सोने का मोह
गांव के एक छोटे से घर में शारदा अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके पति रमेश एक छोटी सी नौकरी करते थे। घर में एक बेटा अर्जुन और दो बेटियां रीमा और कविता थीं।
शारदा को सोने का बहुत शौक था। जब भी मोहल्ले में किसी के यहां शादी होती और औरतें सोने के गहने पहनकर आतीं, तो शारदा बस उन्हें देखती ही रह जाती।
एक दिन उसने रमेश से कहा,
“देखो जी, सामने वाली सीमा ने अपनी बहू को कितने गहने पहनाए थे। हमारे पास तो एक ढंग का हार भी नहीं है।”
रमेश ने समझाया,
“भागवान, जितनी चादर हो उतने ही पैर फैलाने चाहिए। हम अपनी जरूरतें ही मुश्किल से पूरी कर पा रहे हैं।”
लेकिन शारदा का मन नहीं मानता था।
पड़ोस की चर्चा...
एक दिन दोपहर के समय पड़ोसन कमला शारदा के घर आ गई। आते ही उसने धीरे से इधर-उधर देखा, फिर पास बैठते हुए बोली—
“अरी शारदा, कुछ सुना तुमने? सुनीता की बहू अपने साथ पूरे पाँच तोले सोना लेकर आई है।”
यह सुनते ही शारदा की आँखें चमक उठीं। उसने आश्चर्य से पूछा—
“सच कह रही हो? इतनी महंगाई में भी पाँच तोले सोना?”
कमला ने गर्दन हिलाते हुए कहा—
“हाँ बहन, बड़े घर की लड़की है। उसके मायके वालों ने खुलकर दिया है।”
कमला तो यह कहकर चली गई, लेकिन उसकी बात शारदा के मन में घर कर गई। उस दिन से उसने मन ही मन ठान लिया—
“मैं भी अपने बेटे की शादी ऐसे घर में ही करूंगी, जहाँ से ढेर सारा सोना आए।”
अर्जुन की पसंद...
लेकिन अर्जुन कॉलेज में अपनी सहपाठी नंदिनी को पसंद करता था।
नंदिनी एक साधारण और संस्कारी परिवार से थी। उसके पिता एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे। घर में ज्यादा धन-दौलत नहीं थी, लेकिन सम्मान और सादगी भरपूर थी।
काफी दिनों तक अर्जुन सोचता रहा कि वह मां से अपनी बात कैसे कहे। आखिर एक दिन उसने हिम्मत जुटाई।
शाम का समय था। शारदा रसोई में काम कर रही थी। अर्जुन धीरे-धीरे उनके पास गया और बोला—
“मां, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है।”
शारदा ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”
अर्जुन ने हल्की घबराहट के साथ कहा,
“मां… मैं नंदिनी से शादी करना चाहता हूं। हम एक-दूसरे को समझते हैं और मैं उसे पसंद करता हूं।”
यह सुनते ही शारदा का चेहरा बदल गया।
“कौन नंदिनी? वही साधारण घर की लड़की?”
फिर थोड़ी तीखी आवाज़ में बोली—
“पहले ये बताओ, वो अपने साथ कितने गहने लाएगी? बिना सोने के मैं ये शादी नहीं करूंगी।”
मां की बात सुनकर अर्जुन के शब्द जैसे गले में ही अटक गए।
वह चुपचाप खड़ा रह गया। उसके मन में प्यार भी था और मां की जिद का बोझ भी।
योजना...
अर्जुन ने एक दिन हिम्मत करके नंदिनी को सारी बात साफ-साफ बता दी।
उसने उदास स्वर में कहा,
“नंदिनी, मां मेरी शादी तो करना चाहती हैं, लेकिन उनकी एक ही शर्त है—बहू ढेर सारा सोना लेकर आए। अगर उन्हें लगे कि तुम्हारे घर से ज्यादा सोना नहीं आएगा, तो वो कभी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं होंगी।”
नंदिनी कुछ पल चुप रही। फिर उसने गंभीरता से कहा,
“अर्जुन, रिश्ते सोने से नहीं, समझ और भरोसे से चलते हैं। अगर तुम्हारी मां को सच में सोना ही सबसे जरूरी लगता है, तो उन्हें यह समझाना पड़ेगा कि असली धन क्या होता है।”
अर्जुन ने हैरानी से पूछा,
“लेकिन कैसे?”
नंदिनी हल्का सा मुस्कुराई और बोली,
“हमें उन्हें एक ऐसा सच दिखाना होगा, जिससे उनकी सोच बदल सके। हम दिखावा करेंगे कि मेरे पास बहुत सोना है… और सही समय पर उन्हें सच्चाई भी बता देंगे। शायद तब उन्हें समझ आए कि चमकती चीज़ हमेशा कीमती नहीं होती।”
अर्जुन ने उसकी ओर देखा। अब उसके चेहरे पर चिंता की जगह उम्मीद थी।
दोनों ने मिलकर एक योजना बनाई—
ऐसी योजना, जो केवल शादी कराने के लिए नहीं, बल्कि एक सोच बदलने के लिए थी।
दिखावा...
रिश्ता देखने का दिन आ गया।
घर में सुबह से ही हलचल थी। शारदा बार-बार दरवाज़े की ओर देख रही थी। थोड़ी देर बाद अर्जुन और उसके पिताजी मेहमानों के साथ नंदिनी को लेकर अंदर आए।
नंदिनी लाल रंग के भारी लहंगे में सजी हुई थी। उसने गले में लंबा हार, कानों में झुमके, हाथों में कंगन और मांग में मांगटीका पहन रखा था। पहली नज़र में ऐसा लग रहा था जैसे वह सचमुच सोने से लदी हुई हो। उसकी सादगी और मुस्कान भी उतनी ही सुंदर थी।
शारदा की आंखें चमक उठीं। वह मन ही मन सोचने लगी—
“वाह! कितने गहने पहनकर आई है। जरूर बड़े घर की लड़की होगी।”
नंदिनी ने सबके पैर छुए और चुपचाप एक तरफ बैठ गई। उसका व्यवहार भी बहुत विनम्र था।
कुछ देर बातचीत के बाद शारदा ने खुशी से कहा,
“हमें लड़की बहुत पसंद है। बस यही बहू चाहिए मुझे।”
दोनों परिवारों ने सहमति जताई और वहीं पर रिश्ता पक्का कर दिया। घर में मिठाई बंटी और सबके चेहरों पर मुस्कान फैल गई।
सच का सामना...
शादी के बाद जब नंदिनी गृहप्रवेश करके घर में आई, तो सबकी नज़र उसके गहनों पर ही थी। वह सचमुच सिर से पांव तक सोने से सजी हुई लग रही थी।
कुछ देर बाद नंदिनी धीरे-धीरे अपने कमरे में गई और आईने के सामने खड़ी होकर एक-एक करके गहने उतारने लगी। तभी शारदा वहां पहुंच गईं।
उन्होंने आश्चर्य से पूछा,
“अरे बहू, ये क्या कर रही हो? अभी तो सब तुम्हारे गहनों की तारीफ कर रहे थे, और तुम इन्हें उतारने लगी?”
नंदिनी हल्के से मुस्कुराई। उसकी आवाज़ शांत थी, लेकिन शब्दों में सच्चाई थी।
“मांजी, मैं आपसे एक बात कहना चाहती हूं… ये सारे गहने असली नहीं हैं। हमने इन्हें किराए पर लिया था।”
शारदा जैसे पत्थर की हो गईं।
“क्या? मतलब… तुम सोना लेकर नहीं आई?”
नंदिनी ने आदर से उनकी ओर देखते हुए कहा,
“मांजी, मेरे माता-पिता ने मुझे बहुत सारा सोना नहीं दिया, लेकिन उन्होंने मुझे अच्छी शिक्षा दी है, अच्छे संस्कार दिए हैं। उन्होंने सिखाया है कि रिश्ते भरोसे और प्रेम से चलते हैं, गहनों से नहीं। मेरे लिए वही असली धन है।”
तभी अर्जुन भी वहां आ गया। उसने मां का हाथ पकड़कर धीरे से कहा,
“मां, अगर हम सोने के लालच में रहते, तो शायद हमें सच्ची खुशी कभी नहीं मिलती। नंदिनी हमारे घर आई है, यही सबसे बड़ा सौभाग्य है। गहने तो कभी भी खरीदे जा सकते हैं, लेकिन ऐसा साथ और प्यार नहीं।”
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। शारदा की आंखों में भावनाएं उमड़ आईं। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि चमक सोने में नहीं, बल्कि इंसान के दिल में होती है।
बदलाव...
शारदा कुछ देर तक बिल्कुल शांत बैठी रही। उसके चेहरे पर पछतावे की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं। आंखें भर आईं और गला रुंध गया।
धीरे से उसने बहू का हाथ पकड़ा और कहा—
“बहू, मुझे माफ कर दो। मैं गहनों की चमक में इतनी अंधी हो गई थी कि इंसान की असली कीमत भूल गई। आज समझ आया कि असली सोना तो इंसान का साफ दिल और अच्छे संस्कार होते हैं।”
उस दिन के बाद शारदा ने कभी दहेज या सोने की बात नहीं की। उसके व्यवहार में सचमुच बदलाव आ गया था।
कुछ समय बाद उसने अपनी बेटियों को अपने पास बिठाकर प्यार से समझाया—
“बेटियों, याद रखना… गहने शरीर की शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन शिक्षा और आत्मसम्मान जीवन की असली पहचान बनाते हैं। तुम्हारी पढ़ाई, तुम्हारा आत्मविश्वास और तुम्हारे संस्कार ही तुम्हारा सबसे बड़ा गहना हैं। इन्हें कभी मत खोना।”
उसकी बातों में अब अनुभव भी था और सच्चाई भी।
समय धीरे-धीरे बीतता गया।
रीमा और कविता भी पढ़-लिखकर समझदार बन गईं। जब उनकी शादी की बात चली, तो इस बार शारदा ने साफ कह दिया—
“मेरी बेटियाँ दहेज लेकर नहीं, अपने संस्कार और शिक्षा लेकर जाएँगी।”
अच्छे परिवार मिले, जिन्होंने दहेज की कोई मांग नहीं की। सादगी से, प्यार और सम्मान के साथ दोनों बेटियों की शादी हो गई। विदाई के समय शारदा की आँखों में आँसू तो थे, लेकिन इस बार चिंता नहीं थी—बस संतोष था।
अब शारदा का नजरिया पूरी तरह बदल चुका था।
वह मोहल्ले की औरतों से कहती—
“बहनों, सोना पहन लेने से इज्जत नहीं मिलती। इज्जत तो अच्छे व्यवहार, संस्कार और आत्मसम्मान से मिलती है। असली गहना तो इंसान का चरित्र होता है।”
और सचमुच, उस घर में अब तिजोरी में रखा सोना नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, विश्वास और हँसी की चमक दिखाई देती थी।
वह घर अब गहनों से नहीं, खुशियों से जगमगाता था।
कहानी की सीख:
> असली धन गहनों में नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार, प्रेम और सच्चे रिश्तों में होता है।
लालच कभी स्थायी सुख नहीं देता, लेकिन समझदारी, संतोष और सही सोच जीवन को सच में बदल देती है।

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