जब जरूरतों की आवाज़ रिश्तों से ऊँची हो गई
सुबह के पाँच बजे थे।
रसोई में चूल्हा जल चुका था,
और दूध उबलते-उबलते बाहर आने ही वाला था।
सरला देवी जल्दी-जल्दी दूध उतारते हुए सोच रही थीं—
आज फिर महीने का हिसाब बैठाना है।
पेंशन कम है,
महंगाई ज़्यादा।
इसी बीच कमरे से बेटी की आवाज़ आई—
“माँ… आज कॉलेज जाना है,
प्लीज़ पाँच हज़ार रुपये दे दो।”
सरला देवी का हाथ वहीं रुक गया।
“बेटा… अभी तो इस महीने तुम्हें दो हज़ार दिए थे।”
तभी अख़बार पढ़ रहे श्यामलाल जी ने चश्मा उतारते हुए पूछा—
“क्या हुआ?”
नेहा कमरे से बाहर आई।
ब्रांडेड कपड़े,
मोबाइल हाथ में,
और चेहरे पर नाराज़गी।
“पापा आपको क्या पता आजकल कैसे जीते हैं लोग।
मेरी सारी दोस्त कार में कॉलेज जाती हैं,
और मैं बस में धक्के खाऊँ?”
श्यामलाल जी ने गहरी साँस ली।
साठ की उम्र में छोटी-सी नौकरी,
ऊपर से दिल की दवाइयाँ।
“बेटा…
हमने तुम्हारी पढ़ाई में कभी कमी नहीं की,
लेकिन हर चाहत पूरी करना… हमारे बस में नहीं।”
नेहा का स्वर तेज़ हो गया—
“तो साफ़ कह दीजिए कि आपके लिए मेरे सपने बोझ हैं।”
सरला देवी ने बीच में कहा—
“बेटी… शब्द सोच-समझकर बोला कर।”
लेकिन नेहा को सुनना कहाँ था।
“आप लोग बस बचत, बचत, बचत…
कभी सोचा है मैंने क्या खोया है?”
श्यामलाल जी चुप रहे।
उनकी खामोशी में सालों की थकान थी।
आख़िरकार उन्होंने अलमारी खोली।
“ले लो… पाँच हज़ार।
लेकिन याद रखना—
पैसा कमाने में पसीना लगता है।”
नेहा बिना धन्यवाद दिए निकल गई।
समय बीतता गया।
नेहा ने पढ़ाई पूरी की।
एक दिन शाम को बोली—
“पापा मैंने रोहन से शादी करने का फैसला किया है।
सादा रजिस्ट्रेशन होगा।
आपने जो पैसे जोड़ रखे हैं…
वो दे दीजिए।”
सरला देवी चौंक गईं।
“हम लड़के वालों से मिल तो लें?”
“नहीं माँ…
रोहन को ये सब अच्छा नहीं लगता।
वो अपने घरवालों से भी अलग रहने वाला है।”
बहस चली।
आँसू बहे।
आख़िर माता-पिता हार गए।
सालों की जमा पूँजी बेटी के हाथ में दे दी।
शादी वाले दिन
घर में न शोर था,
न रिश्तेदार।
नेहा अकेली गई।
कहा—
“शादी के बाद आकर मिलेंगे।”
लेकिन वो कभी नहीं आई।
फोन भी उठना बंद।
तीन महीने बीत चुके थे।
एक रात अचानक घर की ख़ामोशी को चीरता हुआ फोन बज उठा।
सरला देवी घबराकर उठ बैठीं।
इतनी रात को फोन… दिल अपने-आप बैठने लगा।
फोन उठाते ही दूसरी ओर से रोती हुई आवाज़ आई—
“माँ…
मुझे यहाँ से ले जाओ…
रोहन सारे पैसे लेकर भाग गया है।
मुझे अकेला छोड़ गया है…”
सरला देवी के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा।
पैरों में जैसे जान ही नहीं रही।
वो वहीं पलंग के किनारे बैठ गईं।
श्यामलाल जी घबराकर पास आए।
फोन हाथ में लिया।
कुछ पल वो भी चुप रहे।
फिर भारी आवाज़ में बस इतना बोले—
“पता भेज दो बेटा…
हम आ रहे हैं।”
फोन कट गया।
कमरे में सन्नाटा फैल गया।
उनके पास ज़्यादा पैसे नहीं थे,
न उम्र का सहारा था,
न शरीर में पहले जैसी ताक़त।
लेकिन बेटी मुसीबत में थी…
और माता-पिता का दिल
आज भी उसके लिए
पूरा भरा हुआ था।
अगले दिन...
अगली सुबह नेहा घर लौटी।
चेहरा बुझा हुआ था,
आँखों में डर और पछतावे की परछाईं।
दरवाज़ा बंद होते ही
वह माँ से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी।
“माफ़ कर दो माँ…
मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।
मुझे कुछ समझ नहीं थी।”
सरला देवी ने उसे सीने से लगा लिया।
धीरे से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—
“गलतियाँ तो हर इंसाऩान से होती हैं बेटा,
लेकिन अपने लोगों को छोड़ देना
सबसे बड़ी भूल होती है।”
पास ही बैठे श्यामलाल जी अब तक खामोश थे।
कुछ पल बाद उन्होंने गहरी साँस ली और बोले—
“पैसा फिर कमा लिया जाता है,
लेकिन अगर औलाद रास्ता भटककर
वापस लौट आए…
तो वही माता-पिता की सबसे बड़ी कमाई होती है।”
नेहा की आँखें भर आईं।
वह बिना कुछ कहे
पापा के पास आकर बैठ गई।
घर आज भी वही छोटा-सा था,
पैसा आज भी सीमित ही था,
लेकिन अब रिश्तों में
कोई हिसाब नहीं बचा था।
क्योंकि जब इंसान ज़रूरत और लालच के बीच का फर्क समझ लेता है,
तभी रिश्तों की अहमियत पहचान पाता है,
और तभी परिवार सच में बचता है।

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