नई सुबह की नई राह

Young Indian woman serving morning tea to her family on a rooftop during sunrise


सीमा की शादी को अभी दो महीने ही हुए थे। वह एक छोटे से शहर की रहने वाली थी। उसे बचपन से ही सुबह जल्दी उठने की आदत थी। उसकी माँ हमेशा कहती थीं, “बेटा, जो सूरज से पहले उठता है, उसका दिन अच्छा जाता है।”


सीमा रोज़ सुबह पाँच बजे उठ जाती। पहले नहा-धोकर पूजा करती, फिर घर की सफाई करती और रसोई में नाश्ता बनाने लगती।


लेकिन उसके ससुराल में सबकी आदत अलग थी। सास-ससुर, पति रोहन और देवर—सब लोग देर तक सोते थे। सुबह आठ-नौ बजे से पहले कोई बिस्तर नहीं छोड़ता था।



एक दिन सुबह रसोई में बर्तनों की हल्की-सी खनखनाहट हुई तो रोहन की नींद खुल गई। वह उनींदी आँखों से कमरे से बाहर आया और बोला,

“सीमा! ये सुबह-सुबह इतनी आवाज़ क्यों हो रही है?”


सीमा ने धीमी आवाज़ में जवाब दिया,

“मैं तो बस नाश्ता बना रही हूँ, ताकि सबको समय पर मिल जाए।”


रोहन ने फिर से बिस्तर पर लेटते हुए कहा,

“थोड़ी देर बाद भी बना सकती हो। हमें अभी सोने दो न।”


सीमा कुछ नहीं बोली। वह चुपचाप अपना काम करती रही, लेकिन उसके मन में हल्का-सा दुख था।


कुछ दिनों बाद सासू माँ भी बोलीं,

“बहू, इतनी सुबह झाड़ू लगाने की क्या ज़रूरत है? हमारी नींद खुल जाती है।”


अब सीमा सच में सोचने लगी—क्या वह सचमुच गलत कर रही है, या बस उसकी आदत सबकी आदत से अलग है?


मन की बात...


एक दोपहर सीमा आँगन में चुपचाप बैठी थी। हल्की धूप फैली हुई थी और वह किसी गहरी सोच में डूबी हुई थी। तभी उसकी जेठानी पूजा वहाँ आई और उसके पास बैठ गई।


पूजा ने प्यार से पूछा,

“सीमा, तुम रोज़ सुबह से लेकर रात तक इतना काम करती हो। फिर भी घर के लोग तुम्हारी बातों से खुश नहीं रहते। क्या तुम्हें बुरा नहीं लगता?”


सीमा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,

“दीदी, सच कहूँ तो कभी-कभी थोड़ा बुरा लगता है। लेकिन मुझे सुबह जल्दी उठने और काम करने की आदत है। इससे मुझे सुकून मिलता है। मैं बस इतना चाहती हूँ कि मेरी वजह से किसी को परेशानी न हो।”


पूजा ने समझाते हुए कहा,

“अगर तुम्हारी नीयत अच्छी है, तो डरने की क्या बात है? एक बार सबके साथ शांति से बैठकर बात करो। प्यार से समझाओगी तो शायद वे भी तुम्हारी भावना समझ जाएँ।”


सीमा ने कुछ पल सोचा। उसे लगा कि चुप रहने से बेहतर है कि वह अपनी बात साफ-साफ और नम्रता से रखे। उसने मन ही मन तय किया कि अब वह सही समय देखकर सबसे खुलकर बात करेगी।


परिवार से बातचीत...


उस शाम सब लोग चाय पी रहे थे। सीमा ने हिम्मत करके कहा—


“माँजी, रोहन जी, मैं आप सबसे एक बात कहना चाहती हूँ। मुझे सुबह जल्दी उठने से अच्छा लगता है। मैं कोशिश करूँगी कि आवाज़ कम करूँ। लेकिन अगर आप लोग भी कभी-कभी थोड़ा जल्दी उठें, तो हम सब साथ में सुबह की चाय पी सकते हैं।”


सब लोग एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।


ससुर जी बोले, “बात तो ठीक कह रही है बहू। मैं भी पहले जल्दी उठता था।”


रोहन ने भी कहा, “ठीक है, मैं हफ्ते में दो दिन जल्दी उठने की कोशिश करूँगा।”


सीमा के चेहरे पर खुशी आ गई।


अगले रविवार सब लोग सचमुच सुबह सात बजे उठ गए। घर में आज कोई शोर या शिकायत नहीं थी। सीमा ने रसोई में जाकर सबके लिए अदरक की गरम-गरम चाय बनाई। चाय की खुशबू पूरे घर में फैल गई।


सभी लोग छत पर आकर बैठ गए। हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में सूरज धीरे-धीरे उग रहा था। चारों तरफ शांति और सुकून का माहौल था।


सासू माँ ने चाय की चुस्की लेते हुए मुस्कुराकर कहा,

“सच में, सुबह का समय कितना सुहावना और शांत होता है। हमें तो पता ही नहीं था कि इतनी सुंदर शुरुआत हो सकती है।”


रोहन भी मुस्कुराया और बोला,

“सीमा, अब समझ आया कि तुम क्यों रोज़ जल्दी उठती हो। तुम सच कहती थीं।”


सीमा ने प्यार से जवाब दिया,

“हर घर की अपनी आदतें होती हैं। बस ज़रूरत है एक-दूसरे को समझने और थोड़ा-सा साथ देने की।”


उस सुबह से घर का माहौल बदलने लगा। अब सुबह केवल समय नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताया हुआ एक खास पल बन गई। 



कहानी की सीख:


अपनी अच्छी आदतों को दूसरों पर थोपने के बजाय प्यार और समझदारी से समझाना चाहिए।


घर में शांति तभी बनी रहती है, जब सभी लोग एक-दूसरे की भावनाओं और बातों को समझें और उनका सम्मान करें।


बदलाव कभी भी ज़बरदस्ती से नहीं आता, बल्कि धैर्य, प्रेम और समझदारी से लाया जाता है।


और इसी तरह सीमा की नई सुबह ने पूरे परिवार की सोच को धीरे-धीरे बदल दिया। 





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