छुपा हुआ सच

 

Young Indian woman sitting alone at a wedding reception while guests dance in the background, emotional social illustration about family misunderstanding.


गर्मियों की हल्की शाम थी।

आँगन में तुलसी के पास दिया जल रहा था। घर में शादी के बाद की हलचल अभी भी बाकी थी।


“आराध्या बहू, तुमने इतनी सिंपल साड़ी क्यों पहनी है?”

सासू माँ कमला देवी ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा।


“और ये क्या? हील्स की जगह फ्लैट चप्पल? आज शर्मा जी के बेटे की रिसेप्शन पार्टी है!”


आराध्या हल्का सा मुस्कुराई,

“माँजी, हील में मुझसे चला नहीं जाता… और भारी कपड़ों में मुझे घुटन होती है।”


बगल में खड़ी जेठानी मीरा चुपचाप सब देख रही थी।

उसे कुछ दिनों से आराध्या के व्यवहार में बदलाव दिख रहा था।


शादी को अभी डेढ़ महीना हुआ था।

लेकिन आराध्या ज़्यादा थकी-थकी रहने लगी थी।

मिठाइयों से दूरी… मसालेदार खाने से परहेज़… और हर समय हल्के कपड़े।



बढ़ता हुआ शक...


रिसेप्शन हॉल रोशनी से जगमगा रहा था।

तेज़ म्यूज़िक बज रहा था।

स्टेज के सामने सभी रिश्तेदार और मेहमान हँसते-गाते डांस कर रहे थे।


लेकिन उसी भीड़ से थोड़ा दूर, एक कोने में आराध्या चुपचाप कुर्सी पर बैठी थी।

उसके हाथ में जूस का गिलास था, जिसे वह धीरे-धीरे घूंट-घूंट पी रही थी।


“अरे बहू, तुम डांस क्यों नहीं कर रही?” एक चाचीजी ने हँसते हुए पूछा।


आराध्या ने हल्की मुस्कान लाने की कोशिश की,

“बस… थोड़ा सिर भारी लग रहा है।”


उसकी आवाज़ में थकान साफ झलक रही थी।


उधर मीरा की नज़र बार-बार आराध्या पर जा रही थी।

उसे कुछ अलग सा महसूस हो रहा था।


जब आराध्या उठकर खड़ी हुई, तो साड़ी के पल्लू के नीचे उसके पेट पर हल्की सी उभार दिखाई दी।

बहुत ज़्यादा नहीं… पर इतनी कि ध्यान देने वाला देख सके।


मीरा का दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया।


“ये…?”


उसने तुरंत नज़रें हटा लीं, लेकिन दिमाग में वही तस्वीर घूमती रही।


उस रात मीरा बिस्तर पर तो लेट गई,

पर आँखों में नींद नहीं थी।


पंखे की आवाज़ के बीच उसके मन में सवालों का शोर गूंज रहा था—


“क्या आराध्या…?”


क्या वो वही सोच रही है जो सच हो सकता है?

या ये सिर्फ उसका वहम है?


उसके मन में शक और डर का तूफान उठ चुका था।



अचानक चक्कर...


कुछ दिनों बाद की बात है।


सुबह का समय था। रसोई में हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। चाय चढ़ी हुई थी और आराध्या सबके लिए नाश्ता तैयार कर रही थी।


अचानक उसे लगा जैसे उसके कानों में आवाज़ें दूर से आ रही हों। आँखों के आगे धुंध-सी छा गई। उसने काउंटर का सहारा लेने की कोशिश की, लेकिन हाथ फिसल गया।


अगले ही पल वह ज़मीन पर गिर पड़ी।


“अरे बहू!” कमला देवी की घबराई हुई आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।


सब लोग दौड़ते हुए रसोई में पहुँचे। ससुर जी ने तुरंत उसे उठाकर सोफे पर लिटाया।


घर में रखा बीपी मशीन जल्दी से निकाला गया। ससुर जी ने काँपते हाथों से उसका ब्लड प्रेशर चेक किया।


“अरे… इसका बीपी तो बहुत लो है,” उन्होंने चिंता भरी आवाज़ में कहा।


कमला देवी घबराकर बोलीं,

“इतनी कमजोरी क्यों है तुम्हें? ठीक से खाती-पीती भी हो या नहीं?”


आराध्या ने मुश्किल से आँखें खोलीं। होंठ सूख रहे थे। धीमी आवाज़ में बोली,

“कुछ नहीं माँजी… बस थोड़ा कैल्शियम की कमी है। डॉक्टर ने कहा था… नॉर्मल है।”


उसने बात को हल्का दिखाने की कोशिश की, लेकिन उसके चेहरे की पीली पड़ती रंगत सच्चाई बयान कर रही थी।


मीरा एक कोने में खड़ी सब देख रही थी। उसकी नज़र दवाइयों की तरफ गई जो पिछले दिनों उसने आराध्या के कमरे में देखी थीं।


उसे यह बात बिल्कुल भी सामान्य नहीं लगी।


“सिर्फ कैल्शियम की कमी से कोई इस तरह बेहोश नहीं होता…”


उसके मन में शक की गाँठ और गहरी हो गई।



छुपी हुई रिपोर्ट...


उस दिन दोपहर का समय था।

घर के बाकी लोग सो रहे थे। माहौल बिल्कुल शांत था।


मीरा को लगा — यही सही मौका है।


धीरे-धीरे कदम रखते हुए वह आराध्या के कमरे में गई।

दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर हल्की सी खुशबू थी और कमरा सलीके से सजा हुआ था।


उसने अलमारी खोली।


ऊपरी खाने में कुछ दवाइयाँ रखी थीं — आयरन की गोलियाँ, फोलिक एसिड, मल्टीविटामिन…


मीरा के हाथ रुक गए।


“ये तो वही दवाइयाँ हैं…”

उसके दिमाग में अपनी प्रेगनेंसी के दिन घूम गए।

उसी तरह की दवाइयाँ डॉक्टर ने उसे भी दी थीं।


उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।


“क्या सच में…?”


घबराहट और जिज्ञासा दोनों बढ़ते जा रहे थे।


अब उसकी नज़र अलमारी के अंदर बने छोटे से लॉकर पर पड़ी।

कुछ पल वह यूँ ही खड़ी रही… जैसे खुद को रोकना चाहती हो।

लेकिन शक ने उसे आगे बढ़ा दिया।


काँपते हाथों से उसने लॉकर खोला।


अंदर एक फाइल रखी थी।


मीरा ने फाइल खोली —

और सामने थी एक सोनोग्राफी रिपोर्ट।


उसकी आँखें सीधे उस लाइन पर जाकर रुकीं —


गर्भावस्था: 12 सप्ताह (तीन महीने)


मीरा का गला सूख गया।


“तीन महीने…?”


उसने तारीख फिर से देखी।

रिपोर्ट पर साफ लिखा था — तीसरा महीना चल रहा है।


“लेकिन शादी को तो अभी डेढ़ महीना ही हुआ है…”


उसके हाथ से फाइल लगभग छूट ही गई।


कमरे की दीवारें जैसे घूमने लगीं।

उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।


“तो क्या… ये बच्चा…?”


मीरा की साँसें तेज़ हो गईं।

अब उसके मन में सिर्फ एक ही सवाल था —


सच क्या है?


पार्क का सच...


अगले दिन सुबह से ही मीरा सतर्क थी।

उसे अंदेशा था कि आराध्या कहीं न कहीं जरूर जाएगी।


दोपहर होते ही आराध्या घर से यह कहकर निकली कि वह अपनी सहेली से मिलने जा रही है।

मीरा ने चुपचाप उसका पीछा करना शुरू कर दिया।


थोड़ी दूर पर एक छोटा सा पार्क था।

वहीं एक बेंच पर आराध्या किसी युवक से मिल रही थी।


वह लड़का गंभीर आवाज़ में कह रहा था —

“तुम ज़्यादा तनाव मत लो… सब ठीक हो जाएगा। मैं हूँ ना तुम्हारे साथ।”


आराध्या चुपचाप सिर झुकाए उसकी बातें सुन रही थी।

उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।


दूर खड़ी मीरा ने यह सब देखा।

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।


उसने तुरंत अपने मोबाइल से उनकी कुछ तस्वीरें खींच लीं।


अब उसके मन में कोई संदेह नहीं बचा था।

वह भीतर ही भीतर बुदबुदाई —


“मुझे तो पहले ही शक था…

आराध्या ने सचमुच घर को धोखा दिया है।”



घर में तूफान...


शाम का समय था।

घर के हॉल में सभी लोग बैठे थे। माहौल सामान्य था, लेकिन मीरा के चेहरे पर अजीब सी कठोरता थी।


अचानक उसने अपना फोन टेबल पर रख दिया और हाथ में पकड़ी फाइल सबके सामने खोल दी।


“माँजी… पहले ये देख लीजिए।”


कमला देवी ने चश्मा ठीक किया।

ससुर जी भी आगे झुक गए।


मीरा की आवाज़ इस बार तेज थी—


“ये आपकी बहू की सोनोग्राफी रिपोर्ट है… और इसके अनुसार ये तीन महीने की प्रेग्नेंट है।”


जैसे किसी ने घर की हवा खींच ली हो।

एक पल में हॉल में सन्नाटा छा गया।


कमला देवी के हाथ कांपने लगे।

चेहरा बिल्कुल सफेद पड़ गया।


“तीन… महीने?” उन्होंने बमुश्किल शब्द निकाले।

“लेकिन शादी को तो अभी डेढ़ महीना भी नहीं हुआ…”


उनकी नजर सीधे आराध्या पर टिक गई।


“ये बच्चा किसका है?”


आराध्या की आँखें भर आईं।

होठ काँप रहे थे।

वो कुछ कहना चाहती थी… पर शब्द गले में अटक गए।


आँसू उसके गालों पर बहने लगे।


उसी क्षण मुख्य दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई।


सभी की निगाहें उधर मुड़ गईं।


दरवाज़े पर रोहन खड़ा था।


सूटकेस हाथ में… चेहरा गंभीर… आँखों में बेचैनी।


“रोहन?” कमला देवी चौंक गईं।

“तुम तो अगले महीने आने वाले थे!”


रोहन धीरे-धीरे अंदर आया।

उसने कमरे का माहौल देखा… रिपोर्ट देखी… आराध्या के आँसू देखे।


वो कुछ क्षण चुप खड़ा रहा।


फिर सबकी तरफ देखकर शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में बोला—


“माँ… ये बच्चा मेरा है।”


एक पल को समय जैसे ठहर गया।


मीरा की आँखें फैल गईं।

कमला देवी की उंगलियाँ कुर्सी के हत्थे पर जकड़ गईं।

ससुर जी स्तब्ध थे।


पूरा कमरा एकदम शांत हो गया।


सिर्फ आराध्या की सिसकियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।


रोहन आगे बढ़ा…

आराध्या के पास खड़ा हो गया… और उसके कांपते हाथ को थाम लिया।


अब जो सच सामने आने वाला था, वो पूरे घर की सोच बदलने वाला था।



असली कहानी...


रोहन और आराध्या कॉलेज के दिनों से ही एक-दूसरे को पसंद करते थे।

दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें खुद भी ठीक से पता नहीं चला।


लेकिन एक बड़ी समस्या थी —

दोनों के परिवार लव मैरिज के सख्त खिलाफ थे।

घरवालों का साफ कहना था कि शादी वही होगी, जहाँ वे तय करेंगे।


इसी बीच एक दिन उन्हें पता चला कि आराध्या माँ बनने वाली है।

यह खबर उनके लिए खुशी से ज्यादा डर लेकर आई।


“अगर हमने शादी से पहले घरवालों को सच बता दिया, तो वे कभी नहीं मानेंगे,”

रोहन ने घबराते हुए कहा था।


दोनों जानते थे कि उनके परिवार परंपराओं को बहुत महत्व देते हैं।

उन्हें डर था कि कहीं गुस्से में घरवाले रिश्ता ही न तोड़ दें।


काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक फैसला लिया —

वे तुरंत शादी करेंगे, लेकिन सच फिलहाल छुपाएंगे।


रोहन ने घरवालों को मनाने के लिए कुंडली मिलवाई।

सब कुछ इस तरह किया गया जैसे यह पूरी तरह से तय की गई अरेंज मैरिज हो।

धीरे-धीरे दोनों परिवार मान गए और शादी हो गई।


जहाँ तक पार्क में दिखे उस लड़के की बात थी —

वह कोई और नहीं, बल्कि रोहन का बचपन का दोस्त अर्जुन था।


रोहन के काम के सिलसिले में बाहर जाने के बाद,

अर्जुन ही आराध्या का ध्यान रख रहा था।

उसे डॉक्टर के पास ले जाना, समय पर दवाइयाँ दिलवाना और हौसला देना —

वह सिर्फ एक सच्चे दोस्त की तरह अपना फर्ज निभा रहा था।


असल में, जो बात सबको धोखा लगी,

वह सिर्फ डर और मजबूरी की वजह से छुपाया गया सच था।



माँ का फैसला...


कमला देवी का चेहरा अभी भी सख्त था। उनकी आँखों में नाराज़गी साफ झलक रही थी।


“शादी से पहले प्रेग्नेंट बहू… हमारे घर की परंपरा में ऐसा कभी नहीं हुआ,”

उन्होंने भारी आवाज़ में कहा।


कमरे में सन्नाटा छा गया।


तभी ससुर जी ने धीमे लेकिन ठहराव भरे स्वर में कहा,

“गलती हुई है… लेकिन बच्चा तो हमारा ही खून है। उसे कैसे ठुकरा सकते हैं?”


मीरा की नज़र झुक गई। उसके मन में ग्लानि थी।

“मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई… मैंने बिना पूरी बात जाने आराध्या पर शक किया। मुझे उसे समझना चाहिए था।”


रात भर कमला देवी करवटें बदलती रहीं।

एक तरफ समाज का डर… दूसरी तरफ अपने बेटे और आने वाले बच्चे का ख्याल।


सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी।

कमला देवी रसोई में गईं। चुपचाप देसी घी में हलवा बनाया।

फिर थाली हाथ में लेकर धीरे-धीरे आराध्या के कमरे की ओर बढ़ीं।


दरवाज़ा हल्के से खोला।


आराध्या बिस्तर पर चुपचाप बैठी थी, आँखें सूजी हुई थीं।


कमला देवी उसके पास आकर बैठ गईं।

थाली उसकी ओर बढ़ाते हुए बोलीं —


“बहू… जो हो गया, उसे बदला नहीं जा सकता।

अब ये बच्चा हमारे घर की खुशखबरी है।

तुम्हें अपना और बच्चे का पूरा ध्यान रखना होगा।”


आराध्या की आँखों से आँसू ढलक पड़े।

कंपकंपाती आवाज़ में उसने पूछा —


“माँजी… क्या आपने मुझे सच में माफ कर दिया?”


कमला देवी ने हल्के से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा —


“समय बदल गया है बहू।

रिश्ते निभाना ज़्यादा ज़रूरी है, लोगों की बातें नहीं।

घर तब ही घर होता है, जब हम एक-दूसरे का साथ दें।”


उस पल पहली बार आराध्या को लगा —

वह इस घर में सचमुच अपनाई गई है।



दिन धीरे-धीरे बीतते गए।

देखते ही देखते आराध्या का सातवाँ महीना लग गया।


अब घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था।

जहाँ पहले फुसफुसाहट और शक था, वहाँ अब हँसी और उत्साह था।


गोदभराई की तैयारी ज़ोरों पर थी।

आँगन में रंगोली बनी थी, दीवारों पर हल्की सजावट थी, और रसोई से मिठाइयों की खुशबू आ रही थी।


ढोलक की थाप गूँज रही थी।

मोहल्ले की औरतें गा रही थीं —


“लाली आए घर हमारे…”


मीरा बड़े प्यार से आराध्या को सजा रही थी।

उसके हाथों में चूड़ियाँ पहनाते हुए बोली —


“अब तू अकेली नहीं है… हम सब तेरे साथ हैं।

तेरी हर खुशी अब हमारी है।”


आराध्या की आँखें नम हो गईं,

लेकिन इस बार वो आँसू डर के नहीं, अपनापन मिलने के थे।


कमला देवी भी पास बैठी थीं।

उन्होंने आराध्या के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा —


“बहू, अपना ध्यान रखना। अब तू सिर्फ हमारी बहू नहीं… इस घर की आने वाली माँ है।”


घर में पहली बार सच्ची शांति और अपनापन महसूस हो रहा था।



कुछ महीनों बाद…


एक सुबह घर में किलकारी गूँजी।


आराध्या ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया था।


रोहन की आँखों में खुशी के आँसू थे।

मीरा दौड़कर मिठाई बाँटने लगी।


कमला देवी ने नन्ही सी बच्ची को गोद में उठाया।

उसके छोटे-छोटे हाथों को चूमते हुए बोलीं —


“ये हमारी खुशियों की नई शुरुआत है…

इस घर की लक्ष्मी आई है।”


घर में फिर से हँसी लौट आई।

जो घर कभी शक और डर से भरा था,

आज वहाँ प्यार, अपनापन और नए जीवन की रोशनी थी।



संदेश:


कभी-कभी सच छुपाने की वजह धोखा देना नहीं,

बल्कि डर और हालात होते हैं।


रिश्ते शक की दीवारों पर नहीं,

भरोसे की नींव पर टिके रहते हैं।


और जब परिवार साथ खड़ा हो जाए,

तो बड़ी से बड़ी गलती भी माफ की जा सकती है।




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