ममता का नया आसमान
नेहा हर दिन की तरह सुबह जल्दी उठी। उसने अपने छह साल के बेटे आरव को स्कूल के लिए तैयार किया और खुद भी ऑफिस जाने की तैयारी करने लगी। नेहा एक बैंक में मैनेजर थी। उसका जीवन व्यवस्थित था, लेकिन अंदर कहीं एक खालीपन भी था।
उस दिन जब वह ऑफिस के बाहर कार से उतरी, तभी एक दुबली-पतली सी लड़की ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मम्मी, आप मुझे लेने क्यों नहीं आईं?”
नेहा चौंक गई। उसने हाथ छुड़ाते हुए कहा, “बेटी, मैं तुम्हारी मम्मी नहीं हूँ।”
तभी सिक्योरिटी गार्ड दौड़ता हुआ आया।
“मैडम, माफ कीजिए। यह बच्ची रोज यहाँ आ जाती है। आप अंदर जाइए।”
नेहा अंदर तो चली गई, पर उसका मन वहीं अटक गया।
बच्ची की कहानी...
दोपहर में नेहा ने गार्ड से पूछा, “वो बच्ची कौन है?”
गार्ड ने गहरी साँस ली।
“मैडम, उसका नाम पायल है। उसकी माँ यहीं पास की कॉलोनी में काम करती थी। कुछ महीने पहले बीमारी से उसकी मौत हो गई। पिता रिक्शा चलाते हैं, पर शराब पीते हैं। बच्ची को सही से संभाल नहीं पाते। पायल अक्सर यहाँ आकर काम करने वाली औरतों को अपनी माँ समझ लेती है।”
नेहा का दिल भर आया।
“क्या वो स्कूल जाती है?”
“नहीं मैडम। ज़्यादातर सड़क पर ही रहती है।”
एक दर्दनाक खबर...
दो दिन तक पायल कहीं दिखाई नहीं दी। नेहा का मन बार-बार बेचैन हो उठता। तीसरे दिन जब वह ऑफिस पहुँची तो सीधे गार्ड के पास गई।
“भैया, पायल आज भी नहीं आई? कहीं कुछ हुआ तो नहीं?” उसने चिंता भरे स्वर में पूछा।
गार्ड ने गंभीर होकर कहा,
“मैडम… कल उसके पिता ने उसे बहुत मारा। वो डर और दर्द सह नहीं पाई और बेहोश हो गई। मोहल्ले के लोगों ने दया करके उसे अस्पताल में भर्ती कराया है।”
यह सुनते ही नेहा के हाथ काँपने लगे। उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
“क… कौन से अस्पताल में?” उसने घबराते हुए पूछा।
गार्ड ने तुरंत अस्पताल का नाम और पता बता दिया।
नेहा एक पल भी रुकी नहीं। वह जल्दी से अपनी कार में बैठी और सीधे अस्पताल की ओर निकल पड़ी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और दिमाग में बस पायल का मासूम चेहरा घूम रहा था।
अस्पताल में मुलाकात...
सरकारी अस्पताल के एक साधारण से वार्ड में पायल सफेद चादर पर चुपचाप बेहोश पड़ी थी। उसके माथे पर पट्टी बंधी थी और हाथ में सलाईन लगी हुई थी। नेहा धीरे-धीरे उसके पास जाकर बैठ गई। उसने काँपते हाथों से पायल के बालों को सहलाया। उसका दिल दर्द से भर उठा।
कुछ देर बाद पायल की उंगलियाँ हल्की सी हिलीं। उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं। धुंधली नजरों से सामने देखा और बहुत धीमी आवाज में बोली—
“मम्मी… आप आ गईं?”
नेहा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने झुककर प्यार से उसका हाथ थाम लिया और बोली—
“हाँ बेटा, मैं आ गई हूँ। अब मैं यहीं हूँ, तुम्हारे पास।”
तभी पीछे से कदमों की आहट हुई। नेहा के पति रोहित भी वहाँ पहुँच गए थे। नेहा ने फोन पर उन्हें सब कुछ बता दिया था। रोहित ने आगे बढ़कर पायल के सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और नरम आवाज में कहा—
“डरने की कोई बात नहीं है, बेटा। अब तुम अकेली नहीं हो।”
पायल ने नेहा का हाथ कसकर पकड़ लिया, जैसे उसे फिर से खो देने का डर हो। नेहा ने उसे सीने से लगा लिया। उस पल एक अनकहा रिश्ता और भी गहरा हो गया।
नेहा और रोहित कई दिन तक अस्पताल आते रहे। डॉक्टर ने बताया कि पायल अब खतरे से बाहर है।
रोहित ने कहा,
“नेहा, अगर तुम चाहो तो हम इसे अपने घर ला सकते हैं।”
नेहा ने बिना सोचे कहा,
“हाँ, मैं इसे छोड़ नहीं सकती।”
कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई। पायल के पिता से बात की गई। कुछ कागज़ी कार्यवाही के बाद उन्होंने बच्ची को नेहा और रोहित की देखभाल में देने की सहमति दे दी।
नया घर, नया नाम...
जब पायल पहली बार उनके घर आई तो वह बहुत सहमी हुई थी। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था। वह चुपचाप दरवाज़े के पास खड़ी सब कुछ देख रही थी, जैसे समझने की कोशिश कर रही हो कि अब उसके साथ क्या होने वाला है।
नेहा धीरे-धीरे उसके पास गई। उसने प्यार से उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने गले से लगा लिया।
“डर मत बेटा,” नेहा ने नरम आवाज़ में कहा, “अब यह तुम्हारा अपना घर है। यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होगी।”
पायल ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दी।
आरव भी बहुत खुश था। वह दौड़कर आया और बोला,
“मम्मी, अब मेरी एक बहन भी है! हम साथ में खेलेंगे और मैं इसे अपनी सारी चीज़ें दिखाऊँगा।”
घर का माहौल प्यार और अपनापन से भर गया।
कुछ दिनों बाद परिवार ने एक छोटा सा पूजा कार्यक्रम रखा। घर में दीप जलाए गए, फूलों से सजावट की गई। सबने मिलकर भगवान से प्रार्थना की कि बच्ची का जीवन खुशियों से भर जाए।
उस दिन नेहा और रोहित ने प्यार से उसका नया नाम रखा — आर्या।
आर्या ने जब अपना नया नाम सुना तो उसकी आँखों में चमक आ गई। उस दिन से उसे सिर्फ नया नाम ही नहीं, बल्कि एक नया परिवार, नया घर और नई ज़िंदगी मिल गई।
सच्ची ममता...
समय धीरे-धीरे अपने कदम बढ़ाता रहा। आर्या अब रोज़ स्कूल जाने लगी थी। पहले जो चेहरा हमेशा डर और उदासी से भरा रहता था, अब उसी चेहरे पर खिलखिलाती मुस्कान रहने लगी थी। उसकी आँखों में फिर से सपने लौट आए थे।
एक शाम पढ़ाई करते-करते वह अचानक नेहा के पास आकर बैठ गई। कुछ पल चुप रही, फिर धीमे स्वर में बोली—
“मम्मी… आप मुझे कभी छोड़कर तो नहीं जाएँगी ना?”
उसकी आवाज़ में छुपा डर साफ महसूस हो रहा था।
नेहा ने तुरंत उसे अपनी बाँहों में भर लिया। उसके सिर पर हाथ फेरते हुए प्यार से बोली—
“नहीं बेटा, माँ अपने बच्चों को कभी नहीं छोड़ती। अब तुम हमेशा हमारे साथ रहोगी।”
आर्या ने राहत की साँस ली और नेहा से लिपट गई।
पास खड़े रोहित यह दृश्य देखकर मुस्कुरा उठे। उन्होंने आगे बढ़कर दोनों के सिर पर हाथ रखा और कहा—
“अब हमारा परिवार सच में पूरा हो गया है।”
उस पल घर में सिर्फ सुकून, अपनापन और सच्चे रिश्तों की गर्माहट थी।
सीख:
ममता का रिश्ता केवल खून से नहीं जुड़ता, वह दिल की गहराइयों से जन्म लेता है।
जहाँ सच्चा अपनापन और निस्वार्थ प्रेम होता है, वहीं असली संबंध बनते हैं।
किसी के जीवन में दिया गया थोड़ा सा स्नेह और साथ उसकी पूरी दुनिया बदल सकता है।

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