जब पत्नी ने साबित किया कि वो निकम्मी नहीं है
क्या पति के ताने सच में पत्नी को बर्बाद कर सकते हैं?
या वही ताने कभी उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाते हैं?
यह कहानी है सुमन और उसके पति अभिषेक की।
सुमन सुबह पाँच बजे उठ जाती थी।
पहले सास-ससुर के लिए चाय, फिर बच्चों का टिफिन, फिर घर की सफाई, कपड़े, सब्ज़ी, राशन—दिन कब शुरू होता और कब खत्म, उसे खुद नहीं पता चलता।
लेकिन अभिषेक की नज़र में ये सब “काम” नहीं था।
एक शाम ऑफिस से लौटते ही उसने देखा कि सुमन सोफे पर बैठकर मोबाइल देख रही है।
“वाह! बड़ी मेहनत चल रही है,” उसने ताना मारा।
“दिन भर बस फोन चलाओ, और कहो कि थक गई।”
सुमन ने धीरे से कहा, “अभी-अभी काम खत्म किया है…”
“कौन सा काम? घर में दो ही बच्चे हैं। इतना भी नहीं संभलता तुमसे? सच कहूँ तो तुममें कोई काबिलियत ही नहीं है।”
ये शब्द सुमन के दिल में धँस गए।
बच्चे दरवाज़े पर खड़े सब सुन रहे थे।
उस रात सुमन बहुत रोई।
उसे लगा शायद सच में वो बेकार है।
एक छोटा सा हुनर...
सुमन को सिलाई बहुत अच्छी आती थी।
शादी से पहले वो अपने मोहल्ले की औरतों के कपड़े सीती थी। ब्लाउज की फिटिंग ऐसी कि हर कोई तारीफ करे।
लेकिन शादी के बाद उसने मशीन को छुआ भी नहीं।
अगले दिन अलमारी साफ करते वक्त उसे अपनी पुरानी सिलाई मशीन दिखी।
उसने उसे साफ किया… ऐसे जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो।
उसने सोचा—
“अगर मैं रोज़ दो-तीन कपड़े भी सिल लूँ, तो क्या बुरा है?”
लेकिन डर भी था।
अगर अभिषेक को पता चला तो वो फिर ताना मारेगा—
“अब ये नाटक शुरू कर दिया?”
पहला कदम...
सुमन ने एक दिन हिम्मत करके पड़ोस की रीना से कहा,
“रीना, अगर तुम्हें सूट सिलवाना हो तो मैं सिल दूँ? पहले मैं बहुत सिलाई किया करती थी।”
रीना ने थोड़ा हैरानी से उसकी तरफ देखा, फिर मुस्कुराकर बोली,
“अरे वाह! क्यों नहीं? मैं तो वैसे भी नया सूट सिलवाने का सोच रही थी।”
सुमन ने नाप लिया।
कपड़ा बहुत साधारण था, लेकिन उसने उसमें अपना पूरा मन लगा दिया। हर टांका बड़ी सावधानी से लगाया। गले की डिजाइन खुद बनाई, बाजू पर हल्की कढ़ाई की, और फिटिंग पर खास ध्यान दिया।
दो दिन बाद जब रीना ने सूट पहनकर देखा, तो आईने के सामने खुद को निहारती रह गई।
“अरे सुमन! ये तो बिल्कुल दुकान में सिलवाए हुए सूट जैसा लग रहा है। इतनी बढ़िया फिटिंग! सच में, तुम्हारे हाथ में तो जादू है।”
रीना की ये बात सुमन के दिल में सीधी उतर गई।
कई दिनों बाद किसी ने उसकी तारीफ की थी।
रीना ने अपने रिश्तेदारों और पड़ोस की औरतों को भी सुमन के बारे में बता दिया। धीरे-धीरे मोहल्ले की औरतें उसके पास आने लगीं—कोई ब्लाउज सिलवाने, कोई सूट, तो कोई पैंट की फिटिंग ठीक करवाने।
सुमन अब दोपहर के समय, जब अभिषेक ऑफिस और बच्चे स्कूल में होते, चुपचाप अपनी पुरानी सिलाई मशीन निकालकर काम करने लगती। मशीन की धीमी-धीमी आवाज़ उसके लिए संगीत जैसी हो गई थी।
रात को जब सब सो जाते, वह अपनी कमाई के पैसे एक छोटे से डिब्बे में रख देती। हर बार नोट रखते हुए उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ जाती—ये उसकी अपनी मेहनत की कमाई थी।
तीन महीने कब गुजर गए, उसे पता ही नहीं चला।
एक रात उसने डिब्बा खोलकर पैसे गिने—पूरे पच्चीस हज़ार रुपये थे।
उसकी उंगलियाँ काँप रही थीं।
ये सिर्फ पैसे नहीं थे, ये उसका आत्मविश्वास था… उसकी पहचान थी… उसका पहला कदम था अपने पैरों पर खड़े होने की ओर।
बड़ा मौका...
इसी बीच अभिषेक की कंपनी में छँटनी शुरू हो गई।
एक दिन वो घर आया, बहुत परेशान।
“शायद अगले महीने मेरी नौकरी चली जाए,” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
पहली बार सुमन ने उसे इतना टूटा हुआ देखा।
घर का लोन, बच्चों की फीस, दवाइयाँ—सबका बोझ सामने था।
अगले दिन बैंक से फोन आया—किस्त लेट हो गई थी।
अभिषेक चुप बैठा था, माथा पकड़कर।
तभी सुमन कमरे में गई और अपना डिब्बा लेकर आई।
उसने चुपचाप पच्चीस हज़ार रुपये उसके सामने रख दिए।
अभिषेक चौंक गया।
“ये कहाँ से आए?”
सुमन ने हिम्मत जुटाकर कहा,
“मेरी सिलाई से।”
“क्या? तुम सिलाई कर रही हो?”
सुमन ने सब सच बता दिया—कैसे उसने फिर से शुरू किया, कैसे ग्राहक बढ़े।
अभिषेक कुछ पल तक कुछ बोल नहीं पाया।
उसे याद आ रहे थे उसके ताने—
“तुम किसी काम की नहीं…”
आज उसी “नकामी” ने घर को संभाल लिया था।
उस दिन पहली बार अभिषेक ने सुमन से कहा—
“मुझे माफ़ कर दो। मैंने कभी तुम्हारी मेहनत को काम समझा ही नहीं। मैं हमेशा गलत था।”
उसकी आवाज़ में अहंकार नहीं, पछतावा था।
सुमन की आँखें भर आईं।
लेकिन ये आँसू अपमान के नहीं थे…
ये आँसू उस सम्मान के थे, जिसका वो सालों से इंतज़ार कर रही थी।
अभिषेक ने आगे बढ़कर उसका हाथ थामा और बोला—
“अब से तुम खुलकर काम करोगी। तुम्हारा हुनर किसी कोने में छिपा नहीं रहेगा। इस हफ्ते मैं तुम्हारे लिए नई सिलाई मशीन लाऊँगा।”
सुमन को पहली बार लगा कि वो अकेली नहीं है।
अब उसके सपनों के साथ उसका साथी भी खड़ा है।
कुछ ही हफ्तों में घर के एक छोटे से कमरे को साफ करके सजाया गया।
दीवार पर हल्का रंग किया गया, एक बड़ी मेज़ रखी गई, नई मशीन आई… और दरवाज़े पर एक छोटा सा बोर्ड लगा—
“सुमन क्रिएशन्स”
शुरुआत छोटी थी, लेकिन इरादे बड़े।
धीरे-धीरे ऑर्डर बढ़ने लगे।
पहले पड़ोस, फिर पूरे इलाके से लोग आने लगे।
सुमन के डिजाइन की खासियत थी—सादगी और फिटिंग।
अभिषेक खुद उसके काम की तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर डालने लगा।
लोगों ने पसंद किया, शेयर किया… और काम बढ़ता गया।
दो साल बीत गए।
अब सुमन की कमाई अभिषेक से भी ज्यादा थी।
लेकिन घर में कभी तुलना नहीं हुई।
न “मैं ज्यादा कमाता हूँ”,
न “तुम कम कमाती हो”।
अब सिर्फ एक बात होती थी—
“हम मिलकर कमा रहे हैं।”
दोनों साथ बैठकर फैसले लेते, साथ सपने देखते, साथ मेहनत करते।
अभिषेक ने समझ लिया था—
पत्नी की मेहनत कभी छोटी नहीं होती,
बस देखने की नजर छोटी हो सकती है।
और सुमन ने भी सीख लिया था—
खुद पर भरोसा हो तो दुनिया की कोई आवाज़ आपको रोक नहीं सकती।
एक शाम चाय पीते हुए अभिषेक बोला—
“मुझे समझ आ गया है, सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं…
बल्कि अपने साथी का सम्मान है।”
सुमन मुस्कुराई।
आज उसे किसी ताने से डर नहीं लगता था।
संदेश:
पति या किसी के भी ताने इंसान को भीतर तक तोड़ सकते हैं —
अगर वह उन्हें अपनी सच्चाई मानकर हार मान ले।
लेकिन वही ताने किसी के लिए चिंगारी भी बन सकते हैं —
अगर वह ठान ले कि अब खुद को साबित करना है।
बात तानों की नहीं,
बात हमारे विश्वास की है।
हर औरत के भीतर कोई न कोई हुनर ज़रूर होता है।
कभी वह रसोई में छुपा होता है,
कभी किताबों में,
कभी कला में,
और कभी उसके धैर्य और मेहनत में।
ज़रूरत सिर्फ इतनी है कि
वह खुद को कम समझना बंद करे,
अपने हुनर को पहचाने,
और अपने ऊपर भरोसा करना सीखे।
जब औरत खुद पर विश्वास कर लेती है,
तो दुनिया का कोई ताना उसे छोटा नहीं कर सकता।

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