दो बहुएँ और एक सच

Young woman cutting vegetables in kitchen while her sister-in-law gives a strict look in an Indian home.


शर्मा परिवार लखनऊ में रहता था। घर में सास सरोज, उनके दो बेटे अमन और रोहन, बड़ी बहू रिया और छोटी बेटी पायल रहती थीं।


रिया शहर की पढ़ी-लिखी, समझदार और तेज़ बोलने वाली लड़की थी। शादी के बाद उसने घर की लगभग सारी जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली थी। बाहर से वह बहुत मीठा व्यवहार करती थी, लेकिन अंदर से थोड़ी चालाक स्वभाव की थी।


पायल कॉलेज में पढ़ती थी। वह सीधी-सादी, शांत और मेहनती लड़की थी। वह पढ़ाई के साथ-साथ घर के कामों में भी हाथ बँटाने की कोशिश करती थी।


एक दिन सुबह रसोई से रिया ने आवाज़ लगाई—


“पायल! जरा यहाँ आओ।”


“जी भाभी?” पायल जल्दी से रसोई में आ गई।


रिया ने सब्ज़ियों की टोकरी उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “ये सब्ज़ियाँ काट दो, और हाँ, बाजार से धनिया भी ले आना। आज मेरा पास्ता खाने का मन है।”


पायल ने धीरे से कहा, “भाभी, आज मेरा एग्ज़ाम है। मुझे थोड़ा पढ़ना है।”


यह सुनते ही रिया ने आँखें तरेरकर कहा, “इतना भी नहीं कर सकती मेरे लिए? क्या मैं इस घर की नौकरानी हूँ?”


रिया की बात सुनकर पायल घबरा गई। उसने कुछ नहीं कहा और चुपचाप सब्ज़ियाँ काटने लगी।



सच्चाई छुपी रही...


रिया अक्सर सास के सामने पायल की झूठी शिकायत करती थी।


वह बनावटी मासूमियत से कहती—

"माँ जी, पायल तो दिन-भर बस फोन चलाती रहती है। घर के काम से तो उसे जैसे कोई मतलब ही नहीं है।"


सरोज जी को रिया पर पूरा भरोसा था। उन्हें लगता था कि रिया कभी गलत नहीं कह सकती।


वे बिना कुछ जाँच-पड़ताल किए पायल को डाँट देतीं—

"पायल, थोड़ा घर के काम में भी ध्यान दिया करो। हर समय मोबाइल ठीक नहीं होता।"


पायल चुपचाप सिर झुका लेती।


उसके मन में बहुत कुछ कहने को होता, लेकिन वह कुछ नहीं बोलती। उसे डर लगता था कि अगर उसने सच बता दिया, तो घर में झगड़ा हो जाएगा और रिश्तों में कड़वाहट आ जाएगी।


इसलिए वह सब कुछ सहकर चुप रहना ही बेहतर समझती थी।



नई बहू का आगमन...


कुछ महीनों बाद रोहन की शादी तय हो गई। लड़की का नाम गौरी था। वह पास के जिले बाराबंकी के एक छोटे से गाँव में पली-बढ़ी थी।


गौरी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन समझदारी और अच्छे संस्कार उसमें कूट-कूटकर भरे थे। बात करने का ढंग इतना मधुर था कि जो भी उससे मिलता, तुरंत अपनापन महसूस करता।


शादी के बाद जब गौरी ने इस घर में कदम रखा, तो सबने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। वह भी पूरे मन से इस नए परिवार में घुलने-मिलने की कोशिश करने लगी।


लेकिन रिया के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसने मन ही मन सोचा—

“अच्छा है, अब एक और लड़की आ गई। घर के काम में हाथ बँटाएगी तो मेरा बोझ कम हो जाएगा।”


गौरी रोज सुबह सबसे पहले उठती। घर की सफाई करती, चाय बनाती, और सास-ससुर का हालचाल पूछती। वह हर काम मुस्कुराकर करती और हर किसी से आदर से बात करती।


एक दिन उसने देखा कि रसोई में पायल अकेले खड़ी आटा गूँध रही है। उसके हाथ आटे से सने थे और माथे पर पसीना था। उधर रिया ड्रॉइंग रूम में आराम से मोबाइल चला रही थी।


गौरी धीरे से रसोई में आई और नरमी से बोली—

“पायल, तुम अकेले ही सारा काम कर रही हो? जेठानी जी मदद नहीं कर रहीं?”


पायल ने हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया—

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं। मुझे आदत है, मैं कर लेती हूँ।”


गौरी ने ध्यान से उसकी आँखों में देखा। मुस्कान तो थी, लेकिन उसमें थकान और छुपा हुआ दर्द साफ दिखाई दे रहा था।


गौरी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन वह समझ गई कि घर में सब कुछ उतना सीधा नहीं है, जितना ऊपर से दिखाई देता है। उसके मन में सवाल उठने लगे—क्या पायल सच में अपनी मर्जी से ये सब कर रही है, या बात कुछ और है?



सच सामने आया...


एक दिन सुबह अचानक सरोज जी की तबीयत बिगड़ गई। उन्हें चक्कर आने लगे और तेज़ सिरदर्द होने लगा। घर में घबराहट फैल गई।


पायल दौड़कर बोली,

“माँ, आपको डॉक्टर के पास ले चलते हैं।”


रिया वहीं खड़ी थी। उसने मोबाइल देखते हुए कहा,

“अभी कैसे जाऊँ? मेरा पार्लर में पहले से अपॉइंटमेंट है। बहुत मुश्किल से टाइम मिला है। तुम लोग ले जाओ।”


सरोज जी ने कुछ नहीं कहा, बस चुप हो गईं।


तभी गौरी आगे बढ़ी।

“माँ जी, आप चिंता मत कीजिए। मैं आपको लेकर चलती हूँ।”


पायल ने तुरंत ऑटो बुलाया और दोनों मिलकर सरोज जी को डॉक्टर के पास ले गईं।


डॉक्टर ने चेकअप किया और दवाइयाँ लिख दीं। जब मेडिकल स्टोर पर बिल बना, तो पायल ने अपने पर्स से पैसे निकालकर दे दिए। गौरी ने धीरे से कहा,

“पायल, मैं दे देती हूँ।”


पायल बोली,

“नहीं भाभी, अभी मेरे पास हैं। बाद में देख लेंगे।”


उसी समय सरोज जी ने उनकी बातें सुन लीं। उन्हें याद आया कि सुबह जब पायल ने रिया से पैसे मांगे थे, तो उसने साफ मना कर दिया था—

“मेरे पास अभी कैश नहीं है, बाद में देखेंगे।”


घर लौटते समय सरोज जी चुप थीं। उनके मन में कई बातें चल रही थीं।


अब उन्हें धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि घर में जो दिखता है, सच शायद वैसा नहीं है।


पायल की खामोशी और गौरी की सच्ची चिंता ने उनके दिल को छू लिया था।



रिया का असली चेहरा...


कुछ दिनों बाद पड़ोस में शादी थी। घर में सब लोग तैयारियों में लगे हुए थे। कपड़े निकालना, गहने देखना, बच्चों को तैयार करना—चारों तरफ हलचल थी।


इसी बीच रिया ने ऊँची आवाज़ में कहा—

"पायल, जरा इधर आओ। मेरे ये कपड़े प्रेस कर दो, मुझे देर हो रही है।"


पायल अपने कमरे में बैठकर पढ़ाई कर रही थी। उसका अगले दिन टेस्ट था। वह धीरे से बाहर आई और बोली—

"भाभी, मेरा कल टेस्ट है। थोड़ा रिविजन बाकी है…"


रिया ने बात काट दी—

"बस पाँच मिनट का काम है। इतना भी नहीं कर सकती क्या?"


तभी पास खड़ी गौरी ने शांत लेकिन साफ़ आवाज़ में कहा—

"दीदी, अगर आपको बुरा न लगे तो आप खुद भी तो प्रेस कर सकती हैं। पायल का सच में कल टेस्ट है, उसे पढ़ने दीजिए।"


रिया का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

"तुम बीच में मत बोलो! जब तुमसे कहा जाएगा तभी बोलना।"


घर में अचानक सन्नाटा छा गया।


लेकिन इस बार सरोज जी दरवाज़े के पास खड़ी सब सुन रही थीं। वे धीरे-धीरे आगे आईं और सख्त आवाज़ में बोलीं—

"बस, रिया! बहुत हो गया। मैंने कई दिनों से सब देखा है, पर आज सब साफ़ सुन भी लिया। पायल कोई नौकरानी नहीं है। और गौरी ने गलत कुछ नहीं कहा।"


रिया चुप खड़ी रह गई।


सरोज जी ने आगे कहा—

"ये घर सबका है। काम भी सब मिलकर करेंगे। अब से किसी पर हुक्म मत चलाना।"


रिया की आँखें झुक गईं।

पहली बार किसी ने उसे इस तरह रोका था।

उसे महसूस हुआ कि आज बात सच में हाथ से निकल चुकी है।



कुछ दिनों तक घर का माहौल बिल्कुल शांत रहा।

पहले जहाँ हर दिन छोटी-छोटी बातों पर तकरार हो जाती थी, अब वहाँ अजीब-सी खामोशी थी।


रिया ने महसूस करना शुरू किया कि उसकी वजह से घर के लोग उससे थोड़ा दूरी बना रहे हैं।

माँ जी उससे कम बात करती थीं, पायल अब उसके सामने सहज नहीं रहती थी, और गौरी भी सम्मान तो करती थी लेकिन पहले जैसा अपनापन नहीं दिखता था।


रिया को पहली बार अपने व्यवहार पर पछतावा हुआ।

उसे समझ आया कि उसने घर पर हुक्म चलाकर सबका दिल दुखाया है।


एक दिन हिम्मत करके वह पायल के कमरे में गई।

पायल किताब लेकर बैठी थी।


रिया धीरे से बोली—

“पायल… क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?”


पायल ने सिर उठाया, “हाँ भाभी, आइए।”


रिया की आवाज़ में इस बार न गुस्सा था, न अहंकार।

वह धीमे से बोली—

“सॉरी पायल… मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया। बिना वजह डाँटा, तुमसे अपने काम करवाए… मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।”


पायल कुछ पल चुप रही, फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली—

“कोई बात नहीं भाभी। अब सब ठीक हो जाएगा। हम फिर से पहले जैसे हो सकते हैं।”


तभी दरवाज़े पर खड़ी गौरी भी अंदर आ गई।

वह प्यार से बोली—

“घर प्यार और सम्मान से चलता है, डर से नहीं। जब हम एक-दूसरे का साथ देंगे, तभी घर सच में घर बनेगा।”


रिया की आँखें भर आईं।

उसने पहली बार सच में अपनापन महसूस किया।


उस दिन से रिया ने बदलने की ठान ली।

अब वह काम बाँटकर करती, पायल की पढ़ाई का ध्यान रखती और गौरी को बहन की तरह मानने लगी।


धीरे-धीरे घर में फिर से हँसी लौट आई। 



कहानी की सीख :


रिश्ते सम्मान और विश्वास से बनते हैं, हुक्म और डर से नहीं।


सच्चाई भले ही देर से सामने आए, लेकिन एक दिन ज़रूर उजागर होती है।


सिर्फ पढ़ाई या शहर में रहना ही समझदारी नहीं होता, असली समझ इंसान के दिल और व्यवहार में होती है।





No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.