शादी से पहले कुछ और… शादी के बाद कुछ और

 

Indian family celebrating Karva Chauth with mother-in-law in red saree and daughters-in-law in traditional suits inside decorated home


दोपहर का समय था।

ड्रॉइंग रूम में रिया सोफे पर बैठी मोबाइल चला रही थी। तभी उसकी मम्मी अपने कमरे से बाहर आईं।


उन्होंने नया स्टाइलिश गाउन पहना हुआ था, जिसमें साइड में हल्का सा कट था।


“रिया, ज़रा देख तो… ये ड्रेस कैसी लग रही है?”


रिया ने ऊपर से नीचे तक देखा और बोली,

“मम्मी, ये ड्रेस आपकी उम्र की नहीं है। आप ये क्यों पहन रही हो?”


मम्मी हँस पड़ीं।

“अरे, कपड़ों की भी कोई उम्र होती है क्या?”


रिया बोली,

“मम्मी, हर कपड़ा हर जगह अच्छा नहीं लगता। लोग क्या कहेंगे?”


मम्मी मुस्कुराईं, “लोगों का काम है कहना। हमें वही पहनना चाहिए जिसमें हम खुश रहें।”


रिया चुप हो गई।



रिश्ता तय होने का दिन...


शाम को घर में हलचल थी। रिया को देखने लड़के वाले आने वाले थे। वह हल्के रंग के सूट में तैयार होकर कमरे में बैठी थी।


कुछ ही देर में गाड़ी आकर रुकी। अर्जुन अपने मम्मी-पापा और दो भाभियों के साथ अंदर आया। अर्जुन की मम्मी, सुमन जी, साड़ी में थीं—माथे पर बड़ी बिंदी और सिर पर पल्लू, बिल्कुल सादगी भरा रूप।


बैठते ही सुमन जी ने कहा,

“हमें बस एक सीधी-सादी, संस्कारी लड़की चाहिए। आजकल की लड़कियों जैसी नहीं।”


रिया की मम्मी मुस्कुराकर बोलीं,

“मेरी बेटी मॉडर्न जरूर है, लेकिन अपने संस्कार नहीं भूली।”


तभी रिया ट्रे में चाय लेकर आई, सबको नमस्ते किया और शांति से बैठ गई। उसकी सादगी और व्यवहार सबको पसंद आया।


थोड़ी बातचीत के बाद सुमन जी ने कहा,

“हमें रिया पसंद है।”


मिठाई खिलाई गई और रिश्ता वहीं पक्का हो गया।



शादी की तैयारी...


कुछ दिनों बाद रिया अपनी होने वाली सास सुमन जी के साथ शादी का लहंगा खरीदने मॉल गई।


मॉल में चारों ओर चहल-पहल थी। बड़े-बड़े शोरूम रोशनी से चमक रहे थे। दोनों एक अच्छे से शोरूम में गईं और तरह-तरह के लहंगे देखने लगीं।


उसी दौरान वहाँ कुछ लड़कियाँ शॉर्ट ड्रेस पहनकर हँसती-बोलती घूम रही थीं।


सुमन जी ने एक नजर उनकी ओर देखा और फिर धीमे स्वर में रिया से बोलीं,

“देखो बेटा, आजकल की लड़कियाँ कैसे कपड़े पहनती हैं। हमें ऐसी बहू नहीं चाहिए जो इस तरह के कपड़े पहने। कपड़े हमेशा सादगी और मर्यादा वाले होने चाहिए।”


रिया ने सम्मान से सिर झुकाते हुए कहा,

“जी मम्मी जी, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। मुझे भी ऐसे कपड़े पसंद नहीं हैं। मैं हमेशा सादे और सभ्य कपड़े ही पहनती हूँ।”


सुमन जी संतुष्ट होकर मुस्कुरा दीं।

फिर दोनों ने ध्यान से लहंगे चुने, रंग और डिजाइन पर बात की और आखिरकार एक सुंदर लहंगा पसंद कर लिया।


खुश मन से दोनों शोरूम से बाहर निकलीं और घर लौट आईं।



शादी और पहला दिन...


शादी बहुत धूमधाम से हुई थी।

ढोल-नगाड़ों, रोशनी और मेहमानों की भीड़ के बीच रिया ने विदा ली और दुल्हन बनकर अपने ससुराल आ गई।


घर के दरवाज़े पर उसकी आरती हुई, चावल से भरी थाली में पैर रखकर उसने गृहप्रवेश किया। सबके चेहरों पर खुशी थी, और रिया के मन में नए जीवन की हल्की-सी घबराहट और उत्साह दोनों।



अगली सुबह उसकी पहली रसोई थी।


रिया सुबह जल्दी उठी, नहाकर सुंदर सा सूट पहना और रसोई में लग गई। उसने पूरे मन से हलवा, पूड़ी और सब्ज़ी बनाई। हर डिश को सजाकर बड़े प्यार से डाइनिंग टेबल पर लगाया।


उसके दिल में बस एक ही इच्छा थी—सबको उसका बनाया खाना पसंद आए।


धीरे-धीरे घर के लोग डाइनिंग एरिया में आने लगे।


सबसे पहले दोनों भाभियाँ आईं…

लेकिन उन्हें देखकर रिया एक पल के लिए रुक गई।


वे दोनों जींस और टॉप पहने हुए थीं, बिल्कुल मॉडर्न अंदाज़ में।


रिया ने सोचा शायद घर में ऐसे ही रहता होगा।


तभी सास सुमन जी भी अपने कमरे से बाहर आईं।


रिया की नज़र जैसे ही उन पर पड़ी, वह सचमुच चौंक गई।


सुमन जी स्लीवलेस गाउन में थीं—खुले बाल, हल्का मेकअप और पूरी तरह मॉडर्न लुक।


रिया की आँखें अनायास ही बड़ी हो गईं।


उसके मन में वही शब्द गूंजने लगे—

“हमें बस एक संस्कारी बहू चाहिए… आजकल की लड़कियों जैसी नहीं…”


वही सास, जो शादी से पहले साड़ी और पल्लू में लिपटी हुई संस्कारों की बातें कर रही थीं, आज बिल्कुल अलग रूप में सामने खड़ी थीं।


रिया के हाथ में रखा चम्मच हल्का-सा कांप गया।


उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या सोचे।


क्या यही उनका असली रूप था?

या शादी से पहले वाला?


वह चुपचाप कुर्सी पर बैठ गई।

चेहरे पर हल्की मुस्कान थी… लेकिन मन में सवालों का सैलाब उमड़ रहा था।



😕 सच सामने आया...


एक दिन दोपहर के समय सास की कुछ पुरानी सहेलियाँ घर आईं।


दरवाज़ा खुलते ही घर में हँसी-मज़ाक की आवाज़ें गूंजने लगीं। सभी सहेलियाँ मॉडर्न कपड़ों में थीं—किसी ने जींस और टॉप पहना था, किसी ने स्टाइलिश गाउन, तो किसी ने शॉर्ट कुर्ती के साथ प्लाज़ो। माहौल बिल्कुल खुला और बेफिक्र था।


सास भी उस दिन स्लीवलेस टॉप और लॉन्ग स्कर्ट पहने हुए थीं। वे सबके बीच बैठकर ठहाके लगा रही थीं।


तभी हँसते-हँसते उन्होंने मज़ाक में कहा,

“अरे यार, शादी के टाइम तो साड़ी पहननी पड़ी थी… वरना मैं तो हमेशा ऐसे ही कपड़े पहनती हूँ। वहाँ तो थोड़ा संस्कारी बनना ज़रूरी था!”


सभी सहेलियाँ ज़ोर से हँस पड़ीं।


रिया दरवाज़े के पास खड़ी सब सुन रही थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, लेकिन मन के अंदर कई सवाल उठ रहे थे।


उसे उसी पल समझ आ गया कि शादी से पहले जो सादगी और परंपरा का रूप दिखाया गया था, वह पूरा सच नहीं था।


सामने जो दिखा था, वह एक छवि थी…

और आज जो दिख रहा था, वही असली स्वभाव था।


रिया चुपचाप वहाँ से मुड़ गई।

अब उसे सच्चाई साफ दिखाई दे चुकी थी।



रिया ने धीमे लेकिन साफ शब्दों में अर्जुन से कहा,


“अर्जुन, एक बात पूछूँ? तुमने ये सब मुझे पहले क्यों नहीं बताया? शादी से पहले मम्मी जी को बिल्कुल अलग रूप में दिखाया गया… और अब सब कुछ अलग है। अगर मुझे सच पहले से पता होता तो मुझे इतना अजीब महसूस नहीं होता।”


अर्जुन ने गहरी साँस लेते हुए जवाब दिया,

“रिया, मम्मी जैसी हैं वैसी ही रहेंगी। उनकी अपनी सोच है, अपनी पसंद है। हम उन्हें बदल नहीं सकते… और सच कहूँ तो हमने कभी कोशिश भी नहीं की।”


रिया ने शांत लेकिन भावुक आवाज़ में कहा,

“मैं उन्हें बदलना नहीं चाहती, अर्जुन। मुझे किसी के कपड़ों से परेशानी नहीं है। बस इतना चाहती हूँ कि जो सच है, वही सामने हो। अगर शुरुआत से ही सब साफ होता, तो आज मुझे धोखा सा महसूस नहीं होता। रिश्ते भरोसे पर टिके होते हैं… और भरोसा सच से बनता है, दिखावे से नहीं।”



पड़ोस की बातें...


एक दिन रिया सब्ज़ी लेने बाजार गई हुई थी।

भीड़-भाड़ के बीच कुछ पड़ोस की औरतें आपस में खड़ी बातें कर रही थीं।


रिया जैसे ही उनके पास से गुज़री, उसने अपनी सास सुमन जी का नाम सुना तो उसके कदम रुक गए।


एक औरत ने धीरे से कहा,

“अरे देखा तुमने? इतनी उम्र में भी कैसे-कैसे कपड़े पहनती हैं…”


दूसरी ने हँसते हुए कहा,

“हाँ बहन, कुछ तो उम्र का लिहाज़ होना चाहिए। अब जवान लड़कियों जैसे कपड़े पहनना अच्छा लगता है क्या?”


तीसरी बोली,

“आजकल की औरतों को तो बस दिखावा करना है।”


रिया का चेहरा उतर गया। उसे बहुत बुरा लगा।

वो बिना कुछ कहे जल्दी-जल्दी घर लौट आई।


घर पहुँचते ही उसने देखा, सुमन जी आराम से चाय पी रही थीं।


रिया उनके पास बैठ गई। आवाज़ में हल्की चिंता थी।


“मम्मी जी… आज बाजार में कुछ औरतें आपके बारे में बातें कर रही थीं। उन्हें आपके कपड़े पसंद नहीं आ रहे थे। कह रही थीं कि आपको अपनी उम्र के हिसाब से कपड़े पहनने चाहिए।”


सुमन जी ने चाय का कप मेज़ पर रखा और शांत स्वर में बोलीं,


“बेटा, लोगों का काम ही है बातें बनाना।

लोग तो भगवान में भी कमी निकाल लेते हैं, हम तो फिर भी इंसान हैं।


कपड़े हम अपनी खुशी और अपने आराम के लिए पहनते हैं, दूसरों को खुश करने के लिए नहीं। अगर मैं वही पहनूँ जो मुझे अच्छा लगे और उसमें मैं सहज महसूस करूँ, तो इसमें गलत क्या है?”


रिया चुप हो गई।

उसे पहली बार एहसास हुआ कि बात सिर्फ कपड़ों की नहीं, सोच की भी है।


वह सोच में पड़ गई —

क्या सच में दूसरों की बातों के डर से हमें अपनी पसंद बदल देनी चाहिए?

या फिर अपने मन की सुननी चाहिए?



कुछ दिन बाद घर में करवा चौथ का फंक्शन था।

पूरा घर रोशनी, फूलों और रंगोली से सजा हुआ था। रसोई से मिठाइयों की खुशबू आ रही थी और आँगन में औरतों की हँसी गूंज रही थी।


रिया और उसकी दोनों भाभियाँ तैयार होकर कमरे से बाहर आईं।

तीनों ने सुंदर-सुंदर सूट पहने थे — हल्का मेकअप, सजी हुई चूड़ियाँ और चेहरे पर चमकती मुस्कान।


जैसे ही वे हॉल में पहुँचीं, पड़ोस की औरतें तारीफ करने लगीं —


“अरे वाह! तीनों बहुएँ तो आज बहुत सुंदर लग रही हैं।”

“देखो इनके रंग और स्टाइल कितने अच्छे लग रहे हैं।”


रिया के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गई।


उसी समय दरवाज़े के पास हलचल हुई।

सबकी नजर उधर मुड़ी।


सास जी धीरे-धीरे अंदर आईं…

लेकिन इस बार वे क्रॉप टॉप या गाउन में नहीं थीं।


उन्होंने गहरे लाल रंग की सुंदर साड़ी पहनी थी, माथे पर बड़ी सी बिंदी, हाथों में काँच की चूड़ियाँ और बाल सलीके से बंधे हुए।


पूरा हॉल कुछ पल के लिए शांत हो गया।


रिया की आँखें आश्चर्य से फैल गईं।

उसे यकीन ही नहीं हो रहा था।


सास जी उसके पास आईं, हल्की मुस्कान के साथ बोलीं —


“क्या हुआ बेटा? ऐसे क्यों देख रही हो?”


रिया धीरे से बोली,

“मम्मी जी… आप आज बहुत सुंदर लग रही हैं।”


सास ने प्यार से उसका हाथ पकड़ा और कहा —


“बेटा, हर कपड़े की एक जगह और एक समय होता है।

आज घर का फंक्शन है, सब रिश्तेदार आए हैं… तो साड़ी ही अच्छी लगती है।”


रिया की आँखें नम हो गईं।

उसे महसूस हुआ कि बात सिर्फ कपड़ों की नहीं थी…

बात समझ और सम्मान की थी।


उसने आगे बढ़कर सास के पैर छुए।


सास ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।


उस पल दोनों के बीच कोई तकरार नहीं थी,

सिर्फ अपनापन था।


और रिया ने मन ही मन सोचा —


“संस्कार कपड़ों में नहीं, सोच में होते हैं…

और आज मम्मी जी ने मुझे ये बात सिखा दी।” 



कहानी का संदेश:


धीरे-धीरे घर में आपसी समझ और संतुलन बन गया।


सास अपनी पसंद के कपड़े पहनती रहीं,

लेकिन अब वे समय, जगह और अवसर का ध्यान रखने लगीं।


और रिया ने भी यह स्वीकार कर लिया कि हर इंसान की अपनी पसंद, अपनी सोच और अपनी स्वतंत्रता होती है।


उसे समझ आ गया कि किसी को उसके कपड़ों से नहीं,

बल्कि उसके व्यवहार, उसके संस्कार और उसके दिल से परखा जाना चाहिए।


क्योंकि असली संस्कार कपड़ों में नहीं,

व्यवहार में दिखाई देते हैं।


कपड़े तो समय के साथ बदल जाते हैं,

लेकिन इंसान का साफ दिल और सच्ची सोच ही उसकी असली पहचान होती है।




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