घमंड का ताज और मेहनत की जीत
रीना अपनी बालकनी में खड़ी होकर कॉफी पी रही थी। सामने वाली खाली पड़ी छोटी-सी कोठरी में कुछ लोग अपना सामान उतार रहे थे और घर में शिफ्ट हो रहे थे।
रीना ने यह दृश्य देखते हुए अपने पति रोहित से कहा,
“देखो ना, हमारी इतनी अच्छी और बड़ी कॉलोनी में ये छोटे शहर के लोग आकर रहने लगे हैं। पता नहीं कैसे रह पाएँगे यहाँ।”
रोहित ने शांत आवाज़ में जवाब दिया,
“सुना है वे लोग गाँव से आए हैं। पति किसान थे और पत्नी सिलाई का काम करती हैं। गाँव में फसल खराब हो गई, इसलिए उन्हें शहर आना पड़ा।”
रीना हल्की हँसी के साथ बोली,
“एक साधारण दर्जी मेरी पड़ोसन? मैं इतनी बड़ी फैशन डिजाइनर हूँ!”
उधर नए घर में रहने वाली महिला का नाम सुनीता था और उसकी बेटी का नाम पायल। दोनों सादगी और मेहनत के साथ अपने छोटे से घर को सजा रही थीं।
दो दुनिया – एक कॉलोनी...
रीना की बेटी रिया हमेशा महंगे और डिजाइनर कपड़े पहनती थी। उसकी माँ का शहर में बहुत बड़ा और मशहूर बुटीक था, जहाँ लोग खास डिजाइन की ड्रेस बनवाने आते थे।
वहीं दूसरी ओर, पायल की माँ सुनीता घर पर ही सिलाई का काम करती थी। वह साधारण कपड़ों को भी अपने हुनर से खूबसूरत बना देती थी।
एक दिन स्कूल में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता की घोषणा हुई।
रिया उत्साहित होकर घर पहुँची और बोली,
“मम्मी, इस बार मेरी ड्रेस सबसे अलग और सबसे सुंदर होनी चाहिए!”
रीना आत्मविश्वास से मुस्कुराते हुए बोली,
“बिल्कुल बेटा! मैं तुम्हारे लिए ऐसी ड्रेस बनाऊँगी कि सबकी नजरें तुम पर ही टिक जाएँगी।”
उधर पायल भी घर आकर अपनी माँ से बोली,
“माँ, आप मेरे लिए भी एक प्यारी-सी ड्रेस बना दो ना।”
सुनीता ने प्यार से उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा,
“बेटी, हमारे पास नए कपड़े खरीदने के पैसे नहीं हैं, लेकिन मैं बची हुई कपड़ों की कतरनों से तुम्हारे लिए कुछ खास और सुंदर जरूर बनाऊँगी।”
प्रतियोगिता का दिन...
प्रतियोगिता का दिन आ गया।
रिया ने अपनी माँ के डिज़ाइन किया हुआ चमकदार गाउन पहना था। वह आत्मविश्वास से भरी हुई थी और उसे पूरा विश्वास था कि इस बार जीत उसी की होगी।
वहीं पायल ने अपनी माँ द्वारा रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़ों से बनाई गई एक सुंदर घेरदार फ्रॉक पहनी थी। ड्रेस भले ही साधारण कपड़ों से बनी थी, लेकिन उसकी कारीगरी और डिजाइन बेहद अनोखा था।
जब पायल स्टेज पर पहुँची, तो पूरे हॉल की नज़रें उसी पर टिक गईं। उसकी सादगी और आत्मविश्वास ने सबका दिल जीत लिया। लोग उसकी ड्रेस की तारीफ करते नहीं थक रहे थे।
कुछ देर बाद परिणाम घोषित हुआ —
पहला स्थान पायल को मिला।
यह सुनते ही पायल की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
रिया को यह देखकर बहुत बुरा लगा। उसे हार की उम्मीद नहीं थी।
रीना को तो उससे भी ज्यादा ठेस पहुँची, क्योंकि उसे अपने घमंड पर पहली बार चोट महसूस हुई।
बढ़ता घमंड...
अब रीना जब भी सुनीता को देखती, उसे ताना मारने से खुद को रोक नहीं पाती थी।
वह अकड़कर कहती,
“सिर्फ सस्ते कपड़े पहन लेने से कोई बड़ा डिजाइनर नहीं बन जाता। डिजाइनर बनने के लिए क्लास और स्टाइल चाहिए।”
सुनीता हर बार उसकी बात सुनकर चुप रह जाती। वह बहस नहीं करती, बस मुस्कुराकर अपने काम में लग जाती।
लेकिन धीरे-धीरे कॉलोनी की महिलाओं ने सुनीता के हुनर को पहचान लिया। वे उसके पास कपड़े सिलवाने आने लगीं।
कम दाम, साफ-सुथरी सिलाई और सुंदर, अलग डिजाइन — यही उसकी पहचान बन गई।
कुछ ही समय में सुनीता का काम इतना बढ़ गया कि लोग खुद उससे समय लेकर कपड़े सिलवाने लगे।
कॉलेज और नया मौका...
समय धीरे-धीरे बीतता गया और देखते ही देखते दोनों लड़कियाँ कॉलेज पहुँच गईं।
कॉलेज में उस वर्ष “भारतीय संस्कृति” थीम पर एक भव्य मॉडलिंग प्रतियोगिता आयोजित होने वाली थी। इस प्रतियोगिता में सभी प्रतिभागियों को साड़ी पहनकर रैंप वॉक करना था।
यह सुनते ही रिया आत्मविश्वास से बोली,
“इस बार तो मैं ही जीतूँगी। आखिर मेरी मम्मी शहर की सबसे बड़ी डिजाइनर हैं।”
वहीं पायल ने बिना किसी दिखावे के अपनी माँ से धीरे से कहा,
“माँ, इस बार भी मैं वही पहनना चाहती हूँ जो आप अपने हाथों से बनाएं। मुझे आपकी बनाई साड़ी पर पूरा भरोसा है।”
मॉडलिंग प्रतियोगिता...
प्रतियोगिता का दिन आ गया।
रिया ने अपनी माँ द्वारा डिज़ाइन की हुई महंगी इंडो-वेस्टर्न स्टाइल की साड़ी पहनी थी। वह आत्मविश्वास से भरी हुई थी और उसे पूरा यकीन था कि इस बार वही जीतेगी।
वहीं पायल ने अपनी माँ के हाथों से बनाई गई रंग-बिरंगी साड़ी पहनी थी। उस साड़ी में भारतीय कला और संस्कृति की सुंदर झलक दिखाई दे रही थी। सादगी के साथ उसमें एक खास नज़ाकत और आकर्षण था।
जब पायल रैंप पर चली, तो उसकी साड़ी की खूबसूरती और उसकी सहज मुस्कान ने सबका दिल जीत लिया। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
कुछ ही देर बाद परिणाम घोषित किया गया —
और विजेता का नाम था… पायल।
उसकी मेहनत, आत्मविश्वास और उसकी माँ की कला ने उसे जीत दिला दी।
रिया की आँखों में आँसू थे। उसका चेहरा उतर गया था।
रीना भी गुस्से और शर्मिंदगी में चुप खड़ी थी।
तभी पायल ने हिम्मत करके जज के पास जाकर विनम्रता से कहा,
“सर, अगर आप मुझे नेशनल लेवल पर मौका देना चाहते हैं, तो मैं चाहूँगी कि रिया को भी साथ ले जाया जाए। वह भी बहुत अच्छी मॉडल है। हम दोनों मिलकर और अच्छा कर सकते हैं।”
यह सुनकर वहाँ मौजूद सभी लोग हैरान रह गए।
रिया ने जब पायल की बात सुनी तो उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह आगे बढ़ी और पहली बार सच्चे मन से पायल को गले लगा लिया।
रीना यह सब देख रही थी। उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा। वह धीरे-धीरे सुनीता के पास गई और नम्र आवाज़ में बोली,
“सुनीता, मैंने हमेशा तुम्हें छोटा समझा। तुम्हारी मेहनत और हुनर को नज़रअंदाज़ किया। लेकिन आज समझ में आया कि असली प्रतिभा पैसे से नहीं, दिल से बनती है। सच कहूँ तो तुम मुझसे भी बेहतर डिजाइनर हो।”
सुनीता मुस्कुराई और शांत स्वर में बोली,
“रीना जी, डिजाइन सिर्फ कपड़ों से नहीं बनते, वो दिल की सच्चाई और मेहनत से बनते हैं। जब दिल साफ हो, तो काम अपने आप खूबसूरत हो जाता है।”
उस दिन से दोनों परिवारों के बीच की दूरियाँ खत्म हो गईं।
घमंड हार गया और इंसानियत जीत गई।
सीख:
घमंड कभी किसी को महान नहीं बनाता।
सच्ची प्रतिभा धन से नहीं, बल्कि मेहनत, लगन और आत्मविश्वास से निखरती है।
बुराई का जवाब बुराई से नहीं, बल्कि अच्छाई और सद्भाव से देना ही सच्ची जीत होती है।

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