चाय में चीनी कम थी

A woman standing inside an Indian temple courtyard looking at her elderly parents sitting under a tree during evening light.


सुबह के साढ़े पाँच बजे थे।


अलार्म बजने से पहले ही राधिका की नींद खुल चुकी थी।

कमर में हल्का दर्द था, लेकिन आदत बन चुकी थी—दर्द से पहले ज़िम्मेदारियाँ जाग जाती थीं।


रसोई में जाकर उसने चूल्हा जलाया।

दूध चढ़ाया।

आटा गूंथने लगी।


ड्राइंग रूम से सास कमला देवी की आवाज़ आई—

“बहू, आज चाय में अदरक डाल देना। कल बिल्कुल फीकी थी।”


राधिका ने हल्के से कहा—

“जी मांजी।”


उसका पति नितिन अभी सो रहा था।

वह जानती थी—नितिन को सुबह की चाय बहुत पसंद है।

थोड़ी सी एक्स्ट्रा चीनी डाल दी उसने।


नाश्ता बनाकर सबको परोसा गया।


कमला देवी ने चाय का घूंट लिया और तुरंत कप नीचे रख दिया—

“ये क्या है? इतनी मीठी चाय! कौन पिएगा ये?”


राधिका कुछ बोल पाती उससे पहले ही ससुर हरिशंकर जी बोले—

“अरे रहने दो, कभी-कभी मीठी चाय पी लेने में क्या जाता है।”


कमला देवी ने तीखी नज़र से राधिका को देखा—

“मायके में यही सब सीखाया है?

यहां सब अपनी मर्जी से नहीं चलता।”


राधिका चुप रही।

नितिन ने भी कुछ नहीं कहा।

वह अख़बार पढ़ते हुए चाय पीता रहा।


राधिका को सबसे ज़्यादा वही चुप्पी चुभती थी।


काम समेटकर वह अपने कमरे में आकर बैठ गई।

कमरा खामोश था, लेकिन मन में शोर था।


आँखें अपने-आप भर आईं।


उसे अपना मायका याद आ गया—

वहाँ कोई हिसाब नहीं होता था,

न स्वाद का, न पसंद-नापसंद का।


जब भी वह चाय बनाती थी,

पापा मुस्कुराकर बस इतना कहते—

“बेटी, जैसी तुम्हें अच्छी लगे, वैसी बना।

चाय तो बस बहाना है,

हमें तो तेरे साथ बैठना अच्छा लगता है।”


यह याद आते ही

उसका गला भर आया,

और आँसू बिना आवाज़ किए

गालों पर उतर आए।



शाम को नितिन ऑफिस से घर लौटा।

थकान उसके चेहरे पर साफ़ झलक रही थी।


राधिका चुपचाप उसके पास आकर खड़ी हो गई।

काफी देर तक कुछ नहीं बोली,

फिर बहुत धीमे से कहा—


“आप… कभी मांजी के सामने मेरे लिए क्यों नहीं बोलते?”


नितिन ने एक गहरी साँस ली।

थके हुए स्वर में बोला—


“तुम समझती क्यों नहीं हो, राधिका।

मां की उम्र हो गई है।

अब इस उम्र में उन्हें बदला नहीं जा सकता।”


राधिका की आँखें भर आईं।

आवाज़ काँपते हुए निकली—


“तो फिर मैं क्या हूँ, नितिन?

क्या मैं हर बार चुप रहने के लिए ही यहाँ आई हूँ?”


नितिन ने उसकी तरफ देखा,

कुछ कहना चाहा…

लेकिन शब्द साथ नहीं आए।


वह बिना कुछ बोले दूसरी तरफ मुँह फेरकर बैठ गया।


और उस खामोशी ने

राधिका को

सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाई।



कुछ दिन बाद राधिका की माँ का फोन आया।

आवाज़ पहले जैसी नहीं थी—थकी हुई, काँपती हुई।


“बेटी… तेरे पापा की तबीयत ठीक नहीं है।

डॉक्टर को दिखाना है।”


राधिका का दिल बैठ गया।

उसने तुरंत सास से मायके जाने की बात कही।


कमला देवी ने बिना सोचे कहा—

“अभी?

घर का काम कौन करेगा?

तेरे ससुर की दवा, मेरा खाना—सब कुछ तो तू ही संभालती है।

दो दिन से ज़्यादा मत रुकना।”


राधिका ने कुछ नहीं कहा।

मन पर पत्थर रखकर दो दिन के लिए मायके चली गई।


लेकिन जैसे ही वह घर पहुँची,

उसके कदम वहीं रुक गए।


घर सूना पड़ा था।

न माँ… न पापा।


घबराकर उसने पड़ोसन से पूछा।


पड़ोसन ने भारी आवाज़ में बताया—

“बेटी, तेरे भाई ने घर बेच दिया है।

कर्ज़ बहुत बढ़ गया था।

माँ-बाप को शहर से बाहर किसी जगह छोड़ आया।”


यह सुनते ही राधिका की आँखों के सामने अँधेरा छा गया।

उसके हाथ से बैग छूट गया

और दिल—

जैसे वहीं टूट कर गिर पड़ा।



बिना कुछ बोले

वह सीधे उसी मंदिर की ओर चल पड़ी।


वही पुराना मंदिर—

जहाँ बचपन में पापा उसकी उँगली पकड़कर लाया करते थे।

जहाँ घंटियों की आवाज़ में

उसे हमेशा सुरक्षा का एहसास होता था।


मंदिर के एक कोने में

उसकी नज़र रुक गई।


वहाँ उसके माँ-पापा बैठे थे।


कमज़ोर शरीर,

थकी हुई आँखें,

और चुपचाप एक-दूसरे का सहारा बने हुए।


उसे देखते ही माँ फूट-फूट कर रो पड़ी—

“बेटी, तू परेशान मत हो।

हम कहीं न कहीं खुद को संभाल लेंगे।”


राधिका का दिल जैसे भीतर से टूट गया।


वह चाहकर भी उन्हें अपने साथ नहीं ले जा सकी।

क्योंकि वह जानती थी—

जिस घर में उसकी अपनी कोई क़द्र नहीं,

उस घर में उसके माँ-बाप की इज़्ज़त कैसे बची रहेगी?



रात को घर लौटकर

राधिका बहुत देर तक चुपचाप बैठी रही।


उसकी आँखें सूजी हुई थीं,

और मन में उथल-पुथल चल रही थी।


नितिन ने उसकी हालत देख कर धीरे से पूछा—

“क्या बात है? सब ठीक तो है?”


यह सुनते ही राधिका का संयम टूट गया।

वह फूट-फूट कर रो पड़ी।


टूटे हुए शब्दों में,

रुक-रुक कर

उसने मायके की पूरी बात नितिन को बता दी—

माँ-पापा की हालत,

घर छिन जाने का दर्द,

और उनका अकेलापन।


कुछ पल चुप रहने के बाद

उसने काँपती आवाज़ में पूछा—

“क्या हम उन्हें कुछ समय के लिए

अपने साथ नहीं रख सकते?”


उसकी आँखों में उम्मीद थी,

डर भी… और भरोसा भी।


लेकिन नितिन ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह बिना कुछ कहे

करवट बदल कर लेट गया।


कमरे में सन्नाटा फैल गया—

इतना भारी

कि राधिका को अपनी साँसों की आवाज़ भी

चुभने लगी।


कुछ दिन बाद

राधिका फिर उसी मंदिर पहुँची।


इस बार

वह पेड़ खाली था,

जहाँ उसके माता–पिता रोज़ बैठा करते थे।


दिल घबरा उठा।


उसने पास बैठे पुजारी से पूछा—

“पंडित जी, यहाँ जो बुज़ुर्ग दंपति रोज़ आते थे…

क्या आपको कुछ पता है?”


पुजारी ने ध्यान से उसे देखा और बोले—

“तू राधिका है ना?”


वह चौंकी।

“जी… आपको कैसे पता?”


पुजारी ने जेब से एक काग़ज़ निकालते हुए कहा—

“तेरे पिता यह पता देकर गए थे।

कह गए थे—

‘अगर मेरी बेटी आए, तो उसे दे देना।’”


काग़ज़ हाथ में लेते ही

राधिका की उंगलियाँ काँपने लगीं।


वह तुरंत उस पते पर पहुँची।


एक छोटा-सा, लेकिन सलीके से बना घर था।

दरवाज़ा खुला हुआ था।


अंदर कदम रखते ही

उसकी नज़र सोफे पर गई।


उसके माँ-पापा वहाँ बैठे थे—

शांत, सुरक्षित और मुस्कुराते हुए।


“माँ… पापा…”

राधिका की आवाज़ भर्रा गई।


“ये सब कैसे?”

वह बस इतना ही पूछ पाई।


तभी माँ ने उसे पास बैठाते हुए कहा—

“बेटी, यह घर नितिन ने दिलवाया है।”


राधिका ने हैरानी से माँ की ओर देखा।


माँ बोली—

“उसने कहा—

‘आप बेटी के घर नहीं,

अपने बेटे के घर रहेंगे।’

और किसी को इसकी खबर भी नहीं होने दी।”


राधिका की आँखों से आँसू बह निकले।


आज पहली बार

उसे लगा—

कुछ रिश्ते

बिना बोले भी

बहुत कुछ कह जाते हैं।



रात को राधिका ने नितिन से धीमे स्वर में पूछा—

“आपने ये सब क्यों किया?”


नितिन कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—

“क्योंकि तुम्हारे माँ-बाप मेरे लिए भी माँ-बाप ही हैं।

और हर बार बोल जाना ही सही नहीं होता…

कभी-कभी चुप रहकर जिम्मेदारी निभाना ज़्यादा ज़रूरी होता है।”


उसी समय पीछे से कमला देवी की आवाज़ आई—

“बहू, कल से चाय में ज़रा कम चीनी डालना,

डायबिटीज़ बढ़ गई है।”


फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ उन्होंने जोड़ा—

“और हाँ…

अब तेरी बनाई चाय मुझे सच में अच्छी लगने लगी है।”


राधिका के होंठों पर एक धीमी-सी मुस्कान फैल गई—

आज पहली बार, दिल से।


क्योंकि

कुछ रिश्तों में

मिठास

अचानक नहीं आती,

वह

वक़्त लेकर

धीरे-धीरे

घुलती है।





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