खामोश दीवारों से बाहर

Confident Indian woman standing in a modern creative studio with warm lighting, symbolizing independence and self-respect.



सर्दियों की कड़वी रात थी।

घड़ी में दो बज रहे थे।


शहर के पुराने हिस्से में स्थित त्रिपाठी परिवार का मकान आधा अंधेरे में डूबा था। अगले दिन घर में पूजा रखी गई थी, इसलिए दिनभर चहल-पहल रही थी। अब सब थककर सो चुके थे।


तभी अचानक गेट पर किसी ने जोर से दस्तक दी।


पहली बार में किसी ने ध्यान नहीं दिया।

दूसरी बार आवाज़ और तेज़ हुई।


घर के बड़े बेटे निखिल की नींद खुली। उसने खिड़की से झाँककर देखा। बाहर एक औरत खड़ी थी, सिर पर दुपट्टा, हाथ काँप रहे थे।


निखिल ने पापा धर्मेंद्र जी को जगाया।

दोनों नीचे आए।


“कौन?” धर्मेंद्र जी ने पूछा।


बाहर से टूटी हुई आवाज़ आई —

“पापा… मैं हूँ…”


दरवाज़ा खुला।


सामने उनकी बेटी आरती खड़ी थी।


चेहरे पर चोट के निशान, होंठ फटे हुए, और आँखों में सूखा हुआ डर।


माँ कमला जी भी नीचे आ गईं।

“हे भगवान! ये क्या हाल बना रखा है?”


आरती अंदर आई और चुपचाप दीवार से टिककर बैठ गई।

कुछ देर तक सिर्फ उसकी साँसों की आवाज़ सुनाई देती रही।


फिर उसने धीमे से कहा —

“अब वापस नहीं जाऊँगी।”



आरती की शादी को पाँच साल हो चुके थे। उसका पति राहुल शहर में अपना छोटा-सा बिज़नेस चलाता था। शुरू के साल ठीक थे, फिर धीरे-धीरे उसका स्वभाव बदलने लगा।


राहुल को गुस्सा जल्दी आता था।

व्यापार में घाटा हुआ तो वह सारा दोष आरती पर डाल देता।


“तुम मनहूस हो… तुम्हारे आने के बाद ही सब खराब हुआ,” वह कहता।


पहले शब्दों से चोट पहुँचाता,

फिर हाथ उठाने लगा।


आरती हर बार खुद को ही दोष देती।

उसे लगता, शायद गलती उसी की है…

शायद अगर वह थोड़ा और सह ले, थोड़ा और समझौता कर ले,

तो एक दिन राहुल सच में बदल जाएगा।


लेकिन उस रात बात हद से आगे बढ़ गई।


राहुल ने शराब के नशे में उसे धक्का दिया। वह सीढ़ियों से गिरते-गिरते बची।

सास चुप खड़ी देखती रही।


आरती ने पहली बार खुद को आईने में देखा —

डरी हुई, टूटी हुई।


उसी पल उसने तय कर लिया — अब बस।


घर में सब सुन रहे थे।

धर्मेंद्र जी की भौंहें तनी हुई थीं।


“पति-पत्नी में झगड़ा होता रहता है,” उन्होंने कठोर स्वर में कहा।

“घर छोड़कर आना ठीक नहीं।”


आरती ने शांत आवाज़ में पूछा —

“अगर आज मैं गिर जाती… और कुछ हो जाता… तब भी यही कहते पापा?”


कमरा सन्न हो गया।


कमला जी की आँखों में आँसू थे, पर वे चुप थीं। समाज का डर उन्हें बाँधे हुए था।



अगले दिन राहुल का फोन आया।


“उसे समझाइए। गुस्से में निकल गई है।”


धर्मेंद्र जी ने कहा, “कुछ दिन बाद खुद आ जाएगी।”


लेकिन आरती अब पहले वाली नहीं थी।


उसने अपने पुराने दस्तावेज निकाले।

डिग्री, मार्कशीट, ट्रेनिंग सर्टिफिकेट।


शादी से पहले वह एक ग्राफिक डिज़ाइनर थी।

शादी के बाद राहुल ने कहा था — “घर संभालो, नौकरी की जरूरत नहीं।”


आरती ने दोबारा ऑनलाइन काम शुरू किया।

धीरे-धीरे उसे छोटे प्रोजेक्ट मिलने लगे।


घर में सबको लगा —

“ये कुछ दिन का गुस्सा है।”


पर आरती ने वकील से भी संपर्क कर लिया।



कुछ हफ्तों बाद एक दोपहर अचानक गेट पर गाड़ी रुकने की आवाज़ आई।

दरवाज़ा खुला और राहुल बिना सूचना दिए घर के अंदर आ गया।


उसके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था।


“बहुत हो गया ये सब,” उसने ऊँची आवाज़ में कहा,

“चलो, सामान उठाओ और घर चलो। ये नाटक अब बंद करो।”


बैठक में सन्नाटा छा गया।


आरती धीरे-धीरे अपने कमरे से बाहर आई।

चेहरा शांत था, लेकिन आँखों में अजीब सी दृढ़ता थी।


वह सीधे राहुल के सामने आकर खड़ी हो गई।


“मैं कहीं नहीं जा रही,” उसने साफ और स्थिर आवाज़ में कहा।


राहुल हँस पड़ा,

“तुम्हें लगता है तुम अकेले जी पाओगी? ये गुस्सा दो दिन में उतर जाएगा।”


आरती ने उसकी आँखों में देखते हुए जवाब दिया,

“ये गुस्सा नहीं है… ये फैसला है।”


राहुल का चेहरा तमतमा उठा।

“फैसला? किस बात का फैसला?”


आरती ने बिना आवाज़ ऊँची किए कहा,

“मैंने घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कर दी है। कानूनी कार्रवाई शुरू हो चुकी है।”


कमरे में जैसे हवा थम गई।


राहुल एक पल के लिए स्तब्ध रह गया।

“तुम… तुम मुझे कोर्ट में घसीटोगी?”


“मैं किसी को घसीट नहीं रही,” आरती बोली,

“मैं सिर्फ अपने साथ हुए अन्याय का जवाब मांग रही हूँ। अब मैं डरकर नहीं जीऊँगी।”


धर्मेंद्र जी अब तक चुप थे।

उन्होंने पहली बार बेटी की तरफ गौर से देखा।


उन्हें उसमें वह डरी हुई लड़की नहीं दिखी,

बल्कि एक मजबूत और आत्मविश्वासी स्त्री दिखाई दी।


राहुल ने इधर-उधर देखा, जैसे समर्थन खोज रहा हो,

पर इस बार घर में कोई उसकी तरफ नहीं था।


“ठीक है,” उसने दाँत भींचते हुए कहा,

“देखता हूँ कितना आगे जाती हो।”


वह तेज़ कदमों से बाहर निकल गया।


दरवाज़ा बंद हुआ,

लेकिन इस बार आरती के भीतर कोई डर बंद नहीं हुआ—

बल्कि एक नया साहस जन्म ले चुका था।


मामला अदालत पहुँचा।

सच सामने आया।


राहुल को काउंसलिंग और कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ा।

आख़िरकार दोनों का अलगाव हो गया।


आरती ने किराए पर छोटा-सा स्टूडियो लिया।

वहीं से अपना डिज़ाइनिंग काम करने लगी।


धीरे-धीरे उसका नाम बनने लगा।


एक दिन कमला जी उसके स्टूडियो पहुँचीं।

दीवारों पर उसके बनाए पोस्टर लगे थे।

रंगों से भरी दुनिया।


“बेटी…” कमला जी ने कहा,

“हमें माफ़ कर दे। हम डर गए थे।”


आरती मुस्कुराई।

“डर तो मुझे भी लगता था माँ… पर अब नहीं।”



कुछ साल बाद जब लोग उससे पूछते,

“आरती, तुम्हारा तलाक क्यों हुआ?”


वह हल्की-सी मुस्कान के साथ शांत स्वर में जवाब देती—


“तलाक इसलिए हुआ क्योंकि मैंने अपने आत्मसम्मान को मरने नहीं दिया।

मैंने रिश्ते को बचाने की बहुत कोशिश की,

लेकिन खुद को खोकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जाता।

मैंने घर नहीं छोड़ा… मैंने बस अपनी पहचान बचा ली।”



सीख:


कभी-कभी घर की चार दीवारें

सुरक्षा का एहसास नहीं देतीं,

बल्कि एक अनदेखी कैद बन जाती हैं।


और जब कोई स्त्री

अपने डर की जंजीरें तोड़कर

हिम्मत से पहला कदम बाहर रखती है,


तो वह केवल अपनी तक़दीर नहीं बदलती—

वह समाज की सोच का आईना भी बदल देती है।




No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.