अधूरा साथ
शाम का समय था।
आसमान पर हल्की धूप की आखिरी किरणें ठहर-सी गई थीं।
“कविता… मेरी बात तो सुनो!”
रोहन बार-बार पुकार रहा था, लेकिन कविता बिना पीछे देखे तेज कदमों से आगे बढ़ती जा रही थी।
रोहन सड़क किनारे खड़ा रह गया। कुछ देर बाद वह पास की सीढ़ियों पर बैठ गया। उसके मन में उलझन, दुख और गुस्सा सब एक साथ थे।
कविता घर पहुंचते ही अपने कमरे में चली गई। दरवाजा बंद कर लिया।
उसकी मां, सुमन जी, पीछे-पीछे आईं।
“बेटी, क्या हुआ? रोहन से फिर झगड़ा हुआ क्या?”
“मां, उसका नाम मत लीजिए। मैं अब उससे कभी नहीं मिलूंगी,” कविता ने तकिये में मुंह छिपाते हुए कहा।
सुमन जी समझ गईं कि बात गहरी है। वे चुपचाप बाहर आ गईं।
तभी डोरबेल बजी।
दरवाजे पर रोहन खड़ा था।
“आंटी, क्या मैं कविता से मिल सकता हूं?” उसने धीमे स्वर में पूछा।
सुमन जी ने उसे अंदर बैठाया और बोलीं, “बेटा, पता नहीं क्या हुआ है, बहुत नाराज़ है।”
रोहन कमरे में गया।
कविता ने उसे देखते ही कहा, “चले जाओ यहां से। मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी।”
रोहन ने समझाने की कोशिश की, लेकिन कविता का दिल पत्थर हो चुका था।
जाते-जाते रोहन बस इतना बोला,
“कविता, अगर तुम्हें लगता है कि मैं गलत हूं, तो ठीक है… आज के बाद मैं तुम्हें परेशान नहीं करूंगा।”
उनकी मुलाकात...
कुछ साल पहले…
कविता एक छोटे गांव से शहर आई थी। उसे एक कंपनी में नौकरी का झांसा दिया गया था। लेकिन यहां आकर पता चला कि उसके साथ धोखा हुआ है। पैसे भी चले गए, और नौकरी भी नहीं मिली।
बस स्टैंड पर वह अकेली बैठी रो रही थी।
उसी समय रोहन वहां आया। उसने हाल पूछा।
कविता ने सब सच बता दिया।
रोहन ने कहा,
“अगर आप चाहें तो मेरे घर चल सकती हैं। मेरी मां हैं। सुबह तक रुक जाइए, फिर देखेंगे।”
कविता के पास कोई और रास्ता नहीं था।
रोहन की मां ने उसे बेटी की तरह अपनाया। अगले दिन रोहन ने अपनी कंपनी में बात करके कविता के लिए इंटरव्यू तय कराया। कुछ ही दिनों में उसे नौकरी मिल गई।
कविता की मेहनत रंग लाई। प्रमोशन मिला। सैलरी बढ़ी। उसने नया फ्लैट लिया। मां को भी अपने पास बुला लिया।
धीरे-धीरे रोहन और कविता एक-दूसरे को पसंद करने लगे।
बदलता समय...
समय के साथ कविता का दायरा बढ़ गया।
नई सोसाइटी, नए दोस्त, पार्टियां, नई दुनिया…
रोहन उसी कंपनी में साधारण पद पर काम कर रहा था। वह सीधा-सादा था।
धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरी आने लगी।
एक दिन रोहन ने शादी की बात की।
“कविता, मैं तुम्हारे साथ नया जीवन शुरू करना चाहता हूं।”
कविता ने शांत स्वर में कहा,
“रोहन, अभी मैं शादी नहीं करना चाहती। मुझे अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीनी है।”
रोहन ने दुखी होकर कहा,
“क्या तुम बदल गई हो? क्या अब मैं तुम्हारे लायक नहीं रहा?”
कविता को यह बात चुभ गई।
“मेरी सफलता पर सवाल मत उठाओ,” उसने गुस्से में कहा।
झगड़ा बढ़ गया।
सच्चाई का सामना...
कविता के कुछ नए दोस्त बन गए थे। उनमें से एक था अर्जुन।
अर्जुन हमेशा बहुत मीठी बातें करता। उसकी तारीफ़ करता, उसके सपनों की बात करता और खुद को उसका सच्चा शुभचिंतक बताता। धीरे-धीरे वह कविता के और करीब आने लगा।
कुछ समय बाद अर्जुन ने पैसों की बात छेड़नी शुरू की।
कभी कहता, “एक छोटा-सा बिज़नेस शुरू कर रहा हूं, बस थोड़ी मदद चाहिए।”
कभी कहता, “घर में अचानक परेशानी आ गई है, तुम ही सहारा हो।”
शुरुआत में कविता ने भरोसे में आकर उसकी मदद कर दी। लेकिन यह सिलसिला बढ़ता ही गया। अर्जुन हर कुछ दिनों में कोई न कोई नया बहाना बना लेता।
एक दिन कविता ने साफ मना कर दिया।
उसने शांत स्वर में कहा, “मैं अब और पैसे नहीं दे सकती। हर बार नई कहानी सुनाकर मांगना ठीक नहीं है।”
अर्जुन को यह बात बुरी लग गई। उसने उसी शाम कविता को मिलने के लिए बुलाया और कहा कि जरूरी बात करनी है।
कविता वहां पहुंची तो अर्जुन का व्यवहार बदला हुआ था। उसके चेहरे पर गुस्सा था। वह उल्टा कविता पर ही इल्ज़ाम लगाने लगा—“इतना सब करने के बाद आज तुम मना कर रही हो?”
बात बढ़ी तो उसने बदसलूकी शुरू कर दी। कविता घबरा गई। उसे समझ आ गया कि अर्जुन का असली चेहरा अब सामने है। किसी तरह उसने खुद को छुड़ाया और वहां से भागकर घर पहुंची।
घर आकर वह देर तक रोती रही।
उस दिन उसकी आंखें पूरी तरह खुल गईं।
उसे एहसास हुआ कि जो इंसान सच में अपना होता है, वह कभी स्वार्थ नहीं रखता। उसे रोहन की सादगी, उसकी इज़्ज़त करने वाली बातें और सच्चा साथ याद आने लगा।
अब उसे समझ आया कि दिखावे की मिठास और सच्चे रिश्ते में कितना फर्क होता है।
बहुत देर हो चुकी थी...
कविता रोते-रोते रोहन के घर पहुँची। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
उसने कांपते हाथों से डोरबेल दबाई… लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। दरवाज़ा बंद था और घर सुनसान पड़ा था।
तभी पास वाले पड़ोसी बाहर आए।
उन्होंने कहा,
“बेटी, तुम शायद रोहन को ढूंढ रही हो। वो तो दो दिन पहले ही अपनी मां के साथ दूसरे शहर चला गया। नई नौकरी मिल गई थी उसे।”
यह सुनते ही कविता के चेहरे का रंग उड़ गया। उसके हाथ ठंडे पड़ गए। उसने तुरंत रोहन का नंबर मिलाया…
फोन स्विच ऑफ था।
उसने बार-बार कोशिश की, लेकिन हर बार वही जवाब— ‘यह नंबर इस समय बंद है।’
कुछ दिन यूँ ही बेचैनी में बीत गए। कविता हर पल किसी खबर का इंतज़ार करती रही।
फिर एक दिन सुबह अचानक उसे एक परिचित का फोन आया।
“कविता… हिम्मत रखना। जिस बस से रोहन और उसकी मां जा रहे थे… उसका एक्सीडेंट हो गया। दोनों… अब इस दुनिया में नहीं रहे।”
फोन उसके हाथ से छूट गया।
कविता की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। पैरों तले जमीन जैसे खिसक गई हो। वह वहीं जमीन पर बैठ गई।
जिस इंसान ने मुश्किल समय में उसका हाथ थामा था…
जिसने बिना किसी स्वार्थ के उसे सहारा दिया था…
उसी सच्चे साथ को उसने अपने अहंकार और गलत फैसलों में खो दिया।
अब पछतावे के सिवा उसके पास कुछ भी नहीं बचा था।
कविता ने अपनी मां से कहा,
“मां, चलो वापस गांव चलते हैं। यहां की दिखावे भरी दुनिया ने मुझे अंधा कर दिया।”
दोनों गांव लौट गए।
कविता ने वहां बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
वह हर लड़की को एक बात जरूर सिखाती—
“सफलता अच्छी है, लेकिन रिश्तों की कीमत समझना उससे भी जरूरी है।”
सीख:
कभी-कभी हम बाहरी चमक-दमक और दिखावे की दुनिया में इतने खो जाते हैं कि अपने सच्चे और अपनेपन भरे रिश्तों की कद्र करना भूल जाते हैं।
और जब तक हमें अपनी गलती का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है — क्योंकि कुछ रिश्ते एक बार टूट जाएँ, तो दोबारा पहले जैसे नहीं बन पाते।


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