन गया था।
पुरानी याद – पहली फैमिली ट्रिप...
कुछ साल पहले सबने मिलकर नैनीताल जाने का प्लान बनाया था।
कविता बहुत खुश थी। शादी के बाद यह उसका पहला घूमने जाने का मौका था।
लेकिन लता जी ने कहा — “बहू, रास्ते के लिए पूड़ी-सब्जी, पराठे, अचार सब बनाकर पैक कर लेना। बाहर का खाना ठीक नहीं।”
सुबह चार बजे कविता उठी।
खाना बनाया।
सबको जगाया।
सब तैयार हुए और निकल गए।
दिनभर सबने खूब एंजॉय किया।
शाम को लौटते समय कविता ने धीरे से कहा — “मम्मी जी, आज खाना बाहर ही खा लें? सब थक गए हैं।”
लता जी तुरंत बोलीं — “नहीं बहू, घर का खाना ही अच्छा होता है।”
घर पहुँचते ही सब आराम करने लगे।
और कविता अकेली रसोई में लग गई।
उस दिन उसे पहली बार समझ आया —
उसके लिए घूमना मतलब दुगना काम।
उसके बाद उसने हर ट्रिप से बचना शुरू कर दिया।
वर्तमान...
अब रिद्धिमा भी शादी के बाद नौकरी करने लगी थी। दिनभर ऑफिस का काम और घर की ज़िम्मेदारियाँ निभाते-निभाते वह अक्सर थक जाती थी।
उस रात वह अपनी माँ लता जी के साथ कमरे में बैठी थी। हल्की रोशनी में दोनों आराम से बातें कर रही थीं। तभी लता जी ने प्यार से पूछा—
“रिद्धिमा, रोहन कह रहा था कि तू भी अब कहीं घूमने जाने से मना कर देती है। क्या बात है बेटा?”
रिद्धिमा ने गहरी साँस ली। उसके चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी।
“मम्मी, सच बताऊँ तो मन तो मेरा भी करता है घूमने का। लेकिन जब भी कहीं जाना होता है, पहले घर का सारा काम निपटाकर जाओ। सुबह जल्दी उठो, सबके लिए नाश्ता और टिफिन बनाओ। फिर दिनभर घूमो और वापस आकर भी रसोई में लग जाओ। इतना थक जाती हूँ कि घूमने की खुशी ही खत्म हो जाती है।”
लता जी थोड़ा हैरान होकर बोलीं—
“अरे, तेरी सास मदद नहीं करती क्या? इतना सारा काम तू अकेली कैसे करती है?”
इतने में कविता पानी का जग रखने कमरे में आई। उसने माँ-बेटी की सारी बातें सुन लीं। बिना कुछ कहे वह चुपचाप बाहर चली गई।
उसके दिल में एक टीस सी उठी।
वह सोचने लगी—
“मेरे साथ भी तो यही होता था… लेकिन मेरे लिए कभी किसी ने ऐसा क्यों नहीं सोचा?”
उसकी आँखों में हल्की नमी थी, पर होंठों पर वही शांत मुस्कान।
नया प्लान – इस बार अलग अंदाज़...
अगले दिन सुबह चाय पीते समय रोहन ने उत्साह से कहा —
“क्यों न इस बार हम लोग जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान घूमने चलें? मौसम भी अच्छा है और सब साथ रहेंगे तो मज़ा भी आएगा।”
लता जी ने तुरंत हामी भर दी —
“ठीक है, कल सुबह पाँच बजे निकलेंगे। बहू, तुम रास्ते के लिए टिफिन तैयार कर देना। बाहर का खाना मुझे पसंद नहीं है।”
कविता कुछ कहती, उससे पहले ही रिद्धिमा ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा —
“नहीं मम्मी… इस बार कोई टिफिन नहीं बनेगा।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। सबकी नज़रें रिद्धिमा पर टिक गईं।
वह धीरे से आगे बोली —
“भाभी भी हमारे साथ चलेंगी। और हम सब खाना बाहर ही खाएँगे। जब से मैं खुद बहू बनी हूँ, तब समझ में आया है कि हर बार घूमने से पहले और बाद में कितना काम करना पड़ता है। सुबह तीन-चार बजे उठकर खाना बनाना, फिर दिनभर घूमना, और रात को लौटकर फिर रसोई में लग जाना… बहुत थकाने वाला होता है।”
उसकी आवाज़ में शिकायत नहीं थी, बस सच्चाई थी।
निखिल ने पहली बार खुलकर कहा —
“सच में मम्मी, हमने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं। हम लोग तो बस घूमने का मज़ा देखते रहे, लेकिन कविता की मेहनत समझ ही नहीं पाया।”
लता जी कुछ क्षण चुप रहीं। उनके चेहरे पर सोच की रेखाएँ साफ दिख रही थीं। शायद पहली बार उन्हें एहसास हो रहा था कि बात सिर्फ टिफिन की नहीं, समझ की थी।
अगले दिन सब साथ निकले।
इस बार सुबह किसी ने कविता को चार बजे नहीं जगाया।
रास्ते में सबने नाश्ता होटल में किया।
दोपहर में बाहर खाना खाया।
शाम को लौटते समय भी बाहर ही डिनर कर लिया।
घर पहुँचकर सबने मिलकर हल्की-फुल्की सफाई की।
उस रात कविता पहली बार थकी नहीं थी —
बल्कि खुश थी।
रिद्धिमा उसके पास आकर बोली —
“भाभी, माफ करना… मुझे पहले समझ नहीं था।”
कविता मुस्कुराई — “समझ देर से आए तो भी अच्छा है।”
सीख:
कई बार हम वही गलती दोहराते हैं
जो हमारे साथ होती है।
लेकिन जब समझ आ जाती है —
तो घर बदलने में देर नहीं लगती।
उस दिन के बाद इस घर में एक नियम बन गया —
घूमने जाएंगे तो काम सब मिलकर करेंगे।
और कविता ने भी तय किया —
अब वो खुद को पीछे नहीं रखेगी।
संदेश:
किसी भी घर में खुशियाँ तभी रहती हैं
जब जिम्मेदारियाँ भी बराबर बाँटी जाएँ।

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