बहनें और बदलती किस्मत
हल्द्वानी शहर के एक पुराने मोहल्ले में
दो बहनें रहती थीं — सरोज और कविता,
अपनी माँ शारदा देवी के साथ।
माँ रोज़ सुबह मंदिर जाती,
और लौटते समय भगवान से बस एक ही बात कहती —
“मेरी बेटियाँ खुश रहें।”
सरोज बड़ी थी।
रंग थोड़ा सांवला, कद साधारण,
और स्वभाव बहुत शांत।
कविता छोटी थी।
गोरा रंग, बड़ी आँखें,
और बात करने का ढंग ऐसा
कि लोग पहली मुलाक़ात में ही प्रभावित हो जाते।
समय बीतता गया।
दोनों बेटियाँ जवान हो गईं।
शादियों का फर्क...
कविता की शादी शहर के एक नामी व्यापारी राघव से हो गई थी।
ससुराल में बड़ा सा मकान था,
दरवाज़े पर खड़ी गाड़ी,
और घर के हर काम के लिए नौकर–चाकर।
हर चीज़ में एक चमक थी —
फर्नीचर में भी,
कपड़ों में भी,
और लोगों के बोलचाल में भी।
दूसरी ओर,
सरोज की शादी महेश से हुई —
जो एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस में काम करता था।
न छोटा–बड़ा घर,
न कोई दिखावा,
बस दो वक्त की रोटी
और ईमानदार मेहनत।
सरोज ने कभी अपने हालातों की शिकायत नहीं की,
कभी किस्मत को दोष नहीं दिया।
लेकिन दिल के किसी कोने में
एक हल्की-सी दर्द ज़रूर थी —
जो हर बार चुपचाप रह जाती थी।
बहनों की मुलाक़ात...
एक दिन सरोज सब्ज़ी लेने बाजार गई थी।
वहीं उसने देखा —
कविता एक बड़े शोरूम से बाहर निकल रही थी।
हाथ में कई थैले,
चेहरे पर महंगे चश्मे।
सरोज खुशी से दौड़ी।
सरोज –
“अरे कविता! तू यहाँ?”
कविता (मुस्कुराते हुए) –
“हाँ दीदी, शॉपिंग करने आई थी।
मेरे यहाँ तो हर चीज़ के लिए अलग–अलग स्टाफ है,
पर फिर भी मुझे खुद बाहर निकलना अच्छा लगता है।”
सरोज बस मुस्कुरा दी।
कविता –
“अच्छा दीदी, रविवार को मेरे बेटे का बर्थडे है।
बड़ी पार्टी है।
आप ज़रूर आइएगा।
घर का पता दे दो, ड्राइवर कार्ड देने आ जाएगा।”
सरोज ने पता दे दिया।
रविवार से ठीक दो दिन पहले
कविता खुद सरोज के घर आ पहुँची।
महंगी साड़ी पहने,
ऊँची एड़ी की चप्पल,
और चेहरे पर हल्की-सी नाक सिकुड़ी हुई —
जैसे हर चीज़ उसे खटक रही हो।
घर में कदम रखते ही वह बोली —
कविता —
“दीदी, यहाँ तो बहुत गर्मी है।
कूलर भी नहीं रखा?”
सरोज ने सहजता से कहा —
“अभी थोड़े पैसे जोड़ रहे हैं,
अगले महीने ले लेंगे।”
इतना कहकर सरोज अंदर गई
और कविता के लिए
मिट्टी के घड़े से ठंडा पानी ले आई।
गिलास देखते ही कविता का चेहरा बदल गया।
कविता —
“ये क्या है दीदी?
मैं तो अब सिर्फ बोतल वाला पानी पीती हूँ।
ये सब… अब मेरे बस का नहीं रहा।”
इतना कहकर
वह बिना पीछे देखे उठकर चली गई।
सरोज वहीं खड़ी रह गई —
हाथ में गिलास थामे हुए।
कुछ पल बाद
उसने गिलास नीचे रख दिया
और देर तक
उस खाली गिलास को देखती रही —
जैसे उसमें
अपना अपमान तैरता हुआ देख रही हो।
पार्टी की चोट...
फिर भी सरोज पार्टी में गई।
पुरानी लेकिन साफ़ साड़ी पहनकर।
दरवाज़े पर खड़ी एक औरत बोली –
“मैडम, ये कामवाली अंदर नहीं जा सकती।”
तभी कविता आ गई।
कविता –
“दीदी, आप नीचे स्टाफ एरिया में बैठ जाइए।
मैं वहीं खाना भिजवा देती हूँ।”
सरोज का दिल
जैसे टूटकर बिखर गया।
एक फैसला...
घर लौटकर सरोज रोई नहीं।
न आँखों से आँसू बहे,
न किसी से कोई शिकायत की।
वह चुपचाप रसोई में गई,
चूल्हा जलाया,
और रोज़ की तरह खाना बनाती रही —
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
लेकिन उसके भीतर
कुछ टूट चुका था।
रात को, जब सारा घर सो गया,
सरोज ने धीमी आवाज़ में कहा —
“महेश,
मैं भी कुछ काम करना चाहती हूँ।
अब और चुप रहकर जीना मुझसे नहीं होगा।”
महेश ने उसकी आँखों में देखा,
एक पल भी नहीं सोचा
और बस इतना कहा —
“जो भी करोगी,
मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
मेहनत की शुरुआत...
सरोज ने पास की एक दर्जी की दुकान में
छोटा-सा काम शुरू किया।
शुरुआत में वह कपड़े काटने,
सिलाई में मदद करने
और ऑर्डर लिखने का काम करती थी।
धीरे-धीरे
अपनी बचत से उसने
एक पुराना सिलाई मशीन खरीदा
और घर से ही
लोगों के सिलाई के ऑर्डर लेने लगी।
शुरुआत में लोगों को
उसके काम पर भरोसा नहीं था।
कई बार ऑर्डर मिले भी तो
कम दाम दिए गए।
लेकिन सरोज ने हार नहीं मानी।
वह जानती थी —
मेहनत और सब्र
एक दिन ज़रूर रंग लाते हैं।
छह महीनों के भीतर
उसकी सिलाई का काम इतना बढ़ गया
कि उसने दो और औरतों को अपने साथ काम पर रख लिया।
एक साल के अंदर
उसका छोटा-सा सिलाई का कमरा
एक पूरी तरह चलने वाली दर्ज़ी की दुकान बन गया।
और तीन साल बीतते-बीतते
उसके सिले कपड़ों की माँग
पूरे शहर में फैल गई,
अब उसका नाम
अच्छी दर्ज़ी के रूप में जाना जाने लगा।
आईना...
एक दिन शाम को
टीवी पर सरोज का इंटरव्यू चल रहा था।
रिपोर्टर ने मुस्कुराते हुए पूछा —
“सरोज जी, आपकी सफलता का राज़ क्या है?”
सरोज ने पल भर रुककर कहा —
“सम्मान…
और वो अपमान,
जिसने मुझे टूटने नहीं दिया,
बल्कि और मज़बूत बना दिया।”
उधर उसी समय
अपने घर में बैठी कविता
ये सब सुन रही थी।
उसके हाथ काँप गए,
उसने चुपचाप टीवी बंद किया
और आँखों से आँसू बहने लगे।
अगले दिन
कविता खुद
सरोज की सिलाई की दुकान पर पहुँची।
चेहरे पर झिझक थी
और आँखों में पछतावे के आँसू।
कविता की आवाज़ भर्रा गई —
“दीदी…
मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।
माफ़ कर दो।”
सरोज ने सिलाई मशीन से नज़र हटाई,
उसकी तरफ देखा
और हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा —
“बहनें गलती याद रखने के लिए नहीं,
माफ़ करने के लिए होती हैं।”
सीख:
गरीबी इंसान को छोटा नहीं बनाती,
और अमीरी इंसान को बड़ा नहीं।
इंसान को बड़ा बनाती है —
उसकी सोच, मेहनत और दिल।

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