फाइल नंबर 27 और एक अधूरी शादी
नेहा नोएडा की एक आईटी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर थी।
सुबह के सात बजे थे।
मोबाइल अलार्म से पहले ही उसकी आँख खुल चुकी थी।
किचन में चाय रखते हुए उसकी माँ — सुधा जी — बोलीं,
“नेहा, आज फिर जल्दी निकलना है क्या?”
नेहा लैपटॉप बैग बंद करते हुए मुस्कराई,
“हाँ मम्मी, क्लाइंट कॉल है। आज रिलीज़ डे है।”
पापा — मोहन लाल — अख़बार रखते हुए बोले,
“बेटा, ज़िंदगी सिर्फ ऑफिस नहीं होती।”
नेहा कुछ कहती, उससे पहले ही फोन बज उठा।
“आई एम ऑन द वे,” कहकर वह निकल गई।
नेहा के ऑफिस निकलते ही घर में एक अजीब-सा सन्नाटा छा गया।
सुधा जी ने रसोई समेटी, हाथ पोंछे और फिर कुछ सोचते हुए अपनी ननद को फोन मिला दिया।
“दीदी, अब और इंतज़ार नहीं हो रहा,” उनकी आवाज़ में चिंता साफ़ झलक रही थी।
“लड़की तीस की हो गई है। कोई अच्छा-सा रिश्ता देखो अब।”
उधर से आवाज़ आई,
“लेकिन भाभी, नेहा तो शादी की बात आते ही मना कर देती है।”
सुधा जी ने हल्की-सी लंबी साँस ली,
“यही तो परेशानी है। आजकल के बच्चे काम में ऐसे उलझे रहते हैं कि उन्हें खुद नहीं पता उन्हें ज़िंदगी में क्या चाहिए।
इसलिए बड़े होकर हमें ही उनके लिए फैसले लेने पड़ते हैं।”
कुछ दिनों बाद नेहा के लिए एक रिश्ता आया।
लड़के का नाम अमन था।
वह दिल्ली की एक कंसल्टिंग फर्म में काम करता था—
पढ़ा-लिखा, समझदार और स्वभाव से शांत।
पहली ही मुलाकात में नेहा ने बिना किसी झिझक के साफ कह दिया,
“मैं अपनी नौकरी नहीं छोड़ सकती।
और कई बार मेरा काम मेरी निजी ज़िंदगी से भी ऊपर हो सकता है।”
अमन ने उसकी बात ध्यान से सुनी,
फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला,
“जो इंसान अपने काम से प्यार करता है,
वह ज़िम्मेदार भी होता है।
और ऐसी ज़िम्मेदारी का सम्मान किया जाना चाहिए।”
नेहा को पहली बार लगा
कि सामने बैठा इंसान उसे बदलना नहीं,
समझना चाहता है।
यहीं से उनकी बात आगे बढ़ी।
शादी की तारीख तय हो गई — ठीक तीन महीने बाद।
इसी दौरान नेहा की कंपनी को एक बड़ा सरकारी प्रोजेक्ट मिला।
यह प्रोजेक्ट डेटा माइग्रेशन से जुड़ा था, जिसमें देशभर के कई अस्पतालों का पूरा सिस्टम आपस में जोड़ा जाना था।
काम बहुत संवेदनशील था।
मरीजों की रिपोर्ट, इलाज का रिकॉर्ड और इमरजेंसी डेटा — सब कुछ उसी पर निर्भर था।
कंपनी मैनेजमेंट ने बिना देर किए इस पूरे प्रोजेक्ट की ज़िम्मेदारी नेहा को सौंप दी।
यह उसके करियर का अब तक का सबसे बड़ा इम्तिहान था।
एक शाम सुधा जी ने धीरे से कहा,
“बेटा, अब शादी में बस पंद्रह दिन बचे हैं।
अब तो ऑफिस से छुट्टी ले ले।”
नेहा ने थकी हुई आँखों से माँ की ओर देखा।
आवाज़ में मजबूरी थी—
“मम्मी, इस वक्त अगर मैंने प्रोजेक्ट छोड़ दिया,
तो सब कुछ बिगड़ जाएगा।”
मोहन लाल ने अख़बार किनारे रखते हुए समझाया,
“बेटा, शादी ज़िंदगी का बहुत बड़ा मौका होता है।”
यह सुनते ही नेहा की आँखें भर आईं।
उसने धीमी लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा—
“पापा, अगर यह सिस्टम फेल हो गया
तो हज़ारों मरीजों का डेटा रुक जाएगा।
सिर्फ मेरी नौकरी नहीं,
बहुत से लोगों की उम्मीदें दांव पर हैं।”
कमरे में एक पल के लिए खामोशी छा गई।
शादी से एक दिन पहले घर में रस्मों की धूम थी।
आँगन में औरतों की हँसी गूँज रही थी,
ढोलक की थाप पर गीत चल रहे थे।
नेहा के हाथों में मेहंदी लग रही थी,
लेकिन उसकी नज़र बार-बार मोबाइल की स्क्रीन पर जा रही थी।
फोन कान से लगाते हुए वह धीमे स्वर में बोली,
“नहीं… बैकअप सर्वर बंद मत करना।
हाँ, मैं अभी लॉग-इन कर रही हूँ।
डेटा एक भी फाइल मिस नहीं होना चाहिए।”
मेहंदी वाली ने उसके हाथ रोक दिए,
“बहू, ज़रा हाथ सीधा रखो।”
नेहा ने माफी भरी मुस्कान दी
और फिर से फोन में उलझ गई।
सुधा जी यह देख कर खुद को रोक नहीं पाईं।
झुँझलाहट और चिंता मिले स्वर में बोलीं,
“बेटी, एक दिन तो सब कुछ भूल जा।
ज़िंदगी में हर बार ऐसा मौका नहीं आता।”
नेहा ने कुछ नहीं कहा।
उसकी आँखें मोबाइल पर थीं,
लेकिन मन में तूफ़ान चल रहा था।
वह जानती थी—
आज अगर उसने काम छोड़ा,
तो किसी और की ज़िंदगी रुक सकती है।
और इसी सोच में
वह चुपचाप सब सहती रही।
शादी का दिन था।
मंडप फूलों से सजा हुआ था।
ढोल की थाप के बीच बारात आ चुकी थी।
फेरों से ठीक पहले नेहा का मोबाइल फिर बज उठा।
उसने स्क्रीन देखी तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
धीमे स्वर में वह बोली,
“डेटा क्रैश हो गया है…”
उसकी नजर अमन से मिली।
आँखों में घबराहट थी।
“मुझे काम करना पड़ेगा,” उसने कहा।
अमन कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने उसका हाथ थाम लिया।
“मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
नेहा मंडप के एक कोने में बैठ गई।
लैपटॉप खोला।
टीम वीडियो कॉल पर जुड़ गई।
निर्देश चलते रहे।
कोड बदले गए।
बैकअप चेक हुआ।
एक घंटा बीत गया…
फिर दूसरा।
पंडित जी ने घड़ी देखी और बोले,
“मुहूर्त निकलता जा रहा है।”
अमन के पिता का धैर्य टूट गया।
वे तेज़ आवाज़ में बोले,
“ये क्या तमाशा चल रहा है?”
नेहा उठकर खड़ी हुई।
उसकी आवाज़ में घबराहट नहीं, ठहराव था।
“अगर आज ये सिस्टम ठीक नहीं हुआ,
तो हजारों लोगों की रिपोर्ट हमेशा के लिए खो जाएगी।
मेरी शादी रुक सकती है…
लेकिन मैं किसी की जिंदगी रुकते नहीं देख सकती।”
पूरा मंडप एकदम शांत हो गया।
कुछ देर बाद स्क्रीन पर हरा संकेत चमका।
“सर्वर रिस्टोर हो गया है।”
नेहा ने राहत की सांस ली।
लैपटॉप बंद किया।
अमन के पिता आगे बढ़े।
उनकी आवाज़ अब नरम थी।
“बेटी, आज समझ आया कि जिम्मेदारी क्या होती है।
तुम सिर्फ मंडप में नहीं…
अब हमारे दिल में बैठ चुकी हो।”
नेहा की आँखें भर आईं।
मंडप में फिर से शहनाइयों की आवाज़ गूंज उठी।
फेरे पूरे हुए।
मंत्रों की गूंज के बीच
नेहा और अमन एक नए रिश्ते में बंध गए।
शादी की सारी रस्में शांति से संपन्न हो गईं।
रात के सन्नाटे में,
जब घर की भीड़ छँट चुकी थी
और आँगन में हल्की-सी ठंड उतर आई थी—
सुधा जी ने नेहा को अपने सीने से लगा लिया।
आवाज़ भर्रा गई,
“माफ कर देना बेटा…
हमें तुम्हें समझने में बहुत देर लग गई।”
नेहा की आँखें नम हो गईं।
उसने माँ के कंधे पर सिर रख दिया।
हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“शादी से पहले मुझे डर था मम्मी…
आज लगता है, मैंने ज़िंदगी का सबसे सही फैसला किया है।”
सुधा जी ने उसके बाल सहलाए।
उस पल, माँ और बेटी—
दोनों के मन हल्के हो चुके थे।

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