खामोश कुर्सी
शादी का घर था।
ढोलक की थाप चल रही थी,
और आँगन में लोग ऐसे घूम रहे थे जैसे सबके पास कोई न कोई ज़िम्मेदारी हो—
सिवाय मेरे।
मैं कुर्सी पर बैठा था।
प्लास्टिक की वही पुरानी कुर्सी—
जिसकी एक टाँग थोड़ी टेढ़ी थी।
पत्नी बार-बार रसोई और आँगन के बीच चक्कर लगा रही थी।
कभी किसी को पानी दे रही,
कभी किसी का बैग पकड़ रही।
मैंने धीरे से कहा—
“लगता है अब हमारे दिन सच में निकल गए हैं।”
पत्नी ने बिना मेरी तरफ़ देखे जवाब दिया—
“अब नए लोग हैं… नए रिश्ते। हम बस नाम के रिश्तेदार रह गए हैं।”
शादी मेरे भांजे की थी।
घर उसका, भीड़ उसकी,
और मैं…
बस मामा।
सुबह से किसी ने पूछा नहीं—
“चाय लेंगे?”
“थक गए होंगे।”
जब मेरे बेटे की शादी थी,
तो यही लोग सबसे आगे थे।
मैंने खुद खड़े होकर
हर रिश्तेदार को महत्व दिया था—
क्योंकि मुझे लगता था
इज्जत लौटकर इज्जत बन जाती है।
पर यहाँ…
इज्जत कहीं रास्ता भटक गई थी।
बारात का समय...
बारात निकलने लगी।
मैंने अपने आप मान लिया था—
भाई साहब मेरे साथ बैठेंगे।
मैंने गाड़ी स्टार्ट भी नहीं की थी कि देखा—
वो तो पहले ही
अपने समधियों के साथ दूसरी गाड़ी में बैठ चुके थे।
मेरी गाड़ी में आकर
तीन बुज़ुर्ग बैठा दिए गए—
जिनका शादी से उतना ही लेना-देना था
जितना मेरी उस कुर्सी का।
मैं कुछ नहीं बोला।
बस शीशा ऊपर कर लिया।
स्टेज के सामने...
स्टेज पर बुलावा आया।
सब जा रहे थे—
मुस्कुराते, हाथ जोड़ते।
मैं नहीं गया।
पत्नी ने आँखों से पूछा—
“चलो?”
मैंने सिर हिला दिया—
“नहीं।”
उस पल मैंने तय कर लिया था—
जहाँ इज्जत न हो,
वहाँ आशीर्वाद भी बोझ बन जाता है।
सुबह का नाश्ता...
सुबह नाश्ते की प्लेट मेरे सामने रख दी गई।
प्लेट में
बस दो बेसन के लड्डू थे—
सूखे, बिना खुशबू के।
थोड़ी दूरी पर लगी मेज़ पर
काजू बर्फी सजी थी,
पनीर रोल रखे थे,
और गिलासों में जूस चमक रहा था।
पत्नी ने मेरी तरफ़ देखे बिना,
धीमी आवाज़ में कहा—
“छोड़ो… खा लो।”
मैंने प्लेट की तरफ़ देखा,
फिर नज़रें फेर लीं।
प्लेट वैसी ही पड़ी रही—
और मेरा मन,
उससे कहीं ज़्यादा भारी हो चुका था।
विदाई...
मैंने गाड़ी स्टार्ट की।
पत्नी बिना कुछ कहे आकर चुपचाप सीट पर बैठ गई।
तभी पीछे से भाई दौड़ते हुए आए।
एक हाथ में साड़ी थी,
दूसरे हाथ में पारदर्शी पॉलीथीन की थैली।
थैली के भीतर
चार बेसन के लड्डू
और दो पेठे साफ़ दिखाई दे रहे थे।
मैंने थैली लेने के लिए हाथ नहीं बढ़ाया।
वह हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गई।
आसपास खड़े लोग देखते रह गए,
लेकिन किसी के मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला।
मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी।
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ठीक है — मैं उसी भाव को रखते हुए, लेकिन भाषा को थोड़ा और साफ़, संतुलित और असरदार बना देता हूँ।
न ज़्यादा भारी, न बनावटी — बस दिल से निकली हुई लगे।
रास्ते में...
पत्नी रोई नहीं।
उसकी आँखों में आँसू नहीं थे,
बस थकान थी।
कुछ देर खामोशी रही।
गाड़ी की आवाज़ और सड़क की लंबी लकीरें
हमारे बीच पसरी चुप्पी को और गहरा कर रही थीं।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“इतना गुस्सा क्यों करते हो?”
मैंने सड़क से नज़र हटाए बिना कहा—
“क्योंकि मैं इंसान हूँ।
पत्थर नहीं।
हर अपमान चुपचाप सह लूँ—
इतनी हिम्मत मुझमें नहीं।”
वो कुछ नहीं बोली।
बस खिड़की के बाहर देखने लगी।
उस दिन के बाद
मैं उस घर फिर कभी नहीं गया।
रिश्ते शायद वहीं रह गए,
लेकिन
अपना स्वाभिमान
मेरे साथ लौट आया।
आज भी कभी-कभी सोचता हूँ—
क्या मैं गलत था?
शायद रिश्तों की किताब में हाँ।
पर अपने स्वाभिमान की किताब में—नहीं।
क्योंकि
हर इंसान के भीतर
एक कुर्सी होती है।
अगर उस पर बार-बार
कोई बैठने भी न दे—
तो आदमी
खड़ा होकर चला जाना ही सीख लेता है।

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