संस्कार या संपत्ति?
शाम ढल रही थी।
आरती जब अपने मायके से लौटकर ससुराल पहुँची, तो दरवाज़े पर ही उसे अजीब सा सन्नाटा महसूस हुआ।
बरामदे में सास कमला देवी और बड़ी जेठानी सरिता बैठी थीं। दोनों की नजरें सीधे उसी पर टिक गईं। चेहरों पर हल्की मुस्कान थी — लेकिन वह अपनापन वाली नहीं, ताने वाली मुस्कान थी।
आरती समझ गई — मायके की खबर यहाँ पहुँच चुकी है।
उसके पिता की तबीयत लंबे समय से खराब थी। पिछले महीने उनका देहांत हो गया था। बारहवें के दिन ही उसके दोनों भाई ज़मीन के बँटवारे को लेकर आपस में भिड़ गए थे। पूरा मोहल्ला तमाशा देख रहा था। आरती उस दिन बहुत रोई थी — पिता के जाने का दुख अलग, और भाइयों का झगड़ा अलग।
आज वही बात उसके ससुराल में मसाला बन चुकी थी।
तानों की शुरुआत...
आरती ने चुपचाप आगे बढ़कर सास के पैर छुए।
कमला देवी ने आशीर्वाद देने के बजाय ताना मारते हुए कहा,
“अरे बहू, तुम्हारे घर तो बड़ा जल्दी बँटवारा हो गया। अभी चिता की राख भी ठंडी नहीं हुई थी और बेटे ज़मीन नापने लगे।”
पास बैठी जेठानी हल्की हँसी दबाते हुए बोली,
“संस्कार तो माँ-बाप ही देते हैं ना… जैसा घर, वैसे बच्चे।”
ये शब्द आरती के कानों में किसी चुभते हुए काँटे की तरह लगे। उसका गला भर आया, आँखें नम हो गईं, लेकिन उसने खुद को संभाल लिया। वह जानती थी — अगर इस समय उसने कुछ भी कहा, तो बात और बढ़ जाएगी।
उसने एक पल के लिए अपने पति दीपक की ओर देखा। शायद वह उसका साथ देंगे… शायद कहेंगे कि ऐसी बात न करें।
लेकिन दीपक चुपचाप खड़े रहे, जैसे यह सब उनसे जुड़ा ही न हो।
आरती बिना कुछ बोले अपने कमरे में चली गई।
रात को खाना खाते समय भी वही विषय छिड़ा रहा। हर बात में उसके मायके का जिक्र, हर शब्द में छिपा ताना।
तभी दीपक भी बोल पड़े,
“सच कहूँ तो मुझे बहुत शर्म आई थी।”
ये सुनते ही आरती का दिल जैसे बैठ गया।
उसे लगा जैसे किसी ने उसके घाव पर नमक छिड़क दिया हो।
वह मन ही मन सोचने लगी —
क्या सचमुच मैं ही दोषी हूँ? क्या अपने घर की गलतियों का बोझ भी मुझे ही उठाना होगा?
उस रात उसे पहली बार एहसास हुआ कि कभी-कभी अपने ही लोग अनजाने में सबसे गहरे घाव दे जाते हैं।
कुछ महीने बाद…
हक या रिश्ते?
समय धीरे-धीरे बीत गया।
घर में बाहर से सब सामान्य दिखाई देने लगा, लेकिन अंदर ही अंदर कई अनकही बातें दबे अंगारों की तरह सुलग रही थीं।
एक दिन अचानक कमला देवी के मायके से फोन आया।
उधर से खबर मिली कि उनके दोनों भाई कर्ज़ में डूबे हुए हैं और मजबूरी में पुश्तैनी घर बेचने का फैसला कर चुके हैं।
वह घर उनके पिता के नाम था। कानूनी रूप से कमला देवी भी उस संपत्ति की बराबर की हिस्सेदार थीं। इसलिए मकान बेचने से पहले उनके दस्तख़त जरूरी थे। उन्हें साइन करने के लिए मायके बुलाया गया।
फोन रखते ही कमला देवी गहरी सोच में डूब गईं।
इतने में दीपक और उसका बड़ा भाई रवि भी वहाँ आ गए।
जैसे ही उन्हें बात पता चली, दोनों लगभग एक साथ बोल पड़े—
“माँ, आप बिना अपना हिस्सा लिए किसी कागज़ पर साइन मत करना।”
कमला देवी ने शांत स्वर में कहा,
“अरे बेटा, वो लोग बड़ी मुश्किल में हैं। कर्ज़ चुकाने के लिए ही तो घर बेच रहे हैं। अगर उन्हें मेरी जरूरत है तो मैं साइन कर दूँगी। आखिर अपने ही तो हैं।”
रवि ने थोड़ी तीखी आवाज़ में कहा,
“अपने हैं तो क्या हुआ माँ? इसका मतलब ये तो नहीं कि आप अपना हक छोड़ दें। आपका भी बराबर का हिस्सा बनता है।”
दीपक ने भी हामी भरी,
“हाँ माँ, आप भावुक मत बनिए। कानूनन जो आपका है, वो लेना ही चाहिए। नहीं तो बाद में पछताना पड़ेगा।”
कमला देवी ने समझाने की कोशिश की,
“बेटा, सब कुछ पैसों से बड़ा नहीं होता। उनके हालात ठीक नहीं हैं। अगर मैं हिस्सा मांगूँगी तो उन पर और बोझ बढ़ जाएगा।”
लेकिन दोनों बेटे अपनी बात पर अड़ गए।
रवि ने साफ शब्दों में कहा,
“देख लीजिए माँ, अगर आपने बिना हिस्सा लिए साइन कर दिए, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। जरूरत पड़ी तो कोर्ट भी जाएंगे। आखिर बात जमीन-जायदाद की है, मजाक नहीं।”
कमला देवी चुप हो गईं।
एक तरफ मायके का अपनापन था, दूसरी तरफ बेटों की जिद।
कमरे में सन्नाटा फैल गया —
जैसे रिश्तों और हक़ के बीच अदृश्य दीवार खड़ी हो गई हो।
असली चेहरा...
संस्कार की असली परीक्षा
जिस दिन कमला देवी अपने मायके से लौटकर आईं, शाम ढल चुकी थी।
दरवाज़ा खुलते ही साफ दिखाई दे रहा था कि उनका चेहरा बुझा हुआ है। आँखों में थकान थी और कदम भी भारी लग रहे थे। रोज़ की तरह उनके चेहरे पर अपनापन नहीं, बल्कि गहरी चिंता छाई हुई थी।
दीपक और रवि तुरंत उनके पास आ गए।
“क्या हुआ माँ? सब ठीक तो रहा?” दीपक ने बेचैनी से पूछा।
कमला देवी ने धीमे स्वर में कहा,
“मैंने कागज़ों पर साइन कर दिए… मुझे कोई हिस्सा नहीं चाहिए। उनके हालात ठीक नहीं हैं। कर्ज बहुत है।”
बस इतना सुनना था कि माहौल बदल गया।
दीपक का चेहरा लाल हो उठा।
“माँ! आप इतनी भोली क्यों बनती हैं? वो लोग आपको भावनाओं में बहाकर बेवकूफ बना रहे हैं!”
रवि भी पीछे नहीं रहा। वह ऊँची आवाज़ में बोला,
“हमारा भविष्य भी तो देखिए! आपका जो हिस्सा था, वो हमारा हक था। ऐसे कैसे छोड़ दिया आपने?”
कमला देवी ने कुछ कहने की कोशिश की, लेकिन शब्द जैसे गले में अटक गए।
उन्होंने सिर्फ इतना कहा,
“बेटा, भाई मुश्किल में हैं… ऐसे समय में साथ नहीं दूँगी तो कौन देगा?”
लेकिन दोनों बेटे सुनने के मूड में नहीं थे।
दीपक झुंझलाकर बोला,
“माँ, दुनिया भावनाओं से नहीं चलती। कल को हमें जरूरत पड़े तो कौन देगा?”
रवि ने भी तीखे स्वर में कहा,
“इतनी बड़ी रकम थी। कम से कम थोड़ा बहुत तो ले लेतीं!”
कमला देवी चुप थीं। उनके हाथ कांप रहे थे। वह कुर्सी पर बैठ गईं और नजरें झुका लीं।
दरवाज़े के पास खड़ी आरती सब सुन रही थी।
उसके मन में जैसे कोई पुराना जख्म फिर से हरा हो गया। उसे वही दिन याद आ गया, जब उसके पिता के बारहवें दिन भाइयों के झगड़े पर पूरे घर ने उसे ताने दिए थे।
“संस्कार नहीं हैं तुम्हारे घर में…”
“कैसे लोग हैं…”
“जायदाद के लिए लड़ पड़े…”
आज वही लोग… वही शब्द… वही लालच…
बस किरदार बदल गए थे।
आरती ने गहरी सांस ली।
उसे समझ आ गया था — जमीन-जायदाद की आग घर-घर में एक जैसी होती है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि जब आग अपने आँगन में लगती है, तब उसकी जलन सच में महसूस होती है।
आरती की हिम्मत...
बहस तेज होती जा रही थी। आवाज़ें ऊँची हो चुकी थीं।
दीपक ने झुंझलाते हुए कहा,
“माँ, आप कुछ समझती ही नहीं हैं।”
आरती अब तक चुप थी, लेकिन इस बार उससे रहा नहीं गया। उसने धीमे मगर साफ स्वर में कहा,
“उस दिन जब मेरे भाइयों ने झगड़ा किया था, तब आप सबको बहुत शर्म आ रही थी। आज ज़रा खुद को देखिए। फर्क सिर्फ इतना है कि वहाँ दो भाई आपस में लड़ रहे थे… और यहाँ बेटे अपनी ही माँ से हिस्सा माँग रहे हैं।”
उसकी बात सुनते ही कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया।
दीपक ने गुस्से भरी नज़र से आरती की तरफ देखा,
“तुम हमारे बीच में मत बोलो।”
आरती ने संयम रखते हुए जवाब दिया,
“मैं बीच में नहीं बोल रही… मैं सिर्फ सच कह रही हूँ। अगर उस दिन मेरे भाइयों का व्यवहार गलत था, तो आज आपका भी सही नहीं है। जमीन-जायदाद ऐसी चीज़ है जो बड़े-बड़े संस्कारों की भी परीक्षा ले लेती है।”
उसकी आवाज़ में न ताना था, न गुस्सा…
बस एक कड़वा लेकिन सच्चा सच था।
एक फैसला...
उस रात कमला देवी की आँखों में नींद नहीं थी।
बिस्तर पर लेटी हुई थीं, लेकिन मन अतीत और वर्तमान के बीच झूल रहा था।
उन्हें अपनी ही कही बातें बार-बार याद आ रही थीं —
“मेरे बेटे तो राम-लक्ष्मण हैं… उनमें कभी झगड़ा नहीं होगा।”
आज वही बेटे जायदाद के लिए बहस कर रहे थे।
दिल के किसी कोने में चुभन सी हो रही थी।
क्या सच में समय इंसान की नीयत बदल देता है?
या फिर हालात ही असली चेहरा दिखा देते हैं?
सुबह होते ही उन्होंने मन मजबूत किया।
दोनों बेटों — दीपक और रवि — को अपने कमरे में बुलाया।
दोनों चुपचाप आकर बैठ गए।
माँ के चेहरे की गंभीरता देखकर उन्हें अंदाजा हो गया था कि बात साधारण नहीं है।
कमला देवी ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा —
“अगर संपत्ति ही रिश्तों से बड़ी लगने लगी है, तो बेहतर है कि आज ही सब साफ कर दिया जाए।
मेरे जीते जी ही बँटवारा होगा।
ताकि आगे चलकर कोई भाई-भाई से न लड़े…
और किसी बहू को अपने मायके के नाम पर ताने न सुनने पड़ें।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
दोनों बेटों की नजरें झुक गईं।
उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि यह सिर्फ जमीन का सवाल नहीं था —
यह उनके संस्कारों की परीक्षा थी।
उन्हें समझ आ गया था —
मामला पैसों का कम, आईने का ज्यादा था।
अंत में…
कुछ महीनों बाद घर में आपसी सहमति से और कानूनी तरीके से साफ-साफ बँटवारा कर दिया गया।
हर हिस्से का हिसाब लिखित में तय हुआ, ताकि आगे चलकर किसी को कोई शिकायत न रहे।
सबसे बड़ी बात यह रही कि इस बार कोई ऊँची आवाज़ नहीं उठी, कोई तकरार नहीं हुई।
जो फैसला हुआ, समझदारी और शांति से हुआ।
आरती ने मन ही मन महसूस किया —
कभी-कभी सच बहुत कड़वा लगता है, पर वही कड़वा सच रिश्तों को टूटने से बचा लेता है। अगर समय रहते बात साफ हो जाए, तो मन में जहर नहीं पनपता।
एक दिन रसोई में काम करते हुए कमला देवी ने आरती को पास बुलाया। उनकी आँखों में पहले जैसी कठोरता नहीं, बल्कि अपनापन था।
उन्होंने आरती को गले लगाते हुए कहा,
“बहू, उस दिन तूने जो कहा था, वो बिल्कुल सही था। संपत्ति से बड़ा संस्कार होता है। अगर घर में समझ और इज़्ज़त बनी रहे, तो वही सबसे बड़ी दौलत है।”
उस दिन आरती को लगा —
शायद यह घर अब सच में घर बन गया है।
सीख:
जमीन-जायदाद कभी भी रिश्तों से बड़ी नहीं होनी चाहिए,
क्योंकि संपत्ति तो पीढ़ी दर पीढ़ी बँटती रहती है,
लेकिन एक बार रिश्ते टूट जाएँ,
तो उन्हें फिर से जोड़ पाना अक्सर बहुत मुश्किल हो जाता है।

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