सपनों की उड़ान
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। आरव अपने कमरे में बैठा गिटार की प्रैक्टिस कर रहा था। आज उसके स्कूल में संगीत प्रतियोगिता थी, और वह पहली बार मंच पर गाने वाला था।
माँ ने रसोई से आवाज़ लगाई,
“आरव, जल्दी तैयार हो जाओ! हमें समय पर स्कूल पहुँचना है।”
आरव ने गिटार एक तरफ रखा और तैयार होने लगा। तभी उसकी नज़र अपने दादाजी पर पड़ी, जो बरामदे में पुराने रेडियो को ठीक करने की कोशिश कर रहे थे। उनके हाथ थोड़े काँप रहे थे, लेकिन चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी।
आरव बाहर आया और बोला,
“दादाजी, आप भी चलिए ना मेरी प्रतियोगिता देखने!”
दादाजी ने हल्के से सिर हिलाया,
“नहीं बेटा, वहाँ भीड़ होगी। मैं यहाँ से ही तुम्हारे लिए दुआ करूँगा।”
आरव ने पापा से कहा,
“पापा, दादाजी क्यों नहीं चल रहे?”
पापा बोले,
“बेटा, उन्हें चलने में दिक्कत होती है। वहाँ सीढ़ियाँ हैं, भीड़ है। उन्हें परेशानी होगी।”
आरव कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“पापा, जब मैं छोटा था और गिटार सीख रहा था, तो दादाजी ही मेरे साथ बैठते थे। अगर आज वे नहीं आएँगे, तो मेरा गाना अधूरा रहेगा।”
माँ-पापा एक-दूसरे को देखने लगे। आखिर पापा ने कहा,
“ठीक है, हम दादाजी को साथ ले चलेंगे।”
आरव खुशी से उछल पड़ा। उसने दादाजी के लिए साफ़ कुर्ता निकाला, उनकी चप्पल ठीक की और उनका हाथ पकड़कर कार तक ले गया।
रास्ते भर दादाजी खिड़की से बाहर देखते रहे। उनकी आँखों में चमक थी।
स्कूल पहुँचे तो बच्चे और शिक्षक सब तैयारी में लगे थे। आरव हर थोड़ी देर में दादाजी के पास जाकर पूछता,
“सब ठीक है ना?”
आखिर उसकी बारी आई। वह मंच पर पहुँचा। माइक हाथ में लिया और बोला,
“आज का गाना मैं अपने दादाजी को समर्पित करता हूँ। जब मुझे सुर समझ नहीं आते थे, तब इन्होंने धैर्य सिखाया। इन्होंने मुझे सिखाया कि संगीत सिर्फ आवाज़ नहीं, दिल की भावना है।”
सबकी नज़रें दादाजी की ओर मुड़ गईं। उनकी आँखें नम थीं।
आरव ने गाना शुरू किया। उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास था। हर सुर साफ़ था, हर शब्द में भावना थी। गाते-गाते उसने दादाजी की ओर देखा। दादाजी मुस्कुराते हुए ताल दे रहे थे।
गाना खत्म होते ही पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मंच पर आए और बोले,
“बेटा, तुम्हारी आवाज़ में सच्चाई है। हम चाहते हैं कि तुम हमारे संगीत अकादमी में आकर सीखो। और अगर संभव हो, तो अपने दादाजी को भी साथ लाना — ऐसे मार्गदर्शक हर संस्था के लिए सम्मान होते हैं।”
पापा की आँखें भर आईं। उन्होंने दादाजी का हाथ पकड़कर कहा,
“पिताजी, आज समझ आया कि आप हमारे लिए कितने ज़रूरी हैं।”
घर लौटते समय दादाजी बोले,
“बेटा, उम्र बढ़ने से इंसान बेकार नहीं होता। बस उसे प्यार और साथ की ज़रूरत होती है।”
कुछ महीनों बाद आरव अकादमी जाने लगा। दादाजी भी साथ जाते। वे बच्चों को पुराने गीतों की कहानियाँ सुनाते और आरव नए गाने सीखता।
एक दिन दादाजी ने मुस्कुराकर कहा,
“आरव, तुम्हारे कारण मुझे फिर से जीने का मौका मिला।”
आरव ने उनका हाथ पकड़कर कहा,
“दादाजी, यह तो बस हमारी जोड़ी की शुरुआत है।”
सीख:
जब हम अपने बुज़ुर्गों को सम्मान और साथ देते हैं, तो हमारा परिवार मजबूत बनता है।
परिवार की असली ताकत प्यार, सम्मान और एक-दूसरे के साथ चलने में होती है।

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